यूजीसी NTA नेट जेआरएफ परीक्षा, दिसम्बर-2019 योग (YOGA)

Total Questions: 100

21. महर्षि पतञ्जलि के अनुसार क्षणों के किस प्रतियोगी का स्वरूप परिणाम के अन्त में समझ में आता है?

Correct Answer: (c) क्रम
Solution:

महर्षि पतंजलि के अनुसार क्षणों के क्रम प्रतियोगी का स्वरुप परिणाम के अन्त में समझ में आता है। महर्षि पतंजलि ने योग को लिखित रूप में संगृहित किया और योग सूत्र की रचना की। योग - सूत्र की रचना के कारण पतंजलि को योग का पिता कहा जाता है।

पतंजलि के योग को ही अष्टांग योग या राजयोग कहा जाता है। महर्षि पतंजलि का योगसूत्र योगदर्शन का प्रथम व्यवस्थित एवं वैज्ञानिक ग्रन्थ है। योगदर्शन को चार पादों में विभाजित किया गया है-

I. समाधिपाद II. साधनापाद III. विभूतिपाद IV. कैवल्यपाद

22. महर्षि पतञ्जलि के अनुसार इष्ट देवता का साक्षात्कार किससे होता है?

Correct Answer: (c) स्वाध्याय
Solution:

महर्षि पतंजलि के अनुसार इष्ट देवता का साक्षात्कार स्वाध्याय से होता है। जिनसे अपने कर्तव्य अकर्तव्य का ज्ञान हो, ऐसे शास्त्रों का अध्ययन और इष्ट देवता का नाम जाप इत्यादि ही स्वाध्याय है। तप से शरीर एवं इन्द्रियों की शुद्धि होती है।

"तप स्वाध्यायेश व्रप्रणिधानानि क्रियायोगा" अर्थात् तप, स्वाध्याय तथा ईश्वरप्रणिधान की संयुक्त साधना क्रियायोग कहलाती है, जिसका उद्देश्य समाधि भाव को प्राप्त करना व क्लेशों को क्षीण करना है।

23. "तज्जः संस्कारोऽन्यसंस्कार प्रतिबन्धी" का पातञ्जल योग सूत्रानुसार सही संदर्भ चुनिए :

Correct Answer: (a) समाधिपाद/50
Solution:

पातञ्जल योगसूत्र के समाधिवाद के 50/51 सूत्र इस प्रकार हैं -

"तज्जः संस्कारोंऽन्यसंस्कार प्रतिबन्धी" ।150।। (समाधिपाद - 50)
"तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निबजः " ।। 51।। (समाधिपाद - 51)

Note - योगसूत्रों की संख्या इस प्रकार है -

(i) समाधिपाद - कुल 51 सूत्र
(ii) साधन पाद कुल 55 सूत्र
(iii) विभूति पाद कुल 55 सूत्र
(iv) कैवल्य पाद कुल 34 सूत्र

24. पातञ्जल योग सूत्रानुसार प्रकृति के गुणों में सर्वथा या तृष्णा के अभाव की स्थिति है -

Correct Answer: (b) पर वैराग्य
Solution:

पातञ्जल योग सूत्रानुसार प्रकृति के गुणों में सर्वथा या तृष्णा के अभाव की स्थिति पर वैराग्य होती है।

दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकार संज्ञा वैराग्यम् ।।1.15।। (समोधिपाद)

अर्थात् - देखे हुए और सुने हुए विषयों में सर्वथा तृष्णारहित है, उसका वैराग्य, अपर वैराग्य नाम वाला है।

"तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम् ।।1.16।। (समाधिपाद)

अर्थात् पुरुष के असल स्वरुप के ज्ञान से जो प्रकृति के गुणों में तृष्णारहित हो जाना है, वह पर वैराग्य है। पतंजलि योगसूत्र के चार पादों में प्रथम पाद समाधिपाद में योग के शुद्धतम स्वरूप, उसके फल, वृत्तियो के प्रकार तथा उनके ठीक-ठीक स्वरुप, वैराग्य के भेद, अभ्यास और वैराग्य से वृत्ति निरोध, ईश्वर के सच्चे स्वरूप, योग साधना के मार्ग में आने वाली बाधाओं का विवेचन, जप अनुष्ठान की विधि एवं मनोनिरोध हेतु विविध उपायों का वर्णन, प्रसन्नचित रहने के उपाय, समापत्ति के स्वरूप तथा ऋतभरा प्रज्ञा के लक्षण आदि का वर्णन किया गया है।

25. शिव संहिता में 'स्तोकं स्तोकमने कधा' प्रक्रिया से भोजन का विधान किस अध्याय में वर्णित है?

