यूजीसी NTA नेट जेआरएफ परीक्षा, दिसम्बर-2019 योग (YOGA)

Total Questions: 100

91. निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़ें और तदनुसार प्रश्नों के उत्तर दें:

योग आदिकाल से अपनायी जाने वाली प्रायोगिक दर्शन (शास्त्र) की एक पद्धति है। योग दर्शन 'सांख्य शास्त्र' के माध्यम से विकसित हुआ है। 'सांख्य' का अर्थ है संख्या और इस प्रकार सांख्य शास्त्र में जैसे-जैसे जागृति बढ़ती है, वैसे-वैसे व्यक्ति बाह्य वस्तुओं से लेकर आंतरिक वस्तुओं की गणना करने में सक्षम होता जाता है, और व्यक्ति अनुभाव हेतु इसका समूहन तथा वर्गीकरण करता है।

ज्ञान के अनुप्रयोग से ऐश्वर्य और विभूति का सृजन होता है। परम ज्ञान से व्यावहारिक ज्ञान की उत्पत्ति होती है और उससे ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। अतः यदि किसी व्यक्ति को तत्वों का क्रम और उनका संबंध ज्ञात हो जाता है तो उसे अपने शरीर, मन, आत्मा तथा उससे परे संसार के परिप्रेक्ष्य में तत्वों को संशोधित करने की शक्ति प्राप्त होती है। योग सांख्य दर्शन पर पूरी तरह आधारित है जिसमें ईश्वर को सर्वोच्च महत्त्व दिया जाता है। योग में 26 तत्वों को मान्यता दी गई है। योग साधना में, इन तत्वों का संयुग्मन अधिक महत्वपूर्ण है, जो अनुभूति के माध्यम से प्राप्त होता है।

सभी प्रकार के भोजन की आदतें, जीवन शैली और सभी यौगिक पद्धतियों का आशय उक्त लक्ष्य की प्राप्ति है। अतः शरीर, मन और आत्मा के 'तत्व त्रयों' की सुसंगति के लिए यौगिक पद्धतियों के साथ-साथ भोजन की आदतें, जीवन शैली तथा अन्य कारक भी सहायक होने चाहिए। एक बुद्धिमान व्यक्ति इन पद्धतियों को अपने जीवन में अपनाता है और शारीरिक स्तर से लेकर मानसिक स्तर तक उत्तरोत्तर उच्चत्तर स्तर तक बेहतर स्वास्थ्य की प्राप्ति करता है। पंचकर्मेन्द्रियाँ तथा पंचज्ञानेन्द्रियाँ सर्वथा अंतः संबंधित होती हैं क्योंकि दोनों बुद्धि से उद्भूत होती हैं।

अतः बुद्धि के संशोधन और रूपान्तरण से हमारे ज्ञानेन्द्रियों और कर्मन्द्रियों पर प्रभाव पड़ता है। अतः प्रत्यक्ष मानसिक एकाग्रता और अप्रत्यक्ष मानसिक एकाग्रता अर्थात् ध्यान और आसन को भी ज्ञानेन्द्रियों, कर्मेन्द्रियों तथा पंचमहाभूतों पर प्रभाव डालना चाहिए जो कि हममें अन्तर्निहित हैं। हमारे खाद्य पदार्थ जिसका हम चयन करते हैं और जो हमें प्राप्त होते हैं उन सबका निर्णय मन द्वारा किया जाता है।

ठीक उसी प्रकार, सहयोजन तथा पोषण को भी बुद्धि द्वारा ही नियंत्रित किया जाता है और इसीलिए कोई स्थिति जिसमें प्रदूषक तत्वों के लिए या तो अनुकूल वातावरण तैयार करता है या अपक्रिया भी बुद्धि से संबंधित है। संक्षेप में, योग चिकित्सा किसी व्यक्ति की यौगिक आवश्यकता अनुसार पद्धतियों का अनुप्रयोग मात्र है।

