यूजीसी NTA नेट / जेआरएफ परीक्षा, दिसम्बर 2020 जून 2021 इतिहास (SHIFT-II)

Total Questions: 100

91. 'भारतीय मुसलमानों' को किस रूप में पहचाना जाता था?

Correct Answer: (b) शेखजादा
Solution:

भारतीय मुसलमान को 'शेखजादा' के नाम से जाना जाता था। इनमें बरहा और कम्बुस के सैय्यदों के अलावा कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण कुल भी शामिल थे। जिन्हें अकबर ने कई महत्त्वपूर्ण पद दिया, यहाँ तक कि इन्हें अपना अमीर भी बनाया। औरंगजेब के शासनकाल में बरहा और कम्बुस का महत्त्व समाप्त हो गया क्योंकि उत्तराधिकार के युद्ध में वे दारा शिकोह के समर्थक थे।

ईरानी (खुरासानी / ईराकी) शिया मत को मानने वाले थे, जिसमें असद खाँ तथा उसका बेटा जुल्फिकार खाँ जैसे सरदार थे। तुरानी (मध्य एशियाई) सुत्री मत के समर्थक थे, जिसमें चिनकिलिच खां तथा फिरोज गाजीउद्दीन जंग जैसे लोग थे। दक्कनी मुसलमानों में दक्कनी कुलीनों को शामिल किया गया जो बीजापुर या गोलकुंडा में काम करते थे। इनमें भारतीय मूल के और विदेशी दोनों शामिल थे।

92. अपने शासनकाल के आरंभिक दिनों में अकबर ने काफी उदारता से धर्माचार्यों को भू-अनुदान दिया। इस भू-अनुदान को कहते थे :

Correct Answer: (b) सुयुरगाल
Solution:

अकबर ने काफी उदारता से धर्माचार्यों को भू-अनुदान दिया, जिसे मदद-ए-माश या (सुयुरगाल) भूमि के नाम से जानते थे। यह भूमिदान स्थायी एवं वंशानुगत होता था तथा सद्र-उस-सुदूर द्वारा धार्मिक व्यक्तियों गरीबों, विद्वानों, अपाहिजों एवं विधवाओं को जीविका को चलाने के लिए दिया जाता था।

अलतमगा जहाँगीर द्वारा प्रारम्भ की गयी भू-राजस्व व्यवस्था थी। यह विशेष कृपा प्राप्त धार्मिक व्यक्तियों को वंशानुगत रूप से दी जाती थी। इसे विशेष परिस्थिति में शाही आदेश के द्वारा ही रद्द किया जा सकता था।

जागीर भूमि मनसबदारों को उनके वेतन के बदले दी जानी थी। यह हस्तानान्तरित होनी थी। इक्ता व्यवस्था की शुरुआत इल्तुतमिश द्वारा किया गया। इस प्रथा में सैनिकों को उनके वेतन के बदले, भूमि के विशेष खण्डों को दिया जाता था।

93. 'अकबर के शासनकाल के दौरान मौजूद कुलीनों तथा उसकी धार्मिक नीति के विकास पर नई रोशनी डालने वाले लेखक की पहचान करेंः

Correct Answer: (c) इक्तिदार आलम खान
Solution:

मुगल बादशाह अकबर की धार्मिक नीति को मध्यकाल के सभी सुल्तानों एवं बादशाहों में सर्वश्रेष्ठ एवं निरपेक्ष माना जाता है। अकबर की नीति पूर्णतया धार्मिक सहिष्णुता की थी उसकी धार्मिक नीति 'सभी के साथ शांति' (सुलहकुल्ल) के सिद्धान्त पर आधारित थी। इक्तिदार आलम खान के अनुसार "अकबर की धार्मिक नीति का उद्देश्य अपने शासन वर्ग में संतुलन स्थापित करना था।

जिसका गठन विभिन्न जातियों, वर्गों तथा धर्मों के व्यक्तियों द्वारा हुआ था। उसकी उदार प्रकृति इसके लिए अनुकूल थी।" अतः इन्होंने अकबर के शासन काल के दौरान मौजूद कुलीनों तथा उसकी धार्मिक नीति के विकास पर नई रोशनी डालने का प्रयास किया है।

94. 'पूर्वाग्रह वाले धर्माचार्य किन लोगों के प्रति कठोर और संप्रदायवादी नहीं थे?

