यूजीसी NTA नेट जेआरएफ परीक्षा, दिसम्बर-2019 (संस्कृत)

Total Questions: 50

11. "ब्रह्मचर्य भूमौ शय्या जटाऽजिनधारणमग्निहोत्राभिषेको देवतापित्रतिथिपूजा वन्यश्चाहारः" इति कौटिलीयमते कस्य धर्मोऽस्ति?

Correct Answer: (c) वानप्रस्थस्य
Solution:

ब्रह्मचारी होना, भूमि पर शयन करना, जनेऊ धारण करना, अग्निहोत्रादि हवन करना, देवता, पितरों और अतिथि पूजन करना तथा वन में भ्रमण करना या निवास करना ये सब वानप्रस्थ धर्म के लक्षण हैं, जो कौटिल्य ने अपने ग्रन्थ अर्थशास्त्र में बताये हैं।

12. चत्वारो वेदाः जगति प्रसिद्धाः सन्ति। एते ऋग्वेदः, यजुर्वेदः, सामवेदः, अथर्ववेदश्च। एतेषां मन्त्राणामर्थख्यापनाय बहवः आचार्याः प्रयत्नं कृतवन्तः तत्र दस्य प्रथमो भाष्यकारः स्कन्दस्वामी आसीत् । विस्तारपूर्वकं यज्ञपद्धतेः प्रथमं भाष्यं आचार्यसायणेन कृतम्। स एव कृष्णयजुर्वेदस्य भाष्यं प्रथमतया विरचितवान्। आनन्दतीर्थः, दयानन्दश्च वेदभाष्यं रचितवन्तौ।

उपर्युक्तेषु ऋग्वेदस्य प्रथमभाष्यकारः कः आसीत् ? 

Correct Answer: (b) स्कन्दस्वामी
Solution:

उपरोक्त गद्य के अनुसार, ऋग्वेद के प्रथम भाष्यकार स्कन्दस्वामी हैं, जो सायण के पूर्ववत आचार्य हैं।

13. मनुस्मृत्यनुसारं समुचितमस्ति-

Correct Answer: (a) आचार्यो ब्रह्मणो मूर्तिः
Solution:

मनुस्मृति के अनुसार, “आचार्यो ब्रह्मणो मूर्तिः” यह कथन समुचित है। अर्थात् आचार्य परमात्मा की मूर्ति है, पिता ब्रह्म की मूर्ति।
आचार्यो ब्राह्मणो मूर्तिः, पिता मूर्तिः प्रजापतेः।
माता पृथिव्या मूर्तिस्तु, भ्राता स्वो मूर्तिरात्मनः।।

14. दर्श नु विश्वदर्शतं दर्श रथमधि क्षमि। एता जुषत में गिरः॥

उपर्युक्तमन्त्रे 'गिरः' पदस्य अर्थी स्तः-
(a) पर्वतः
(b) गिरिः
(c) वाणी
(d) स्तुतिः
अत्र समीचीनमुत्तरं चिनुत- 

Correct Answer: (c) (c) एवं (d)
Solution:

उपर्युक्त मंत्र में दिये गये 'गिरः' शब्द का पर्याय वाणी एवं स्तुति दोनों है।

15. पुरुरवा उर्वशीसंवादसूक्ते कियन्तो मन्त्राः सन्ति?

Correct Answer: (d) अष्टादश
Solution:

पुरुरवा उर्वशीसंवादसूक्ते अष्टादश मन्त्राः सन्ति। अर्थात् पुरुरवा-उर्वशी संवाद सूक्त में 18 मन्त्र हैं। यह ऋग्वेद के दशम मण्डल का प्रसिद्ध 95वाँ सूक्त है। इसमें पुरुरवा और उर्वशी की प्रणय कथा वर्णित है।

16. सिद्धान्तकौमुदीमाश्रित्य प्रकरणानां समीचीनं क्रमं चिनुत-

Correct Answer: (b) कारकम्, तद्धितम्, परस्मैपदप्रक्रिया, कृदन्तः,
Solution:

सिद्धान्तकौमुदीमाश्रित्य प्रकरणानां कारकं तद्धितम् परस्मैपदप्रक्रिया, कृदन्तः उचितं क्रमं अस्ति अर्थात् सिद्धान्तकौमुदी के आश्रित प्रकरणों में कारक प्रकरण, तद्धित प्रकरण, परस्मैपदप्रक्रिया व कृदन्त प्रकरण व्याकरणिक दृष्टि से उचित क्रम है।