भगवद्गीता में ठीक ही कहा गया है कि "उद्धरेत आत्मा नात आत्मनम्” योग चिकित्सा पर लागू होता है। इसके आधार पर, योग चिकित्सा में 'त्रिगुणों' को अधिक महत्व देकर विकसित किया जा सकता है। इसी प्रकार, आयुर्वेद में 'त्रिदोष' पर बल देते हुए भारतीय शिक्षण की अनुषंगी शाखा विकसित की गई है।

उपर्युक्त गंद्याश के संदर्भ में प्रायोगिक दर्शन का नाम बताएं : 

Correct Answer: (a) मीमांसा
Solution:

उपर्युक्त गद्यांश के सन्दर्भ में प्रायोगिक दर्शन का नाम योग है। दूसरे शब्दों में योग आदिकाल से अपनायी जाने वाली प्रायोगिक दर्शन (शास्त्र) की एक पद्धति है। योग दर्शन 'सांख्य शास्त्र' के माध्यम से विकसित हुआ है।

92. कैसे कोई ऐश्वर्य का सृजन कर सकता है?

Correct Answer: (b) ज्ञान के अनुप्रयोग से
Solution:

ज्ञान के अनुप्रयोग से कोई व्यक्ति ऐश्वर्य का सृजन कर सकता है, साथ ही ज्ञान के अनुप्रयोग से ही विभूति का सृजन भी होता है। परम ज्ञान से व्यावहारिक ज्ञान की उत्पत्ति होती है, और उससे ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।

93. 'तत्व त्रय' क्या हैं :

(A) शरीर
(B) मन
(C) ईश्वर
(D) आत्मा

निम्नलिखित में से सही विकल्प चुनें :

Correct Answer: (b) (A), (B) और (D)
Solution:

'त्रय तत्व' के अन्तर्गत शरीर, मन तथा आत्मा शामिल होता है। शरीर, मन और आत्मा के 'त्रय तत्वों की आदतें जीवन शैली तथा अन्य कारक भी सहायक होने चाहिए।

94. योग में कितने तत्व हैं?

Correct Answer: (c) 26
Solution:

योग में 26 तत्वों को मान्यता दी गई है। योग साधना में, इन तत्वों का संयुग्मन अधिक महत्वपूर्ण है, जो अनुभूति के माध्यम से प्राप्त होता है। योग सांख्य दर्शन पर पूरी तरह आधारित है, जिसमें ईश्वर को सर्वोच्च महत्व दिया जाता है।

95. उस तत्व का नाम बतायें जिससे पंचज्ञानेन्द्रिय तथा पंचकर्मेन्द्रिय में परिवर्तन होता है।

Correct Answer: (d) बुद्धि
Solution:

बुद्धि के माध्यम से पंचज्ञानेन्द्रिय तथा पंचकर्मन्द्रिय में परिवर्तन होता है। दूसरे शब्दों में पंचकर्मेन्द्रियां तथा पंचज्ञानेन्द्रियां सर्वथा अन्तः सम्बन्धित होती हैं, क्योंकि दोनों बुद्धि से उद्भूत होती हैं। अतः बुद्धि के संसोधन और रुपान्तरण से हमारे ज्ञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रियों पर प्रभाव पड़ता है।

96. निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़ें और प्रश्नों के उत्तर दें:

 

योग को चित्त की वृत्तियों के विरोध के रूप में परिभाषित किया जाता है। चित्त तीन कारकों से बना है, यथा मनस (mind) बुद्धि (intellect) और अहंकार (ego) । चित्त अवलोकन, सावधानी, लक्ष्य तथा तर्क का वाहक है। चित्त वृत्ति को पाँच वर्गों में वर्गीकृत किया जाता है और प्रत्येक क्लिष्ट अथवा अक्लिष्ट हो सकती हैं। ये हैं- प्रमाण (सम्यक् ज्ञान का स्रोत), विपर्यय (मिथ्या ज्ञान) विकल्प (कल्पना), निद्रा और स्मृति (memory) ।

