यूजीसी NTA नेट जेआरएफ परीक्षा, दिसम्बर-2019 योग (YOGA)

Total Questions: 100

1. सांख्य शास्त्र का क्या उद्देश्य है?

Correct Answer: (b) दुःखनिवारणम्
Solution:

सांख्य शास्त्र का प्रमुख उद्देश्य दुःख निवारणम् है। सांख्य शास्त्र का प्रवर्तक महर्षि कपिल को माना जाता है। श्रीमद्भागवत के अनुसार महर्षि कपिल, विष्णु जी के पंचम अवतार माने गए हैं। कर्दम व देवहूति से इनकी उत्पत्ति मानी गयी है। बाद में इन्होंने अपनी माता देवहूति को सांख्यज्ञान का उपदेश दिया था जिसका विशद वर्णन श्रीमद्भागवत के तीसरे स्कन्ध में मिलता है।

सांख्य दर्शन के 25 तत्व हैं -

* आत्मा (पुरुष)
* अन्तःकरण (4) - मन, बुद्धि, चिन्त, अहंकार
* ज्ञानेन्द्रियाँ (5) - नासिका, जिह्वा, नेत्र, त्वचा, कर्ण
* कर्मेन्द्रियाँ (5) - पाद, हस्त, उपस्थ, पायु, वाक्
* तन्मात्रायें (5) - गंध, रस, रूप, स्पर्श, शब्द
* महाभूत (5) - पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश

2. पातंजल योगसूत्र के प्रथम सूत्र में योग शब्द का अर्थ व्यास भाष्य के अनुसार क्या है?

Correct Answer: (c) समाधि
Solution:

व्यास भाष्य के अनुसार पतंजलि योगसूत्र के प्रथम सूत्र में योग शब्द का अर्थ समाधि होता है। पंतजलि योग सूत्र के चार पादों में पहला पाद है- समाधि पाद। इस प्रथम पाद में मुख्य रुप से समाधि तथा उसके विभिन्न भेदों का वर्णन किया गया है। अतः इसका नाम समाधिपाद है, इसमें साधकों के लिए समाधि के वर्णन के साथ-साथ योग के विभिन्न साधनों का वर्णन किया गया है।

योग के अर्थ को इस रूप में व्यक्त किया गया है-
।। योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ।।1.2।।

3. पुरुषार्थ चतुष्ट्य क्या है? सही समूह का विकल्प चुनें

Correct Answer: (d) धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष
Solution:

भारतीय परम्परा में जीवन का ध्येय पुरुषार्थ को माना जाता है। धर्म का ज्ञान होना जरुरी है, तभी कार्य में कुशलता आती है और कार्य कुशलता से ही व्यक्ति जीवन में अर्थ अर्जित कर पाता है। काम और अर्थ के इस संसार को भोगते हुए मोक्ष की कामना करनी चाहिए।

स्पष्ट है कि पुरुषार्थ चतुष्ट्य में निम्नलिखित को शामिल किया जाता है -

I. धर्म - (Religion or Rightcouseness)
II. अर्थ - (Wealth)
III. काम - (Work, desire or Sex)
IV. मोक्ष - (Salvation or Liberation)

4. सांख्य दर्शन के संस्थापक कौन हैं?

Correct Answer: (c) कपिल मुनि
Solution:

सांख्य दर्शन के संस्थापक कपिल मुनि हैं। भारतीय दर्शन पद्धतियों में सांख्य दर्शन को सबसे प्राचीन दर्शन माना जाता है, जो कि द्वैतवादी दर्शन है, अर्थात् इसके अनुसार मूलतत्व दो हैं प्रकृति और पुरुष (आत्मा) प्रकृति त्रिगुणात्मक और अचेतन है। सत्, रज और तम् प्रकृति के तीन गुण हैं।

सांख्य दर्शन के अनुसार विश्व त्रिगुणात्मक प्रकृति का वास्तविक परिणाम है। पुरुष (आत्मा) की सत्ता स्वयंसिद्ध है। इसके अस्तित्व के खंडन में भी इसकी सिद्धि हो जाती हैं जो खंडन कर रहा है, वही चेतन आत्मा है।

5. तैत्तिरीय उपनिषद् के अनुसार मृगुवल्ली में ब्रह्म अनुभूति के लिए किस तकनीक का उल्लेख है?

Correct Answer: (c) तप
Solution:

तैत्तिरीय उपनिषद के अनुसार भृगुवल्ली में ब्रह्म अनुभूति के लिए तप को सर्वप्रमुख माध्यम माना गया। कृष्ण यजुर्वेद शाखा का तैत्तिरीय उपनिषद, तैत्तिरीय आरण्यक का एक भाग है। इस आरण्यक के सातवें, आठवें और नौवें अध्यायों को ही उपनिषद की मान्यता प्राप्त है। इस उपनिषद के रचयिता तैत्तिरि ऋषि हैं। इसमें तीन वल्लियां- शिक्षावल्ली, ब्रह्मानंदवल्ली और भृगुवल्ली हैं।

इन तीन वल्लियों को क्रमशः 12,9 तथा 10 अनुवादकों में विभाजित किया गया है। भृगुवल्ली में ऋषिवर भृगु की ब्रह्मापरक जिज्ञासा का समाधान उनेक पिता महर्षि वरुण द्वारा किया जाता है। वे उन्हें तत्वज्ञान का बोध कराने के उपरान्त, साधना द्वारा उसे स्वयं अनुभव करने के लिए कहते हैं। तब वे स्वयं अन्न, प्राण, मन, विज्ञान और आनन्द को ब्रह्म रुप में अनुभव करते हैं।

भृगुवल्ली के दूसरे अनुवादक में तप के बाद उन्हें बोध हुआ कि अन्न ही ब्रह्मा है, क्योंकि अन्न से ही जीवन है और अन्न न मिलने से मृत्यु को प्राप्त जीव अन्न (पृथ्वी) में ही समा जाता है। तप से ही ब्रह्मा को जाना जा सकता है।

6. प्रश्न उपनिषद् में प्राण की तुलना किससे की गई है?

