Solution:गाँधी जी ने अपनी पुस्तक 'यंग इंडिया' में 'धर्म' के अर्थ के बारे में स्वयं ही स्पष्टीकरण किया है जिसका वर्णन इस प्रकार है- (1) धर्म से मेरा आशय हिंदू धर्म नहीं है, यद्यपि में इसे सभी धर्मो से अधिक आदर देता हूँ। धर्म वह है जो हिंदुत्व से भी परे है, जो मनुष्य की प्रकृति को ही बल देता है जो हमें अपने भीतर के सत्य के साथ तादात्मय स्थापित कराता है औरनिरंतर हमारा पवित्रीकरण करता रहता है।
यह मानव प्रकृति का स्थायी तत्त्व है जो पूर्ण अभिव्यक्ति पाने के लिए कोई भी त्याग करने को तत्पर रहता है। (2) मेरे धर्म की कोई भौगोलिक सीमाएं नहीं है। यदि उसमें जीवित आस्था है,वह मेरे भारत-प्रेम से आगे बढ़ जायेगा। मेरा धर्म कारागृहका धर्म नहीं हैं इसमें ईश्वर के दीन-हीन प्राणियों के लिए स्थान है,लेकिन यह उद्धतता और जाति, धर्म तथा रंग के गर्व को सहन करता है।
मेरा पक्का विश्वास है कि यदि मनुष्य कोई काम ईश्वर के नाम परऔर उसमें पूरी आस्था रखते हुए करता है, तोवह भले ही उसके जीवन के अंतिम दिनों में किया गया हो, वह कार्य कभी भी व्यर्थ नहीं जाता है। गाँधी जी की मानवता के प्रति भरपूर आस्था है। भारतीय मानवता किसी से हीन नहीं है,संभवतः श्रेष्ठ ही है। उपर्युक्त प्रश्न का कथन (A) सही नहीं है, लेकिन कारण (R) सहीहै।