यूजीसी NTA नेट जेआरएफ परीक्षा, दिसम्बर-2019 योग (YOGA)

Total Questions: 100

11. योग वाशिष्ठ के अनुसार शास्त्रों का अध्ययन, मनत, सत्पुरुषों का संग एवं वैराग्य ज्ञान की कौन सी भूमिका है?

Correct Answer: (c) विचारणा
Solution:

योग वशिष्ठ के अनुसार शास्त्रों का अध्ययन, मनन, सतपुरुषों का संग एवं वैराग्य ज्ञान की विचारणा भूमिका है। योग वशिष्ठ योग का एक महत्वपूर्ण ग्रन्थ है। अन्य योग ग्रन्थों की भांति योग वशिष्ठ में भी योग के विभिन्न स्वरूपों जैसे चित्तवृत्ति, यमस्वरूप, नियम-स्वरुप, आसन प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, समाधि तथा मोक्ष आदि का वर्णन वृहद् रूप में किया गया है।

योग वशिष्ठ में योग साधना करने वाले साधकों को निर्माण प्राप्ति के लिए यम-नियमों का अभ्यास आवश्यक बताया गया है। योग वशिष्ठ महारामायण संस्कृत साहित्य में अद्वैत वेदान्त का अति महत्वपूर्ण ग्रन्थ है। परम्परानुसार आदिकवि वाल्मीकि योगवशिष्ठ महारामायण के रचियता माने जाते हैं, किन्तु वास्तविक रचयिता वशिष्ठ हैं तथा महर्षि वाल्मीकि इस सिद्धान्त ग्रन्थ के संकलनकर्ता मात्र हैं।

12. योग वाशिष्ठ के अनुसार मुक्ति के चार द्वारपाल कौन से हैं?

Correct Answer: (c) शम, विचार, सन्तोष, साधु पुरुष का संग
Solution:

योग वशिष्ठ के अनुसार मुक्ति के चार द्वारपाल शम, विचार, संतोष तथा साधु पुरुष का संग हैं। मोक्ष का वर्णन करते हुए वशिष्ठ जी, श्रीरामजी से कहते हैं कि लोक में दो प्रकार की मुक्ति होती है -

असंसक्तमतेर्यत्यागदानेषु कर्मणाम्।
नैषणातित्स्थतिं विद्धि त्वं जीवन्मुक्तामिह।।

सैव देहक्षयेरामपुनर्जनवर्जिता।
विदेहमुक्ता प्रोक्ता तत्स्थानायांति दृश्यताम।।

13. त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद् के अनुसार समस्त वस्तुओं में उदासीन भाव होना ही ....... है

Correct Answer: (c) आसन
Solution:

त्रिशिखब्राह्मणोपनिषद के अनुसार समस्त वस्तुओं में उदासीन भाव होना ही आसन है। यह उपनिषद शुक्ल यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत एक उपनिषद है। यह उपनिषद संस्कृत भाषा में लिखित है।

सर्ववस्तुन्युदासीनभावमासनमुत्तमम्।।
(त्रिशिखबाह्मणोपनिषद-2/29)

अर्थात् - सर्व दृश्य पदार्थों के प्रति चित्त में हमेशा सहज उदासीन भाव रहे, उसको ही श्रेष्ठ आसन कहते हैं।

जगत्सर्वमिदं मिथ्याप्रतीतिः प्राणसंयमः ।।
(त्रिशिखबाह्मणोपनिषद-2/30)

अर्थात् - जब यह जगत सब प्रकार से मिथ्या प्रतीत होने लगे, तो वही प्राणायाम है।

14. योगतत्त्वोपनिषद् के अनुसार पंचमहाभूतों की धारणा को कितनी देर तक करने का निर्देश है?

Correct Answer: (c) पाँच घटिका
Solution:

योगतत्त्वोपनिषद के अनुसार पंचमहाभूतों की धारणा को पाँच घटिका तक करने का निर्देश है। पंचभूत (पंचतत्व या पंचममहाभूत) भारतीय दर्शन में सभी पदार्थों के मूल माने गये हैं। आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा पृथ्वी ये पंचमहाभूत माने गये हैं, जिनसे सृष्टि का प्रत्येक पदार्थ बना है। पंचमहाभूतों में सबसे पहले आकाश की उत्पत्ति हुई। आकाश का मुख्य गुण 'शब्द' है तथा शरीर में कर्णेन्द्रिय (कान) आकाश की ही अभिव्यक्ति है।

15. योग तत्त्वोपनिषद् में हठयोग के कितने अंगों का उल्लेख है?

Correct Answer: (d) आठ अंग
Solution:

योग तत्वोपनिषद् में हठयोग के आठ अंगों का उल्लेख किया गया है। हठयोग, चित्तवृत्तियों के प्रवाह को संसार की ओर जाने से रोककर अंतर्मुखी करने की एक प्राचीन भारतीय साधना पद्धति है, जिसमें प्रसुप्त कुंडलिनी को जागृत कर नाड़ी मार्ग से ऊपर उठाने का प्रयास किया जाता है, और विभिन्न चक्रों में स्थिर करते हुए उसे शीर्षस्थ सहस्तार चक्र तक ले जाया जाता है।

हठयोग के आठ अंग निम्नलिखित हैं -

(1) यम
(2) नियम
(3) आसन
(4) प्राणायाम
(5) प्रत्याहार
(6) धारणा
(7) ध्यान
(8) समाधि ।

16. नादबिन्दु उपनिषद् के अनुसार नाद श्रवण का अभ्यास किस आसन एवं मुद्रा में करना चाहिए?