Correct Answer: (a) आदित्य से
Solution:

प्रश्न उपनिषद् में प्राण की तुलना आदित्य से की गई है। प्रश्नोपनिषद् अथर्ववेदीय शाखा के अन्तर्गत एक उपनिषद है। यह उपनिषद संस्कृत भाषा में लिखित है। इस उपनिषद के प्रवक्ता आचार्य पिप्पलाद थे, जो कदाचित् पीपल के गोदे खाकर जीते थे।

पिप्पलाद जी ने 6 पृथक प्रश्नों का सविस्तार उत्तर देते हुए दूसरे प्रश्न में प्राण के स्वरुप का निरुपण किया और समझाया कि वह स्थूल देह का प्रकाशक (आदित्य) धारयिता एवं सब इन्द्रियों से श्रेष्ठ हैं।

7. निम्नलिखित में से क्या पराविद्या से संबन्धित हैं?

Correct Answer: (a) अक्षर ज्ञान
Solution:

अक्षर ज्ञान, पराविद्या से सम्बन्धित है। पराविद्या अपने ही माध्यम से आत्मस्वरुप को जानने का उपाय है। अपराविद्या विज्ञान है, अर्थात् बाहरी दुनिया को यान्त्रिक रुप से जानने और परिवर्तित करने का मार्ग है। पहला व्यक्ति आधारित आत्मानुभाव है, तो दूसरा में प्रत्यक्षतः दर्शनीय व्यक्ति निरपेक्ष निरीक्षण का परिणाम है। नोट-अक्षर ज्ञान का तात्पर्य नष्ट न होने वाले ज्ञान से होता है।

8. "वर्ण, स्वर मात्रा, बल, साम और संधि - ये सब शिक्षा की सार वस्तुएँ हैं" यह कथन किस उपनिषद्का है?

Correct Answer: (c) तैत्तिरीय उपनिषद्
Solution:

“वर्ण, स्वर, मात्रा, बल, साम और सन्धि ये सब शिक्षा की सार वस्तुएँ हैं।” यह कथन तैत्तिरीय उपनिषद का है। तैत्तिरीय उपनिषद के शिक्षावल्ली में शिक्षा का वर्णन है। शिक्षावल्ली के द्वितीय अनुवादक में लिखा है कि "वर्ण, स्वर, मात्रा, बल, साम और सन्धि - इन्हें वेद शिक्षा का अध्याय कहा गया है।"

9. ऐतरेय उपनिषद् किस वेद से संबंधित है?

Correct Answer: (c) ऋग्वेद
Solution:

ऐतरेय उपनिषद् ऋग्वेद से सम्बन्धित है। समाज की तरह भाषा भी परिवर्तनशील है। वेदों के तत्वज्ञान व भाषा का विशेष बौद्धिक तल था। यास्क ने वैदिक शब्दों के भाष्य व भावार्थ को समझाने के लिए 'निरुक्त' लिखा। वेद छन्दस में थे, जबकि ब्राह्मण संस्कृत में।

लेकिन ब्राह्मण ग्रन्थों में कर्म विनियोग के साथ दार्शनिक विषय भी हैं। शतपथ ब्राह्मण का एक हिस्सा बृहदारण्यक उपनिषद् है। ऐतरेय ब्राह्मण का एक हिस्सा ऐतरेय उपनिषद् बन गया। कौशीतकि ब्राह्मण का एक भाग कौशीतकि उपनिषद् है। कृष्ण यजुर्वेद के ब्राह्मणों से कठोपनिषद्, तैत्तिरीय उपनिषद्, श्वेताश्वतरोपनिषद् बनें। सामवेद के ब्राह्मणों से केन और छान्दोग्य उपनिषदें निकली।

10. श्रीमद् भगवद्गीता में मनोनिग्रह का साधन बताया है-

Correct Answer: (c) अभ्यास एवं वैराग्य
Solution:

श्रीमद्भगवतगीता में अभ्यास और वैराग्य को मनोविग्रह का साधन बताया गया है। महर्षि पतंजलि ने योगशास्त्र में लिखा है। - "अभ्यास वैराग्याभ्यां तन्निरोधः” अर्थात वैराग्याभ्यास से मन का विरोध होता है। अभ्यास से उद्धत मन वश में होता है, वैराग्य से उसे निर्मल, कोमल और शान्त बनाया जा सकता है।

निःसंदेह अभ्यास और व्यायाम ही मनोनिग्रह का रहस्य है, इसके लिए-

1. मन पर संयम पाने की इच्छाशक्ति को दृढ़ बनाना पड़ता है।
2. मन के स्वाभाव को जानना पड़ता है।
3. हमें कुछ साधना प्रणालियाँ सीखकर लगन और विचारपूर्वक उनका नियम अभ्यास करना पड़ता है।