Correct Answer: (a)
Solution:

मुगल सम्राट अकबर अपनी धार्मिक सहिष्णु नीति के लिए जाना जाता था। वह धर्माचार्यों एवं विद्वानों का आश्रयदाता था। उसकी धार्मिक नीति धर्माचार्यों के पूर्वाग्रहों को समायोजित करने की थी जो मुस्लिम समुदाय के प्रति गहरा प्रभाव रखते थे।

ये धर्माचार्य सुत्री सम्प्रदाय के प्रति कठोर और सम्प्रदायवादी नहीं थे क्योंकि वे ज्यादातर नास्तिक और विधर्मियों के प्रति कठोर और धर्म प्रवण व्यवहार रखते थे। ये सुन्त्री सम्प्रदाय से किसी भी तरह का वैचारिक मतभेद नहीं रखते थे। सुत्री शब्द अरबी के सुत्राह से आया है जिसका अर्थ पैगम्बर के कृत्य या उनके आदर्श है।

95. निम्नलिखित में से किन पूर्व शासकों से दिल जीतने के लिए एम्माओं को भू-अनुदान दिए गए ?

Correct Answer: (d) अफगान
Solution:

अफगानों ने पूर्व शासकों को तुष्ट करने के लिए एम्माओं (इस्लामिक धार्मिक संस्थाओं के अधिकारी) को भूमि अनुदान दिया। यह भूमि प्रार्थना एवं प्रशंसा के लिए मुस्लिम धर्मविदों एवं उलेमाओं को दी जाती थी।

मेवाती, मेवात के मुस्लिम राजपूत शासक थे। राजा हसन खाँ मेवाती के वंश ने 200 वर्षों तक शासन किया। गुजरात के सुल्तानों में बहादुर शाह का नाम प्रमुख है, जिसने (1523-1537) तक गुजरात पर शासन किया। भारत में अफगान का प्रथम शासक बहलोल लोदी था, जिसने लोदी वंश की स्थापना की।

96. निम्नलिखित गद्यांश को पढ़ें और उसके नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर दें।

भारत का राष्ट्रीय आंदोलन औपनिवेशिक आर्थिक आधिपत्य और शोषण की प्रकृति और स्वरूप की समझ पर दृढ और गहन रूप से आधारित था। तीन नाम उल्लेखनीय है जिन्होंने 1870 से 1905 के दौरान ब्रिटिश शासन का आर्थिक विश्लेषण किया, ये हैं, 'ग्रांड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया' दादाभाई नौरोजी, जस्टिस एम.जी. रानाडे और एक सेवानिवृत्त लोक सेवक रमेश चन्द्र दत्त।

इन तीनों नेताओं ने जी.वी. जोशी, जी.के. गोखले, जी. सुब्रमणिय अय्यर, पृथ्विस चन्द्र राय और कई अन्य नेताओं के साथ मिलकर ब्रिटिश शासन की प्रकृति और प्रयोजन के बारे में बुनियादी सवाल उठाए। उनके अनुसार ब्रिटिश साम्राज्यवाद का मूल तत्व भारतीय अर्थव्यवस्था को ब्रिटिश अर्थव्यवस्था के अधीन लाने में निहित था।

वे यह देखने में कामयाब रहे कि उपनिवेशवाद अब लूट, नजराने और वाणिज्यवाद के अपरिष्कृत साधनों के माध्यम से संचालित नहीं हो रहा था बल्कि मुक्त व्यापार और विदेशी पूँजी निवेश के छद्म और जटिल तंत्र के माध्यम से, भारत को मेट्रोपॉलिस के लिए खाद्य पदार्थों और कच्चे माल के आपूर्तिकर्ता के रूप में बदलकर और भारत को मेट्रोपॉलिटिन विनिर्माताओं के लिए बाजार बनाकर संचालित हो रहा था।

1840 के दशक से ही ब्रिटिश अर्थशास्त्रियों और अधिकारियों ने कानून व्यवस्था के साथ-साथ विदेशी पूँजी के निवेश को भारत के विकास के लिए एक प्रमुख साधन के रूप में देखा, इस तर्क को प्रारंभिक भारतीय राष्ट्रवादियों ने जोरदार तरीके से खारिज कर दिया।