Correct Answer: (c) तृतीय
Solution:

शिव संहिता में "स्तोकं स्तोकमने कधा" प्रक्रिया से भोजन का विधान तृतीय अध्याय में वर्णित है।

ततोऽभ्यासे स्थिरीभूते न ताहडू नियमग्रहः ।
अभ्यासिना विभोक्तव्यं स्तोकं स्तोकमने कधा।।

पूर्वोक्तकाले कुयात्तु कुम्भकान प्रतिवासरे ।
ततो यथेष्टशक्तिः स्योद्योगिनो वायुधारणे ।।

अर्थात् - जब अभ्यास दृढ़ हो जाए तब उक्त नियमों के पालन की आवश्यकता नहीं रहती। योगाभ्यासी को थोड़ा-थोड़ा भोजन अनेक बार करना चाहिए। नित्य प्रति पूर्वोक्त प्रकार से कुम्भक करें। इससे कुंभक सिंह हो जाता है और साधक को इच्छानुसार वायु के धारण करने की शक्ति प्राप्त हो जाती है।

26. पाँच उपप्राण में से डकार द्वारा कौन सी प्राण उदरीय दबाव को हल्का करती है?

Correct Answer: (c) नाग
Solution:

पांच उपप्राण में से डकार द्वारा नाग प्राण उदरीय दबाव को हल्का करती है। हमारा शरीर जिस तत्व के कारण जीवित रहता है, उसका ही नाम 'प्राण' है

शरीर के बलवान व निरोग होने पर ही भौतिक व आध्यात्मिक लक्ष्यों की प्राप्ति की जा सकती है, इसलिए हमें प्राणों की रक्षा करनी चाहिए अर्थात् शुद्ध आहार, प्रगाढ़ निद्रा, ब्रह्मचर्य, प्राणायाम आदि के माध्यम से शरीर को प्राणवान बनाना चाहिए। मुख्यतः प्राण 5 प्रकार के बताए गए हैं - (1) प्राण (2) अपान (3) समान (4) उदान और (5) व्यान ।

जबकि उपप्राण 5 प्रकार के बताएं गए हैं -

(i) नाग - यह कण्ठ से मुख तक रहता है। डकार, चिकी आदि कर्म इसी के द्वारा होते हैं।
(ii) कूर्म - इसका स्थान मुख्य रूप से नेत्र गोलक है। यह नेत्र गोलकों में रहते हुए उन्हें दाएं बाएँ, ऊपर-नीचे घुमाने की तथा पलकों को खोलने बन्द करने के क्रिया करता है। आंसू भी इसी के सहयोग से निकलते हैं।
(iii) कृकल - यह मुख से हृदय तक के स्थान में रहता है तथा जंभाई, भूख, प्यास आदि को उत्पन्न करने का कार्य करता है।
(iv) देवदन्त - यह नासिका से कण्ठ तक के स्थान में रहता है, इसका कार्य छींक, आलस्य, तन्द्रा तथा निद्रा आदि को लाने का है।
(v) धनंजय - यह सम्पूर्ण शरीर में व्यापक है। इसका कार्य शरीर के अवयवों को खीचें रखना व माँसपेशियों को सुंदर बनाना है। शरीर में से जीवात्मा के निकल जाने पर यह भी निकल जाता है, फलतः इस उपप्राण के अभाव में शरीर फूल जाता है।

27. "व्योम पञ्चक" का वर्णन किस ग्रन्थ में किया गया है?

