यूजीसी नेट जेआरएफ परीक्षा, जून-2019 दर्शनशास्त्र (PHILOSOPHY)

Total Questions: 100

71. सेंट ऑगस्टीन के सन्दर्भ में कौन-सा वक्तव्य असत्य है?

Correct Answer: (d) बुद्धिसंगत व्याख्या का स्वतन्त्र अस्तित्व होना चाहिए।
Solution:

सेंट ऑगस्टीन के सन्दर्भ में बुद्धिसंगत व्याख्या का स्वतन्त्र आस्तित्व नही है, क्योंकि ईश्वर आस्था का विषय है, तर्क का नही। इसके अतिरिक्त ऑगस्टीन मानते है कि प्राप्त करने योग्य एकमात्र ज्ञान ईश्वर और स्वयं का ज्ञान है। गैर-आध्यात्मिक ज्ञान का केवल सहायक मूल्य होता है।

72. निम्नलिखित में से यह किसका विचार है, कि कार्य और कारण के बीच अनिवार्य सम्बन्ध नही है?

Correct Answer: (c) डेविड ह्यूम
Solution:

डेविड ह्यूम के अनुसार कार्य और कारण के बीच अनिवार्य सम्बन्ध न होकर साहचर्य का सम्बन्ध होता है।

73. निम्नलिखित में से जे.एस. मिल के नैतिक सिद्धान्त के सन्दर्भ में क्या सुसंगत नही है:

Correct Answer: (c) यह सुखों के स्तरीकरण को स्वीकार नही करता है।
Solution:

जे. एस. मिल एक उपयोगितावादी दार्शनिक है, उनकी नीतिशास्त्र पर एकमात्र पुस्तक 'युटिलिटेरियानिज्म' है, जिसमें उन्होंने उपयोगितावाद सिद्धान्त के सन्दर्भ में विस्तारपूर्वक अपने विचार व्यक्त किये हैं। मिल नैतिक सिद्धान्त के अन्तर्गत सुखों के स्तरीकरण या कोटि को स्वीकार करते हैं, जिसमें निम्न स्तरों तथा उच्च स्तर है, मिल उपरिष्कृत इन्द्रियपरक सुखवाद को स्वीकार नही करते।

74. जैन धर्म के अनुसार प्रायश्चित कर्मों से क्या तीव्रतर हो जाता है।

Correct Answer: (d) निर्जरा
Solution:

जैन धर्म के अनुसार प्रायश्चित कर्मों निर्जरा तीव्रतर हो जाता है।

75. सेंट थॉमस एक्विनास के धर्मशास्त्र के बारे में कौन-सा कथन असंगत है?

Correct Answer: (c) ये ईश्वर के लिए सत्रात्मक साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं।
Solution:

सेण्ट थॉमस एक्विनास ईश्वर के अस्तित्व के लिए विश्वमूलक प्रमाण देते हैं, जिसमें वो बताते हैं कि ईश्वर सबसे पहला अविस्थापित विस्थापक है, ईश्वर के लिए धर्मशास्त्रीय साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं, ईश्वर सम्पूर्णता की उच्चतम श्रेणी का प्रतिनिधित्व करता है लेकिन एक्विनास इस बात को धर्मशास्त्र के बारे में नही स्वीकारते ईश्वर के अस्तित्व के लिए सत्तामूलक प्रमाण है बल्कि सत्तामूलक प्रमाण को एन्सेलम, डेकार्ट, प्लेटो स्वीकार करते हैं।

76. कौटिल्य के अनुसार एक 'जनपद' किससे मुक्त होना चाहिए?

Correct Answer: (d) प्रमाद (उदासहीनता)
Solution:

कौटिल्य के अनुसार एक 'जनपद' को प्रमाद (उदासहीनता) से मुक्त होना चाहिए यहाँ जनपद से तात्पर्य प्रजा से है। जो शत्रुद्वेषी, कर्मशील कर्षक, भक्तशुचिः मनुष्य (शुद्ध हृदय नागरिक) है।

77. संवेगवाद के विषय में क्या नहीं कहा जा सकता है?

Correct Answer: (a) यह नैतिक कथनों के भौतिक परिणामों को महत्व देता है।
Solution:

संवेगवाद तथा परामर्शवाद ये दो मुख्य अवर्णनात्मक या असंज्ञानात्मक नैतिक सिद्धान्त हैं, यहाँ नैतिक अनुनय संवेगवाद का एक महत्वपूर्ण घटक है, इसके द्वारा नैतिक तथ्य प्रदान नही होता। इसके द्वारा हम नैतिक कथनों के भौतिक परिणामों को महत्व न देकर नैतिक कथनो के नैतिक परिणामों को महत्व देते हैं।

78. सुमेलित कीजिए:

सूची-Iसूची-II
(A) सेंट ऑगस्टाइन(i) मीडिटरेन्स
(B) देकार्त(ii) फेनोमिनोलॉजी ऑफ माईंड
(C) हिगेल(iii) एन एसएस कर्निंग ह्यूमन अंडरस्टैंडिंग
(D) लॉक(iv) कनेक्शन

कूट :

Correct Answer: (a) A-(iv), B-(i), C-(ii), D-(iii)
Solution:
सूची-Iसूची-II
(A) सेंट ऑगस्टाइन(iv) कन्फेशन्स
(B) देकार्त(i) मेडिटेशन्स
(C) हिगेल(ii) फेनोमिनोलॉजी ऑफ माइंड
(D) लॉक(iii) एन एसएस कर्निंग ह्यूमन अंडरस्टैंडिंग

79. निम्नलिखित में से क्या कपड़े के टुकड़े के रंग का समवायीकरण है।

Correct Answer: (a) स्वयं कपड़ा
Solution:

न्याय दर्शन में तीन प्रकार के कारण माने गये हैं- (1) उपादान कारण (समवायी), (2) असमवायी कारण, (3) निमित्त कारण। जिसमें से उपादान कारण उस द्रव्य को कहा जाता है, जिसके द्वारा कार्य का निर्माण होता है जैसे मिट्टी घड़े का, सूत कपड़े का तथा कपड़े के टुकड़े के रंग का स्वयं कपड़ा समवायी करण है।
दूसरा असमवायी कारण उस गुण या कर्म को कहते हैं, जो समवायी कारण में समवेत रहकर कार्य की उत्पत्ति में सहायक होता है, कपड़े का निर्माण सूतों के संयोग से होता है, यही सूतों का संयोग (कर्म) कपड़े का असमवायीकरण है तीसरा निमित्त कारण वो है, जो द्रव्य से कार्य उत्पन्न करने में सहायक होता है।
जैसे- कुम्भकार मिट्टी से घड़े का निर्माण करता है, इसलिए कुम्भकार ही घड़े का निर्मित कारण है।
(भारतीय दर्शन की रूपेरखा- डॉ. हरेन्द्र प्रसाद सिन्हा)

80. निम्नलिखित में से कौन पूर्व-पारम्परिक सांख्य के सन्दर्भ से सही नही है?

Correct Answer: (d) सांख्य एकेश्वरवाद आध्यात्मिकता है।
Solution:

पूर्व-पारम्परिक सांख्य एक द्वैतवाद दर्शन है, जिसमें दो चरम सत्ताएँ पहली प्रकृति और दूसरी पुरूष है। यहाँ बहुल पुरूषवाद, यथार्थवाद दर्शन है। सांख्य दर्शन ईश्वर की चर्चा नहीं हुई है। सांख्य ईश्वर के सम्बन्ध में पूर्णतः मौन है, यह एक अनीश्वरवाद दर्शन है। सांख्य में कहा गया है कि ईश्वर असिद्ध है ईश्वर का अभाव है, नहीं कहा गया है।