17. याज्ञवल्क्यस्मृतेः व्यवहाराध्याये प्रकरणानां समुचितं क्रमोऽस्ति-

Correct Answer: (c) ऋणादान - उपनिधि - साक्षि - लेख्य - दिव्य - दायविभाग - सीमाविवादप्रकरणम्
Solution:

याज्ञवल्क्यस्मृतेः व्यवहाराध्याये प्रकरणानां ऋणादानउपनिधि-साक्षि-लेख्य दिव्य-दायविभाग-सीमाविवादप्रकरणम् समुचितं क्रमो अस्ति। स्मृति साहित्य में मनुस्मृति के अनन्तर द्वितीय महत्त्वपूर्ण स्मृति में याज्ञवल्क्य स्मृति की गणना की जाती है।

18. मनुस्मृतेः टीकाकाराणां केन सह कस्य सम्बन्धः-

तालिका - I (टीकाकार)तालिका - II (टीका का नाम)
(a) गोविन्दराजः(i) मनुभाष्यम्
(b) कुल्लूकभट्टः(ii) मन्वाशयानुसारिणी-मनुटीका
(c) सर्वज्ञनारायणः(iii) मन्वर्थमुक्तावली
(d) मेधातिथिः(iv) मन्वर्थविवृति

अधस्तनेषु समीचीनं विकल्पं चिनुत- 

Correct Answer: (b) (a) (ii), (b)-(iii), (c)-(iv), (d)-(i)
Solution:

मनुस्मृतैः टीकाकाराणां अधस्तनेषु समीचीनं विकल्पः-
मनुस्मृति हिन्दू धर्म का एक प्राचीन धर्मशास्त्र (स्मृति) है।
इसे मानव-धर्म-शास्त्र, मनुसंहिता आदि नामों से भी जाना जाता है। मनुस्मृति पर अनेक टीकाकारों के नाम ज्ञात है-
(1) गोविन्दराज कृत मन्वाशयानुसारिणी मनुटीका
(2) कुल्लूकभट्ट कृत मन्वर्थमुक्तावली
(3) सर्वज्ञनारायण कृत मन्वर्थविवृति
(4) मेधातिथि कृत मनुभाष्य

19. 'सोऽर्थस्तद्व्यक्तिसामर्थ्ययोगी'- अत्र 'सः' पदस्य क आशयः-

Correct Answer: (b) व्यङ्गयः
Solution:

'सोऽर्थस्तव्यक्तिसामर्थ्ययोगी' अत्र 'सः' पदस्य आशयः व्यङ्गयः ।

20. 'यत्समवायिकारणप्रत्यासन्नमवधृतसामर्थ्य तदसमवायिकारणम् यथा तन्तुसंयोगः

पटस्यासमवायिकारणम्। तन्तुसंयोगस्य गुणस्य पटसमवायिकारणेषु तन्तुषु गुणिषु समवेतत्वेन समवायिकारणे अनन्यथासिद्धनियतपूर्वभावित्वेन पटं प्रति कारणत्वाच्च|
इति सिद्धान्तानुसारेण 'तन्तुसंयोगः' पटस्य कीदृशं कारणम् भवति ?

Correct Answer: (a) असमवायिकारणम्
Solution:

'यत्समवायिकारणप्रत्यासन्नमवधृतसामर्थ्य तदसमवायिकारणम् यथा- तन्तुसंयोगः पटस्यासमवायिकारणम्। तन्तुसंयोगस्य गुणस्य पटसमवायिकारणेषु तन्तुषु गुणिषु समवेतत्वेन समवायिकारणे प्रत्यासन्नत्वात्। अनन्यथासिद्ध नियतपूर्वभावित्वेन पट प्रति कारणत्वाच्च।' इति सिद्धान्तानुसारेण 'तन्तुसंयोगः' पटस्य असमवायिकारणम् भवति।

अर्थात् जो समवायिकारण में प्रत्यासन्न (= निकटतः सम्बद्ध) होता है और जिसकी (कार्य के प्रति) सामर्थ्य निश्चित होती है (अर्थात् जिसमें कारण का लक्षण घटित होता है) वह असमवायिकारण है। जैसे - तन्तुसंयोग पट का असमवायिकारण है।

क्योंकि तन्तुसंयोग गुण है, वह पट के समवायिकारण तन्तु नामक गुणी में समवाय सम्बन्ध से रहता है। अतः (पट के) समवायिकारण में प्रत्यासन्न है। और वह अनन्यथासिद्ध पूर्वभावी होने से पट के प्रति कारण भी है।