Correct Answer: (c) सिद्धसिद्धान्त पद्धति
Solution:

"व्योमपंचक” का वर्णन "सिद्धसिद्धान्त पद्धति " ग्रन्थ में किया गया है। सिद्ध सिद्धान्त पद्धति का अर्थ है प्रत्यक्ष अनुभूत सत्य के निश्चित मत का सूक्ष्म मार्ग एकांत स्थान में गुरु के द्वारा निर्दिष्ट साधना के आश्रयण से गहन ध्यानावस्था में स्थित रहने से उसका अनुभव होने लगता है तथा इसका समापन पूर्णता अथवा समाधि में होता है।

सिद्धसिद्धान्त पद्धति में 6 विषयों पर गहन विचार किया गया है -

(i) पिण्ड की उत्पत्ति
(ii) पिण्ड विचार
(iii) पिण्ड ज्ञान
(iv) पिण्ड के आधार
(v) पिण्ड पद का समरस भाव
(vi) अवधूत योगी के लक्षण अधिकारी एवं अनाधिकारी शिष्य

28. सिद्धसिद्धान्त पद्धति में सदगुरु के विषय में किस अध्याय में चर्चा की गयी है?

Correct Answer: (d) पचम
Solution:

सिद्धसिद्धान्त पद्धति में सतगुरु के विषय में पंचम अध्याय में चर्चा की गयी है। सिद्धसिद्धान्त पद्धति में तीन आसनों का वर्णन किया गया है। सिद्धसिद्धान्त पद्धति एक अद्वैत रूपरेखा पर आधारित है, जहाँ योगी सार्वभौमिक के साथ व्यक्तिगत आत्मा की पहचान सहित सभी प्राणियों में 'मैं' और 'स्वयं' सभी को देखता है। सिद्धसिद्धान्त पद्धति के भाग दो में 9 चक्रों को बताया गया है।

29. गोरक्ष संहिता में कितनी मुख्य नाड़ियों के नाम बताये गए हैं?

Correct Answer: (a) दस
Solution:

गोरक्ष संहिता में मुख्य रूप से दस नाड़ियों के नाम बताएं गए हैं। गोरक्ष संहिता के अनुसार इसके अभ्यास से अनेक सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। वृद्धावस्था में शरीर पर कहीं झुर्रियां नहीं पड़ती, बाल सफेद नही होते, अंग नहीं कांपते, शरीर मुड़ता नहीं, पाचन क्रिया तेज रहती है, प्राण सूक्ष्म होकर सुषुम्ना में गमन करने लगता है। इड़ा-पिगंला नाड़ियों में प्राण संचार से समाधि लग जाती है। शरीर निश्चेष्ट होकर मृतवत् हो जाता है।

30. हठ प्रदीपिका के किस अभ्यास के द्वारा अनवरत उड़ान भरते हुए महाखग की गति को रोककर सुषुम्ना उड़ान भरने के लिए प्रेरित किया जाता है?

Correct Answer: (c) उड्डियान बंध
Solution:

हठ प्रदीपिका के उड्डियान बन्ध अभ्यास के द्वारा अनवरत् उड़ान भरते हुए महाखग की गति को रोककर सुषुम्ना में उड़ान भरने के लिए प्रेरित किया जाता है। उड्डियान बन्ध के अभ्यास से आमाशय, लीवर व गुर्दे सक्रिय होकर अपना कार्य ठीक तरह से करने लगते हैं।

साथ ही इन अंगों से सम्बन्धित सभी तरह के रोग दूर हो जाते हैं। इस बन्ध से पेट, पेडु और कमर की मांसपेशियाँ सक्रिय होकर शक्तिशाली बनती हैं तथा अजीर्ण को दूर कर पाचन शक्ति को बढ़ाता है। यह बन्ध अभ्यास पेट और कमर की चर्बी को कम करने में भी सहायक होता है।

उदरे पश्चिम नाभिर्ध्व तु कारयेत्।
उड्डीयानं कुरुते यस्मादविश्रान्तं महाखगः ।।

उड्डीयानं त्वसौ बन्धौ मृत्युमातंगकेसरी ।
समग्राद बन्धनाद्धयेतदुड्डीयानं विशिष्यते ।।
उड्डीयाने समभ्यस्ते मुक्तिः स्वाभाविकी भवेत्।।

अर्थात् उड्डीयान का अर्थ ऊँचा उड़ना होता है। इस क्रिया में ऊर्जा अधोभाग से उठकर उर्ध्वभाग तक प्रभावित होती है या जब शक्ति उर्ध्वमुखी होकर सुषुम्ना में प्रवेश करे, उसे उड्डीयन बन्ध कहते हैं।