यूजीसी NTA नेट/ जेआरएफ परीक्षा, जून 2020 योग (YOGA)

Total Questions: 100

91. नीचे दिए गए गद्यांश को पढ़िए और प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

कुंभक प्राणायाम का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पहलू है इससे शरीर के कार्य और उच्चतर स्तरों में अंतर्निहित क्षमता प्रभावित होती है। श्वास को बाहर रोके रखना 'बाह्य कुंभक' कहलाता है जबकि श्वास को अन्दर रोक कर रखना 'अंतः कुंभक' कहलाता है। श्वास पर नियंत्रण के द्वारा की जाने वाली इन दोनों क्रियाओं को 'सहित कुंभक' कहा जाता है।

कुंभक की एक अन्य प्रक्रिया जो स्वतः होती है उसे 'केवल कुंभक' कहा जाता है। सूर्यभेदी के अभ्यास में श्वास लेने का कार्य दायी नासिका के माध्यम से किया जाता है, जिससे पिंगला नाड़ी सक्रिय होती है तथा बांयी नासिका से श्वास छोड़ा जाता है।

एपिग्लॉटिस के संकुचन के साथ गहरी सांस लेना उज्जायी है। सीतकारी सुख और दन्त के माध्यम से अंतः श्वसन द्वारा किया जाता है। शीतली मुख और मुड़ी हुई जीभ के माध्यम से अंतःश्वसन द्वारा की जाती है। भत्रिका तीव्र श्वसन की प्रक्रिया है। भ्रामरी में श्वास छोड़ते हुए भ्रमर की ध्वनि उत्पन्न की जाती है।

मूर्च्छा में श्वास रोकने पर बल दिया जाता है ताकि बेहोशी का भाव उत्पन्न हो । प्लाविनी का अभ्यास उदर में वायु भरकर किया जाता है। बहुत से साधकों का मानना है कि सहित कुंभक का प्रभाव चेतन और अवचेतन स्तरों पर अर्थात् शरीर, प्राण, मन और चित्त पर पड़ता है।

मुड़ी हुई जीभ से अन्तःश्वसन किस अभ्यास में किया जाता है? 

Correct Answer: (d) शीतली
Solution:

मुड़ी हुई जीभ से अन्तः श्वसन शीतली अभ्यास में किया जाता है। सीतकारी सुख और दत्त के माध्यम से अन्तःश्वसन द्वारा किया जाता है।

92. सहित कुंभक में सिद्धि के फलस्वरूप निम्नलिखित में से किस पर प्रभाव नहीं पड़ता है?

Correct Answer: (c) आत्मा
Solution:

सहित कुंभक में सिद्धि के फलस्वरूप निम्नलिखित में से 'आत्मा' पर प्रभाव नही पड़ता है। जबकि शरीर, मन, प्राण पर प्रभाव पड़ता है। श्वास पर नियंत्रण के द्वारा की जाने वाली इन बाह्य कुंभक तथा अन्तःकुम्भक के क्रियाओं को सहित कुंभक कहा जाता है।

93. किस अभ्यास में एपिग्लौटिस के संकुचन के साथ गहनश्वसन होता है?

Correct Answer: (c) उज्जायी
Solution:

(1) एपिग्लॉटिस के संकुचन के साथ गहरी साँस लेना उज्जायी है।
(2) भस्त्रिका यह तीव्र श्वसन की प्रक्रिया है।
(3) भ्रामरी - भ्रामरी में श्वसन छोड़ते हुए भ्रमर की ध्वनि उत्पन्न की जाती है।
(4) प्लाविनी का अभ्यास उदर में वायु भरकर किया जाता है।

94. कुंभक जो स्वतः होता है, इसे क्या कहा जाता है?

Correct Answer: (a) केवल कुंभक
Solution:कुंभक की एक अन्य प्रक्रिया जो स्वतः होती है उसे 'केवल कुंभक' कहा जाता है।

95. श्वास पर नियंत्रण के माध्यम से किए जाने वाले कुंभक के रूप हैं

A. अंतः कुंभक
B. बाह्य कुंभक
C. सहित कुंभक
D. केवल कुंभक

नीचे दिये गये विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:

Correct Answer: (a) केवल A, B और C
Solution:

श्वास पर नियंत्रण के माध्यम से किये जाने वाले कुंभक के रूप में से अधिक सर्वाधिक उपयुक्त उत्तर है -
(a) अन्तकुंभक
(b) बाह्यकुंभक
(c) सहितकुंभक

96. नीचे दिए गए गद्यांश को पढ़िए और प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

