Solution:भावनायां लिङ्गादिज्ञानं करणं शब्दभावनाभाव्यनिवर्तकत्वेन भवति।
तस्य च करणत्वं न भावनोत्पादकत्वेन तत्पूर्वमपि तस्याः शब्दे सत्वात् किन्तु भावना ज्ञापकत्वेन शब्द भावनाभाव्यनिवर्तकत्वेन वा अर्थात् साधन की आकांक्षा होने पर लिङ्ग आदि का ज्ञान साधन के रूप में अन्वित होता है। उस लिङ्ग आदि के ज्ञान की करणता इसलिये नहीं है कि उससे भावना की उत्पत्ति होती है।
बल्कि उसके पहले भी भावना उसमें रहती है। अपितु लिङ्ग आदि का ज्ञान भावना व्यापक के रूप में अथवा शाब्दी भावना के साधक के रूप में करण में होता है।