यूजीसी NTA नेट जेआरएफ परीक्षा, दिसम्बर-2019 (संस्कृत)

Total Questions: 50

1. अधस्तनेषु चित्तभूमिषु न गण्येते-

(a) चलम् (b) मूढम् (c) विक्षिप्तम् (d) अचलम्
समुचितं विकल्पं चिनुत- 

Correct Answer: (b) (a) एवं (d)
Solution:

चित्त की पाँच भूमियाँ (दशायें) हैं क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त, एकाग्र और निरुद्ध ये पाँच चित्तभूमियाँ हैं, जबकि चलम् और अचलम् इन दोनों की गणना चित्तभूमियों के अन्तर्गत नहीं की जाती है।

2. 'यस्य शुष्माद्रोदसी अभ्यसेताम्' अस्मिन् मन्त्रांशे 'शुष्मात्' पदस्य अर्थो निर्धार्यताम्-

(a) बलात् (b) पूजनात् (c) पराक्रमात् (d) शस्त्रात्
अत्रोचितमुत्तरं चिनुत

Correct Answer: (d) (a) एवं (c)
Solution:

'यस्य शुष्माद्रोदसी अभ्यसेताम्' इस मंत्र में 'शुष्मात्' पद का अर्थ 'बलात्' और 'पराक्रमात्' है। भाष्यकार सायण ने शुष्मात् पद का अर्थ 'शरीर से' और 'बल से' माना है। जबकि मैकडॉनल ने इस पद का अर्थ 'प्रचण्ड से' तथा 'पराक्रम से' माना है।

3. अधोऽङ्कितेषु केन सह कस्य सम्बन्धः ?

तालिका - I (संप्रदाय)तालिका - II (सिद्धांत)
(a) माध्यमिकाः(i) वाह्यार्थशून्यम्
(b) योगाचाराः(ii) वाह्यार्थप्रत्यक्षम्
(c) सौत्रान्तिकाः(iii) सर्वं शून्यम्
(d) वैभाषिकाः(iv) वाह्यार्थानुमेयम्

समुचितं विकल्पं चिनुत-

Correct Answer: (a) (a) (iii), (b)-(i), (c)-(iv), (d)-(ii)
Solution:
तालिका - I (संप्रदाय)तालिका - II (सिद्धांत)
माध्यमिकाःसर्वं शून्यम्
योगाचाराःवाह्यार्थ शून्यम्
सौत्रान्तिकाःवाह्यार्थानुमेयम्
वैभाषिकाःवाह्यार्थप्रत्यक्षम्

4. यदङ्ग दाशुषे त्वमग्ने भद्रं करिष्यसि। तवेत्तत्सत्यमङ्गिरः।

अत्र 'अङ्ग' इति कस्मिन्नर्थे प्रयुक्तोऽयं शब्दः? सायणदिशा निर्दिश्यताम्-

Correct Answer: (a) अभिमुखीकरणार्थे
Solution:

यदुङ्ग दाशुषे त्वमग्ने भद्रं करिष्यसि । तवेत्तत्सत्यमङ्गिरः । यह श्लोक अग्नि सूक्त का है। श्लोक में दिये गये 'अङ्ग शब्द का अर्थ भाष्यकार सायण के अनुसार अभिमुख अर्थात् सम्मुख करने के अर्थ में है। किसी का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करने के लिये प्रयुक्त सम्बोधनात्मक पद 'अङ्ग' है, यह मत पाश्चात्य विद्वानों को भी अभीष्ट था।

5. आधिदैविकदुःखेषु गण्येते-

(a) झञ्झावातः (b) अश्वाघातः (c) पश्वाघातः (d) भूकम्पः
अत्र समुचितं विकल्पं चिनुत- 

Correct Answer: (b) (a) एवं (d)
Solution:

आधिदैविक दुःखों में झञ्झावत तथा भूकम्प गिने जाते हैं। यक्ष, राक्षस, विनायक, शनि, राहु आदि ग्रह नक्षत्रों से उत्पन्न होने वाला दुःख आधिदैविक दुःख होता है।

6. यजुर्वेदसंहितायां प्राधान्येन निरुपणं प्राप्यते

Correct Answer: (b) यज्ञानाम्
Solution:

यजुर्वेद संहितायां प्राधान्येन यज्ञानां निरूपणं प्राप्यते । अर्थात् यजुर्वेद संहिता में प्रधान रूप से यज्ञों का निरूपण प्राप्त होता है। यजुष् शब्द का मुख्य अर्थ है-
(1) यजुर्यजते अर्थात् यज्ञ से सम्बद्ध मंत्रों को यजुष् कहते हैं।
(2) इज्यतेऽनेनेति यजुः अर्थात् जिन मंत्रों से यज्ञ किया जाता है।
यजुर्वेद संहिता का यज्ञ के कर्मकाण्ड से साक्षात् सम्बन्ध है, अतः इसे 'अध्वर्युवेद' भी कहते हैं।

7. ध्वन्यालोके प्रतीयमानस्य तृतीयः प्रभेदः कः ?

Correct Answer: (c) रसादिः
Solution:

ध्वन्यालोके प्रतीयमानस्य तृतीय प्रभेदः रसादिः अर्थात् ध्वन्यालोक में वर्णित प्रतीयमान का तीसरा भेद रस है। प्रतीयमान अर्थ का प्रथम भेद वस्तु, द्वितीय भेद अलङ्कार तथा तृतीय भेद रस है।
ध्वन्यालोक काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ है, जो आनन्दवर्धन की कृति है।

8. 'ननु तन्तुसम्बन्ध इव तुर्यादिसम्बन्धोऽपि पटस्य विद्यते, तत्कथं तन्तुष्वेव पट समवेतो जायते, न तुर्यादिषु ? सत्यम्। द्विविधः सम्बन्धः संयोगः समवायश्चेति। तत्रायुतसिद्धयोः सम्बन्धः समवायः। अन्ययोस्तु संयोग एव।

अत्र उचितमुत्तरं चिनुत- 

Correct Answer: (a) तन्तुः पटस्य समवायिकारणम् अयुतसिद्धत्वात्।
Solution:

पट का तन्तु के साथ जिस प्रकार का सम्बन्ध है, वैसा ही तुरी आदि के साथ, फिर क्यों तन्तुओं में ही समवाय सम्बन्ध से पट उत्पन्न होता है और तुरी आदि में नहीं।

सम्बन्ध दो प्रकार का होता है-संयोग और समवाय। उनमें जो दो अयुतसिद्ध पदार्थों का सम्बन्ध होता है, वह समवाय कहा जाता है। शेष अन्य पदार्थों का सम्बन्ध संयोग कहा जाता है।

अयुतसिद्ध का अर्थ है- अपृथक-सिद्ध । अर्थात् जिन दो पदार्थों में से एक जब तक रहता है, वह दूसरे सम्बन्धी पर आश्रित होकर ही रहता है, वे अयुत सिद्ध कहलाते हैं।

अतः स्पष्ट है कि तन्तु और पट अयुतसिद्ध हैं तथा उनमें समवाय सम्बन्ध है।

9. 'क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः ' इति कथनमस्ति-

Correct Answer: (b) योगदर्शने
Solution:

'क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः इति कथनम् योगदर्शने अस्ति।
योगदर्शन के प्रतिपादक महर्षि पतञ्जलि हैं। योगदर्शन का मुख्य प्रयोजन 'समाधि लाभ' को प्राप्त करना है। उपरोक्त कारिका में ईश्वर को परिभाषित किया गया है

कारिका का आशय है- "अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश इन पञ्चक्लेशों, शुभाशुभ कर्मों तथा इन कर्मों के फलस्वरूप सुख-दुःख, आयु एवं भोगरूप विपाक और उन कर्मफल विपाकों के वासनारूपी संस्कार से सम्पर्क रहित पुरुष विशेष ही ईश्वर है।'

10. शुक्लयजुर्वेदसंहितायाः कतमोऽध्याय ईशोपनिषद्

Correct Answer: (c) चत्वारिंशत्तमः
Solution:

शुक्लयजुर्वेदसंहितायाः चत्वारिंशत्तमः अध्यायो ईशोपनिषदः। अर्थात् ईशोपनिषद् (ईशावास्योपनिषद्) शुक्ल यजुर्वेद संहिता के 40वें अध्याय में निहित है।