अभ्यास-वैराग्य अधिकतम रूप से चित्तवृत्तियों कम कर सकता है। पतंजलि ने 'तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः' की पुनः व्याख्या की है। स्थिर स्थिति बनाए रखने के लिए निरंतर यत्न किया जाना चाहिए जिससे एकाग्रता की स्थिति में पहुंचने में मदद मिलती है। इसलिए महर्षि ने साधक के हितार्थ एकाग्रता प्राप्ति के क्रमबद्ध उपागम के लिए अष्टांग योग का वर्णन किया।

सभी योगाभ्यासों में यत्न अथवा उन्मुखी प्रयास ही मूलभूत तत्व है। अब हम आसन जो अष्टांग योग का भाग है, के बारे में चर्चा करें। यहां आसन, अभ्यास का मूलभूत तत्व यत्न है जो निम्नलिखित सभी अभ्यासों में निश्चित रूप में शामिल है।

(1) श्वसन दर कम करने का प्रयास करना। (2) आसन की सही स्थिति प्राप्त करने का प्रयास 'स्थिति' ही है। (3) चित्रवृत्ति पर नियंत्रण के लिए शरीर अथवा बाह्य समस्थिति पर ध्यान केंद्रित करना जो स्थिति का भाग है। (4) साधक को दैनंदिन कार्य के लिए एक ही शांत स्थल का चयन करना चाहिए। (5) इन अभ्यासों को कमोबेश एक ही समय में किया जाना चाहिए ताकि विभिन्न शारीरिक तंत्रो के लय को ब्रह्मांड के साथ सहकालिक किया जा सके।

सूर्योदय और सूर्यास्त के समय शरीर के लय को सहकालि करना सदैव आसन होता है। वायु और अग्नि के कारण इस समय में इनकी तीव्रता में बदलाव आता है। जिसके शरीर प्रभावित होता है। तापक्रम सूर्योदय के समय गिरने से आरंभ होकर सूर्यास्त के समय तक क्रमशः चरम तक पहुंच जाता है।

तापक्रम में होने वाले इन परिवर्तनों के कारण पार्थिव वायु में गति उत्पन्न होती है जिसका प्रभाव शरीर पर भी पड़ता है। व्यक्ति में आंत्र की गति के लिये यह महत्वपूर्ण है। जिसके कारण संपूर्ण शरीर में वातदोष स्थिर हो जाता है। अन्य दोष वात दोष से नियंत्रित होते हैं।

उपर्युक्त गद्यांश के अनुसार सही उत्तर चुनकर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

चित्तवृत्ति निवारण की दो विधियां हैं :

A. वैराग्य
B. मुमक्षुत्व
C. अभ्यास
D. पादसेवन

नीचे दिये गये विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:

Correct Answer: (e) *
Solution:

अभ्यास वैराग्य अधिकतम रूप से चित्तवृत्तियों को कम कर सकता है। पतञ्जलि ने 'तत्र स्थितौ यत्नोभ्यासः' की पुनः व्याख्या की है।

97. अभ्यास के साथ किया जानेवाला प्रयास हैं

Correct Answer: (b) यत्न
Solution:

अभ्यास के साथ किया जाने वाला प्रयास 'यत्न' है। स्थिर स्थिति बनाए रखने के लिए निरंतर यत्न किया जाना चाहिए जिससे एकाग्रता की स्थिति में पहुंचने में मदद मिलती है।

98. लेखक ने 'यत्न' में कितने पद बताए हैं?

Correct Answer: (d) 5
Solution:

लेखक ने 'यत्न' में 5 भेद बताए हैं। अष्टांग योग का भाग आसन है। यहाँ आसन, अभ्यास का मूलभूत तत्व यत्न है।

99. निम्नलिखित में से किसके कारण वायु में गति उत्पन्न होती है?

Correct Answer: (a) सूर्य
Solution:

तापक्रम सूर्योदय के समय गिरने से आरम्भ होकर सूर्यास्त के समय तक क्रमशः चरम तक पहुंच जाता है। तापक्रम में होने वाले इन परिवर्तनों के कारण पार्थिव वायु में गति उत्पन्न होती है।

100. आंत्र की गति का मुख्य बिन्दु हैः

Correct Answer: (c) पार्थिव वायु
Solution:

व्यक्ति में आंत्र (Inestine) की गति के लिए पार्थिव वायु का मुख्य बिन्दु है। जिसके कारण सम्पूर्ण शरीर में वातदोष स्थिर हो जाता है।