प्रमाण तीन प्रकार के होते हैं: प्रत्यक्ष (direct evidence); अनुमान (scriptural evidence), सम्यक अथवा सही ज्ञान इन तीनों स्रोतों से प्राप्त किया जा सकता है। विपर्यय, गलत अथवा भ्रामक (illusory) ज्ञान के कारण उत्पन्न होता है, जो एक वस्तु के स्थान पर दूसरी वस्तु को गलत समझ लेता है, और यह वास्तविकता पर आधारित नहीं होता है। विकल्प शाब्दिक ज्ञान मात्र होता है, जिसके वस्तु का अभाव होता है। निद्रा, स्वप्न रहित नींद है जिसमें विचार और भाव की सभी गतिविधियाँ समाप्त हो जाती हैं। स्मृति, शब्दों और अनुभवों का असंशोधित स्मरण है।

अभ्यास (बारंबार अभ्यास) और वैराग्य का साथ-साथ अभ्यास (आवृत्ति) चित्त की इन पाँच चंचल अवस्थाओं के नियन्त्रण के लिए सही मार्ग है। योग का निरंतर अभ्यास शरीर, मन और आत्मा में सन्तुलन स्थापित करता है तथा चित्त की चंचलता को शांत करता है, ताकि ये आत्मा की सही अभिव्यक्ति को किसी प्रकार से विरूपित न कर सकें। तभी आत्मा कैवल्य की प्राप्ति हेतु अपने स्वरूप में अवस्थित हो जाता है।

उपर्युक्त गद्यांश में निम्नलिखित में से किस प्रकार के प्रमाण का उल्लेख नहीं है?

Correct Answer: (b) युक्ति
Solution:

उपर्युक्त गद्यांश में युक्ति रूपी प्रमाण का कोई उल्लेख नही है। प्रमाण मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं प्रत्यक्ष (Direct), अनुमान (Inference) तथा आगम (Scriptural evidence), सम्यक् अथवा सही ज्ञान इन तीनो स्रोतों से प्राप्त किया जा सकता है।

97. वस्तु रहित शाब्दिक ज्ञान को निम्नलिखित में से क्या संज्ञा दी जाती है?

Correct Answer: (d) विकल्प
Solution:

वस्तु रहित शाब्दिक ज्ञान को विकल्प की संज्ञा दी जाती है। विकल्प शाब्दिक ज्ञान मात्र होता है, जिसमें वस्तु का अभाव होता है।

98. निम्नलिखित में से क्या चित्तवृत्ति नहीं है?

Correct Answer: (d) अस्मिता
Solution:

चित्तवृत्तियों को पाँच वर्गों में वर्गीकृत किया गया है और प्रत्येक क्लिष्ट अथवा अक्लिष्ट हो सकती है। ये हैं प्रमाण (सम्यक् ज्ञान का स्रोत), विपर्यय (मिथ्या ज्ञान), विकल्प (कल्पना), निद्रा और स्मृति (Memory)। स्पष्ट है कि अस्मिता चित्तवृत्ति नहीं है।

99. योग के नियमित अभ्यास से निम्नलिखित में से किनके मध्य संतुलन स्थापित होता है?

Correct Answer: (d) शरीर, मन और आत्मा
Solution:

योग के नियमित अभ्यास से शरीर, मन और आत्मा के मध्य संतुलन स्थापित होता है। साथ ही चित्त की चंचलता को शान्त करता है, ताकि ये आत्मा की सही अभिव्यक्ति को किसी प्रकार से विरूपित न कर सके, तभी कैवल्य की प्राप्ति हेतु अपने स्वरूप में अवस्थित हो जाता है।

100. चित्त की पाँच वृत्तियों को संयमित रखने का सही तरीका है :

Correct Answer: (c) अभ्यास और वैराग्य का साथ-साथ अभ्यास
Solution:

चित्त की पांच वृत्तियों - प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति को संयमित रखने का सही तरीका अभ्यास और वैराग्य के साथ-साथ अभ्यास करना है। अभ्यास (बारंबार अभ्यास) और वैराग्य के साथ-साथ अभ्यास (आवृत्ति) चित्त की इन पांच चंचलताओं के नियन्त्रण के लिए सही मार्ग है।