Solution:पतंजलि योगसूत्र के द्वितीय पाद अर्थात् साधनपाद में प्रारम्भिक साधक के लिए योग के साधनों का वर्णन किया गया है अर्थात वे उपाय जिनसे योग मार्ग प्रशस्त होता है, अतः इनका नाम साधनपाद है। इस द्वितीय पाद में क्रिया योग और उसका फल अविधा आदि क्लेश एवं उनका स्वरुप और उनके नाश के उपाय, क्लेश मूल कर्माशय और उसका फल, विवेकी के लिए सबकुछ दुःख ही है और उसको हटाने के उपाय, दृश्य का स्वरूप, योग के आठ अंग और उनके फल, प्राणायाम का लक्षण तथा उसके भेद और फल एवं प्रत्याहार का स्वरुप आदि विषयों पर संक्षिप्त में सूत्र के रूप में स्पष्ट किया गया है।
व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्ध -
भूमिकत्वानवस्थितत्वानिचित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः ।।1.30 ।।
अर्थात् व्याधि (रोग), स्त्यान (मानसिक जड़ता) संशय (संदेह), प्रमाद, आलस्य, अविरति (विषयतृष्णा), भ्रान्ति दर्शन (मिथ्या अनुभव), अलब्ध भूमिकत्व (समाधि नहीं लग पाना), अनवस्थितत्वानि (समाधि लाभ होने पर भी अधिक देर समाधि में नहीं ठहर पाना) ये चित्त के नौ क्षोभ या योग के मूल विघ्न बाधाएं हैं। स्पष्ट है कि व्यवस्थित क्रम इस प्रकार है -
b. संशय
d. प्रमाद
e. अविरति
a. भ्रान्ति दर्शन
c.अलब्धभूमिकत्व ।