अभ्यास-वैराग्य अधिकतम रूप से चित्तवृत्तियों कम कर सकता है। पतंजलि ने 'तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः' की पुनः व्याख्या की है। स्थिर स्थिति बनाए रखने के लिए निरंतर यत्न किया जाना चाहिए जिससे एकाग्रता की स्थिति में पहुंचने में मदद मिलती है। इसलिए महर्षि ने साधक के हितार्थ एकाग्रता प्राप्ति के क्रमबद्ध उपागम के लिए अष्टांग योग का वर्णन किया।
सभी योगाभ्यासों में यत्न अथवा उन्मुखी प्रयास ही मूलभूत तत्व है। अब हम आसन जो अष्टांग योग का भाग है, के बारे में चर्चा करें। यहां आसन, अभ्यास का मूलभूत तत्व यत्न है जो निम्नलिखित सभी अभ्यासों में निश्चित रूप में शामिल है।
(1) श्वसन दर कम करने का प्रयास करना। (2) आसन की सही स्थिति प्राप्त करने का प्रयास 'स्थिति' ही है। (3) चित्रवृत्ति पर नियंत्रण के लिए शरीर अथवा बाह्य समस्थिति पर ध्यान केंद्रित करना जो स्थिति का भाग है। (4) साधक को दैनंदिन कार्य के लिए एक ही शांत स्थल का चयन करना चाहिए। (5) इन अभ्यासों को कमोबेश एक ही समय में किया जाना चाहिए ताकि विभिन्न शारीरिक तंत्रो के लय को ब्रह्मांड के साथ सहकालिक किया जा सके।
सूर्योदय और सूर्यास्त के समय शरीर के लय को सहकालि करना सदैव आसन होता है। वायु और अग्नि के कारण इस समय में इनकी तीव्रता में बदलाव आता है। जिसके शरीर प्रभावित होता है। तापक्रम सूर्योदय के समय गिरने से आरंभ होकर सूर्यास्त के समय तक क्रमशः चरम तक पहुंच जाता है।
तापक्रम में होने वाले इन परिवर्तनों के कारण पार्थिव वायु में गति उत्पन्न होती है जिसका प्रभाव शरीर पर भी पड़ता है। व्यक्ति में आंत्र की गति के लिये यह महत्वपूर्ण है। जिसके कारण संपूर्ण शरीर में वातदोष स्थिर हो जाता है। अन्य दोष वात दोष से नियंत्रित होते हैं।
उपर्युक्त गद्यांश के अनुसार सही उत्तर चुनकर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए:
चित्तवृत्ति निवारण की दो विधियां हैं :
A. वैराग्य
B. मुमक्षुत्व
C. अभ्यास
D. पादसेवन
नीचे दिये गये विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए: