योग आदिकाल से अपनायी जाने वाली प्रायोगिक दर्शन (शास्त्र) की एक पद्धति है। योग दर्शन 'सांख्य शास्त्र' के माध्यम से विकसित हुआ है। 'सांख्य' का अर्थ है संख्या और इस प्रकार सांख्य शास्त्र में जैसे-जैसे जागृति बढ़ती है, वैसे-वैसे व्यक्ति बाह्य वस्तुओं से लेकर आंतरिक वस्तुओं की गणना करने में सक्षम होता जाता है, और व्यक्ति अनुभाव हेतु इसका समूहन तथा वर्गीकरण करता है।
ज्ञान के अनुप्रयोग से ऐश्वर्य और विभूति का सृजन होता है। परम ज्ञान से व्यावहारिक ज्ञान की उत्पत्ति होती है और उससे ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। अतः यदि किसी व्यक्ति को तत्वों का क्रम और उनका संबंध ज्ञात हो जाता है तो उसे अपने शरीर, मन, आत्मा तथा उससे परे संसार के परिप्रेक्ष्य में तत्वों को संशोधित करने की शक्ति प्राप्त होती है। योग सांख्य दर्शन पर पूरी तरह आधारित है जिसमें ईश्वर को सर्वोच्च महत्त्व दिया जाता है। योग में 26 तत्वों को मान्यता दी गई है। योग साधना में, इन तत्वों का संयुग्मन अधिक महत्वपूर्ण है, जो अनुभूति के माध्यम से प्राप्त होता है।
सभी प्रकार के भोजन की आदतें, जीवन शैली और सभी यौगिक पद्धतियों का आशय उक्त लक्ष्य की प्राप्ति है। अतः शरीर, मन और आत्मा के 'तत्व त्रयों' की सुसंगति के लिए यौगिक पद्धतियों के साथ-साथ भोजन की आदतें, जीवन शैली तथा अन्य कारक भी सहायक होने चाहिए। एक बुद्धिमान व्यक्ति इन पद्धतियों को अपने जीवन में अपनाता है और शारीरिक स्तर से लेकर मानसिक स्तर तक उत्तरोत्तर उच्चत्तर स्तर तक बेहतर स्वास्थ्य की प्राप्ति करता है। पंचकर्मेन्द्रियाँ तथा पंचज्ञानेन्द्रियाँ सर्वथा अंतः संबंधित होती हैं क्योंकि दोनों बुद्धि से उद्भूत होती हैं।
अतः बुद्धि के संशोधन और रूपान्तरण से हमारे ज्ञानेन्द्रियों और कर्मन्द्रियों पर प्रभाव पड़ता है। अतः प्रत्यक्ष मानसिक एकाग्रता और अप्रत्यक्ष मानसिक एकाग्रता अर्थात् ध्यान और आसन को भी ज्ञानेन्द्रियों, कर्मेन्द्रियों तथा पंचमहाभूतों पर प्रभाव डालना चाहिए जो कि हममें अन्तर्निहित हैं। हमारे खाद्य पदार्थ जिसका हम चयन करते हैं और जो हमें प्राप्त होते हैं उन सबका निर्णय मन द्वारा किया जाता है।
ठीक उसी प्रकार, सहयोजन तथा पोषण को भी बुद्धि द्वारा ही नियंत्रित किया जाता है और इसीलिए कोई स्थिति जिसमें प्रदूषक तत्वों के लिए या तो अनुकूल वातावरण तैयार करता है या अपक्रिया भी बुद्धि से संबंधित है। संक्षेप में, योग चिकित्सा किसी व्यक्ति की यौगिक आवश्यकता अनुसार पद्धतियों का अनुप्रयोग मात्र है।
भगवद्गीता में ठीक ही कहा गया है कि "उद्धरेत आत्मा नात आत्मनम्” योग चिकित्सा पर लागू होता है। इसके आधार पर, योग चिकित्सा में 'त्रिगुणों' को अधिक महत्व देकर विकसित किया जा सकता है। इसी प्रकार, आयुर्वेद में 'त्रिदोष' पर बल देते हुए भारतीय शिक्षण की अनुषंगी शाखा विकसित की गई है।
उपर्युक्त गंद्याश के संदर्भ में प्रायोगिक दर्शन का नाम बताएं :