उनका कहना था कि विदेशी पूँजी ने भारतीय पूँजी को प्रोत्साहित करने और उसमें वृद्धि करने के बजाय इसे प्रतिस्वापित किया और दबाया जिससे भारत से पूँजी बाहर चली गई तथा भारतीय अर्थव्यवस्था पर ब्रिटिश नियंत्रण और अधिक मजबूत हो गया। उन्होंने ब्रिटिश विनिर्माताओं के हित में भारत के पारंपरिक शिल्पों के धीरे-धीरे पतन और विनाश पर भी प्रकाश डाला। ऐसी नीतियों के राजनीतिक परिणाम भी कम हानिकारक नहीं थे और ये भारत की राजनीतिक अधीनता के कारण बने।

इंडियन नेशनल कांग्रेस ने कई वर्ष के संकोच के बाद निम्नलिखित में से किस वर्ष धन निकासी के सिद्धांत को आधिकारिक रूप से स्वीकार किया और यह घोषणा की कि भारत में अकाल और महागरीबी धन की निकासी द्वारा लाई गई है?

Correct Answer: (b) 1896
Solution:

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के 1896 में कलकत्ता अधिवेशन में प्रथम बार दादा भाई नौरोजी के धन निष्कासन सिद्धान्त को स्वीकार किया गया। सर्वप्रथम दादा भाई नौरोजी ने अपनी पुस्तक पॉवर्टी एण्ड अन ब्रिटिश रूल इन इण्डिया (1867 ई0) में धन के निष्कासन के सिद्धान्त को उजागर किया और यह घोषित किया कि भारत में अकाल और महागरीबी का कारण धन निष्कासन है। राष्ट्रवादी नेता रमेश चन्द्र दत्त ने अपनी पुस्तक 'इकोनॉमिक हिस्ट्री ऑफ इण्डिया' में धन निष्कासन के सिद्धान्त पर बल दिया।

97. निम्नलिखित में से किसने मई 1867 में एक शोधपत्र 'इग्लैण्डस डेब्ट टू इंडिया' प्रस्तुत किया और वह धन निकासी (ड्रेन) के पहले मान्यता प्राप्त सिद्धांतकार थे?

Correct Answer: (d)
Solution:

ब्रिटिश काल में धन निकासी (ड्रेन थ्योरी) के सिद्धान्त को 1867 ई0 में दादाभाई नौरोजी द्वारा एक शोधपत्र "इग्लैण्डस डेब्ट टू इण्डिया" प्रस्तुत किया गया था। औपनिवेशिक शासन के शोषणकारी आर्थिक नीति का तत्कालीन राष्ट्रवादी विचारकों द्वारा पुरजोर विरोध किया गया।

जिसमें प्रमुख रूप से दादाभाई नौरोजी (ग्रांड ओल्ड मैन ऑफ इण्डिया), एम.जी. रानाडे, रमेश चन्द्र दत्त, जी. वी. जोशी, गोखले आदि थे। इन्होंने आकलन किया कि ब्रिटिश उपनिवेशवाद अब वाणिज्यवाद में वृद्धि करके भारत को निर्मित माल का उपभोक्ता बना दिया, जिससे परम्परागत भारतीय हस्तशिल्प उद्योग एवं देशी निर्मित वस्तुओं के विकास में कमी आई।

1840 के दशक से ही ब्रिटिश अर्थशास्त्रियों द्वारा भारतीय पूंजी की अपेक्षा विदेशी पूँजी के निवेश पर ज्यादा बल दिया गया, जिसका राष्ट्रवादियों द्वारा पुरजोर विरोध किया गया। राष्ट्रवादी इस बात से अवगत हो चुके थे कि ब्रिटिश आर्थिक नीति भारत को खोखला बनाने की है। अतः उन्होंने एकजुट होकर धन निकासी के सिद्धान्त का बहिष्कार किया।

98. निम्नलिखित में से किस भारतीय राष्ट्रवादी ने ब्रिटिश शासन की मुक्त व्यापार नीति का विरोध कियाः

Correct Answer: (b) काशीनाथ त्रिम्बक तेलांग
Solution:

काशीनाथ त्रिम्बक तेलांग (1850-1893) भारत के एक न्यायाधीश एवं भारतविद् थे। राष्ट्रवादी आन्दोलन से प्रेरित होकर इन्होंने 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में बम्बई के सार्वजनिक आन्दोलनों एवं जनजागरण में अपना सहयोग प्रदान किया। इनके द्वारा ब्रिटिश शासन की मुक्त व्यापार की नीति, ब्रिटिश संरक्षणवाद एवं सरकार की दुर्भिछ नीति का पुरजोर विरोध किया गया।

इन्होंने पाया कि उपनिवेशवाद अब लूट, नजराना और वाणिज्यवाद तथा मुक्त व्यापार की नीति के द्वारा भारत को एक बाजार के रूप में बना रहा है। इनके द्वारा अंग्रेजों पर आरोप लगाया गया कि मुक्त व्यापार की नीति भारत के हस्तशिल्प उद्योग का सर्वनाश कर रही है तथा सरकारी व्यय का उद्देश्य उपनिवेशी हितों की पूर्ति करना है न कि भारत का विकास एवं कल्याण करना।

99. निम्नलिखित में से किसने कहा था कि रेलवे और टेलीग्राफ भारत के लिए कम लाभकारी थे और वे "दूसरे की पत्नी को सजाने" के समान थे?

Correct Answer: (c) बाल गंगाधर तिलक
Solution:

बाल गंगाधर तिलक ने रेलवे और टेलीग्राफ के विकास को भारत के लिए अलाभकारी बताया। इसके सन्दर्भ में उन्होंने तर्क किया कि यह ठीक उसी प्रकार है जैसे दूसरे की पत्नी के शृंगार पटल को देखकर खुश होना। उन्होंने कहा कि अंग्रेजों ने रेलवे व टेलीग्राफ का विकास वाणिज्यिक हितों को पूरा करने के उद्देश्य से किया न कि भारत की प्रगति के लिए। रेलवे द्वारा कृषिगत वस्तुओं और कच्चे माल का तेजी से निर्गमन हुआ।

परिणामस्वरूप भारत के कुटीर उद्योग, हथकरघा उद्योग, जूट उद्योग आदि का तेजी से ह्रास हुआ और भारत ब्रिटिश निर्मित वस्तुओं के बाजार से पट गया तथा न चाहते हुए भी निर्मित वस्तुओं का आयातक बन गया।

100. निम्नलिखित में से किन ब्रिटिश अर्थशास्त्रियों / प्रशासकों ने तर्क दिया कि भारत में आर्थिक संपन्नता लाने में ब्रिटेन की आर्थिक नीतियों का हाथ था?

(A) जान स्टुआर्ट मिल
(B) अल्फ्रेड मार्शल
(C) एच.एम. हाइंडमैन
(D) हेनरी फॉसेट

नीचे दिए गए विकल्पों में सही उत्तर का चयन कीजिएः

Correct Answer: (b) केवल (A) और (B)
Solution:

जॉन स्टुआर्ट मिल और अल्फ्रेड मार्शल ने तर्क किया कि भारत में आर्थिक सम्पन्नता लाने में ब्रिटिश आर्थिक नीति प्रमुख रूप से उत्तरदायी रही है। 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश अर्थशास्त्रियों एवं अधिकारियों कानून व्यवस्था के साथ-साथ विदेशी पूँजी के निवेश को भारत के विकास के लिए प्रमुख माना।

स्टुआर्ट मिल (1806-1873) एक अर्थशास्त्री, दार्शनिक, इतिहासकार थे। वह उपनिवेशवाद एवं पूँजीवाद का समर्थक तथा ब्रिटिश आर्थिक नीति का पोषक था। "अर्थशास्त्र का सिद्धान्त" (1948) इनका प्रमुख ग्रंथ है। अल्फ्रेड मार्शल (1842-1924) ने माँग एवं आपूर्ति के सिद्धान्त पर अर्थशास्त्र की व्याख्या की, इनका प्रमुख ग्रंथ "प्रिंसिपल ऑफ इकोनॉमिक्स" (1890) है। यह भारत के सन्दर्भ में ब्रिटिश आर्थिक नीति के समर्थक थे।