Solution:प्राचीन काल में भारत में एक कुप्रथा प्रचलित थी, कि पति की मृत्यु के बाद पत्नी को भी पति के शव के साथ दाहसंस्कार में जबरन या उसके इच्छा से जिन्दा ही बैठा दिया जाता था। इस परंपरा को सती प्रथा के नाम से जाना जाता है।
510 ई. एरण प्रस्तर अभिलेख में गुप्त नरेश भानुगुप्त के मित्र गोपराज जो हूणों के विरुद्ध युद्ध में मारे जाने पर उसकी पत्नी अग्नि में जलकर सती हो गयी थी। जो कि सतीप्रथा का प्रथम लिखित साक्ष्य है। बाणभट्ट सातवीं शताब्दी के संस्कृत गद्य लेखक और राजा हर्षवर्धन (606-647 ई) के राजकवि थे। उनकी दो प्रमुख ग्रन्थ- हर्षचरितम् तथा कादम्बरी।
गद्य रचना के क्षेत्र में इनका वही स्थान है, जो संस्कृत काव्य क्षेत्र में 'कालिदास' का है। इन्होंने सती प्रथा की तीव्र आलोचना किया था। इन्होंने हर्षवर्धन की माता 'यशोमति के सती होने के फैसले का तीव्र विरोध किया था। बाणभट्ट ने इसे "मुख की प्रथा" कहकर आलोचना की थी। कालिदास के 'कुमारसंभव' से उल्लेख मिलाता है कि "रति कामदेव के साथ सती होना चाहती थी लेकिन स्वर्ग से आवाज आयी और उसे ऐसा करने से रोक दिया गया।
वात्स्यायन के 'कामसूत्र' में सती प्रथा का उल्लेख मिलता है, पर इसे सीधे तौर पर उल्लेख नहीं किया गया है। भास के नाटक दृत-घटोत्कच्छ और उरभंग में वर्णन है कि अभिमन्य की पत्नी उत्तरा, जयद्रथ की पत्नी दुःशला, दुर्योधन की पत्नी पौरवी सती हुई थी।
नोट:- आधुनिक भारत में राजा राम मोहन राय व लार्ड विलियम बैंटिंक के सहयोग से दिसम्बर 1829 में नियम 17 के द्वारा सती प्रथा को अवैध घोषित कर दिया गया।