Solution:"अजो नित्य शाश्वतोयं पुराणों ।। यह कठोपनिषद तथा श्रीमदभगवत गीता में वर्णित है।
मूल श्लोक
न जायते म्रियते वा कदाचि
त्रायं भूत्वा भविता। वा न भूयः ।।
अजो नित्यः शाश्वतोयंऽपुराणो
न हन्यते हन्यमाने शरीरे ।।
(श्रीमद् भगवत गीता - 112.2011)
अर्थात् - यह शरीर न कभी जन्मता है और न कभी मरता है तथा यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला नहीं है। यह जन्म रहित, नित्यनिरन्तर रहने वाला, शाश्वत और पुराण (अनादि) है। शरीर के मर जाने पर भी यह नहीं मारा जाता।
न जायते म्रियते व विपश्चिन्नायं कुतश्चिन्न वभूव कश्चित्। अजो नित्यः शाश्वतोयं पुराणों न हन्यते हन्यमाने शरीरे ।। (कठोपनिषद) अर्थात् - इस “प्रज्ञामय" का न जन्म होता है न मरण; न यह कहीं से आया है, न यह कोई व्यक्ति विशेष है, यह अज है, नित्य है, शाश्वत है, पुराण है, शरीर का हनन होने पर इसका हनन नहीं होता है।