Correct Answer: (c) सिद्धासन एवं वैष्णवी मुद्रा
Solution:

नादबिन्दु उपनिषद के अनुसार नाद श्रवण का अभ्यास सिद्धासन एवं वैष्णवी मुद्रा में करना चाहिए। ऐसा कहा जाता है कि नाद श्रवण में पूरी तरह लीन होने से मन लय हो जाता है और समाधि की अवस्था प्राप्त हो जाती है। साधक सिद्धासन में बैठकर वैष्णवी मुद्रा धारण करके अनाहत ध्वनि को दाँऐ कान से सुनने का प्रयास करते हैं।

17. नाद बिन्दु उपनिषद् के अनुसार ओंकार को जानने की यौगिक तकनीक क्या है?

Correct Answer: (b) धारणा
Solution:

नादबिन्दु उपनिषद के अनुसार ओंकार को जानने की यौगिक तकनीक धारणा है। जो साधक ओंकार से अनभिज्ञ हैं, वे ब्राह्मण कहलाने के योग्य नहीं हैं। ओंकार से ही सब देवताओं की उत्पत्ति और समस्त जड़ जंगम पदार्थों का अस्तित्व है। हृदय कमल की कर्णिका के मध्य में स्थित ज्योतिशिखा के समान अंगुष्ठभात्र आकार में नित्य ओंकार रुप परमात्मा का सदा ध्यान करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं।

18. महर्षि पतञ्जलि के अनुसार भोग और अपवर्ग का सम्पादन करना किसका प्रयोजन है?

Correct Answer: (b) दृश्य
Solution:

महर्षि पतंजलि के अनुसार भोग और अपवर्ग का सम्पादन दृश्य प्रायोजन से किया जाता है। परमात्मा ने जीवात्मा को सम्पूर्ण सृष्टि भोग व अपवर्ग के लिए ही प्रदान किया है। इसका विवेक सम्मत त्यागपूर्ण भोग ही उपवर्ग को प्राप्त करने का एक साधन है। अपवर्ग (मोक्ष) ही आत्मा का प्रमुख उद्देश्य है, जो केवल मनुष्य के द्वारा ही सम्भव है।

पशु-पक्षी आदि सभी प्राणी इस योग्य नहीं बल्कि वे केवल भोग तक सीमित है। महर्षि पतंजलि प्रणीत अष्टांग योग ही इस साधन का क्रमिक व विशुद्ध वैज्ञानिक वर्णन करता है। भोग की प्रवृत्ति संसार में संघर्ष, हिंसा, वैर, विरोध, दुःख व अशान्ति को उत्पन्न करती है जबकि मोक्ष की प्रवृत्ति संसार में सद्भाव, प्रेम, करुणा, सत्य, आनन्द व शान्ति का साम्राज्य स्थापित करती है।

19. सोपक्रम एवं निरूपक्रम कर्म में संयम करने पर किस ज्ञान की प्राप्ति होती है?

Correct Answer: (c) मृत्यु
Solution:

सोपक्रम और निरुपक्रम कर्म में संयम करने का मृत्यु रुपी ज्ञान की प्राप्ति होती है। "कायरूप संयमातग्राह्य शक्तिस्तम्भे चक्षु प्रकाशसम्प्रयोगे अन्तनम।" अर्थात् - शरीर के रूप से संयम करने से उसके रुप के रुकने से नेत्रों की ग्राह्य शक्ति रुक जाती है, जब योगी अन्तर्ध्यान हो जाता है। "सोपक्रम निरुपक्रमं च कर्म सत्यममादपरांत ज्ञानमरिष्टेभ्यो ।" अर्थात् - सोपक्रम और निरुपक्रम नामक कर्मों में संयम करने से अथवा अरिष्टों से मृत्यु का ज्ञान हो जाता है।

20. महर्षि पतञ्जलि के अनुसार चित्त का गृहीता, ग्रहण तथा ग्राह्य में स्थित एवं तदाकार हो जाना क्या कहलाता है?

Correct Answer: (c) समापत्ति
Solution:

महर्षि पतंजलि के अनुसार चित्त का गृहीता, ग्रहण तथा ग्राह्य में स्थित एवं तदाकार हो जाना समापत्ति कहलाता है। चित्त को ही तथता के नाम से पुकारा जाता है। दृश्यते न विधते बाह्यं चित्तं चित्रं हिदृश्यते । देहभोग प्रतिष्ठानं चित्तमात्रं वदाम्याहम् ।। अर्थात् - वाह्य दृश्य जगत बिल्कुल विद्यमान नहीं है।

चित्त एकाकार है, परन्तु वही इस जगत् में विचित्र रूपों में दिखाई पड़ता है। कभी वह देह के रुप में और कभी योग के रूप में प्रतिष्ठित रहता है। अतः चित्त ही वास्तव में सत्ता है। जगत उसी का परिणाम है।