यूजीसी NTA नेट जेआरएफ परीक्षा, दिसम्बर-2019 (संस्कृत)

Total Questions: 50

41. साङ्ख्यदर्शनानुसारं पञ्चविंशतितत्त्वेषु गणना नास्ति--

Correct Answer: (b) पुद्गगलस्य
Solution:

सांख्यदर्शनानुसारं पञ्चविंशतितत्त्वेषु 'पुगलस्य' गणना नास्ति अर्थात् सांख्यदर्शन के अनुसार पच्चीस तत्वों में 'पुद्गगलस्य' की गणना नहीं की गई है। जबकि रसस्य, श्रोत्रस्य और जलस्य की गणना की गई है।

42. पाणिनीयशिक्षानुसारं लकारस्य भेदाः सम्भवन्ति- [ऌ]

Correct Answer: (c) हस्वप्लुतौ
Solution:

पाणिनीय शिक्षा के अनुसार लकार के हृश्व और प्लुत भेद होते हैं। इसका 'दीर्घ' भेद नहीं होता है। अतः लकार वर्ण के कुल 12 भेद किये जा सकते हैं।

उदाहरणः अ, इ, उ, ऋ18 (भेद) हस्व, दीर्घ, प्लुत
ए, ऐ,ओ, औ 12 (भेद) दीर्घ,प्लुत
ऌ→ 12 (भेद) हस्व, प्लुत

43. निरुक्तकारेण केन क्रमेण पदजातानि वर्णितानि ?

(a) आख्यातम् (b) उपसर्गाः (c) निपाताः (d) नाम
अत्र कः क्रमः ? स्पष्टयत् 

Correct Answer: (a) (iv), (i), (ii), (iii)
Solution:

निरुक्तकार ने पदों को चार भागों में विभाजित किया है। पदो का क्रम इस प्रकार है नाम, आख्यात, उपसर्ग तथा निपात
(1) नाम - "सत्वप्रधानानि नामानि" (सत्व प्रधानानि में सत्व शब्द का अर्थ क्रिया से भिन्न द्रव्य है)
(2) आख्यात- "भावप्रधानमाख्यातम्" (भाव प्रधान में भाव पद का अर्थ 'क्रिया' है)
(3) उपसर्ग - "प्रादयः उपसर्गाः क्रियायोगे (क्रिया के योग में प्र आदि 22 की उपसर्ग संज्ञा होती है) (4) निपात - "चादयोऽसत्तवे और प्रादयश्च" (इन सूत्रों के अनुसार चादि और प्रादिगण में पठित शब्दों की 'निपात' संज्ञा होती है।

44. 'मृगाक्षी' - शब्दे विद्यमानः 'मृग' इति शब्दः उदाहरणं विद्यते -

Correct Answer: (c) अर्थसङ्कोचस्य
Solution:

मृगाक्षी शब्द में विद्यमान 'मृग' शब्द अर्थसंकोच का उदाहरण है। यह अर्थ विस्तार का ठीक उल्टा होता है। इसमें अर्थ की परिधि पहले विस्तृत रहती है, फिर संकुचित हो जाती है।

उदाहरण के लिए संस्कृत 'मृग' का मूल अर्थ 'पशु' है। शिकार का वाचक मृगया तथा पशुओं के राजा 'सिंह के लिए' मृगराज के प्रयोग में मूल अर्थ आज भी सुरक्षित है।

किन्तु आगे चलकर इस शब्द के अर्थ में संकोच हो गया और सभी पशुओं का वाचक शब्द मृग केवल हिरण का वाचक हो गया। यह अर्थ संकोच संस्कृत में ही हो गया था। वस्तुतः अर्थ संकोच में 'सामान्य' से परिवर्तित होकर 'विशेष' हो जाता है। मृग 'सामान्य पशु' से 'विशेष पशु' हो गया।

अर्थ संकोच के अन्य उदाहरण - सरसिज, महापात्र, भार्या, गौ. श्राद्धम्, मनुष्य।

45. मनुस्मृतिकारेण 'नारा' इति शब्देन किं गृहीतम् ?

Correct Answer: (a) आपः
Solution:

मनुस्मृतिकारेण 'नारा' इति शब्देन आपः गृहीतम्। अर्थात् मनुस्मृति के अनुसार 'नारा' शब्द का अर्थ आपः (जल) है।
श्लोक आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः।
वा सदस्यायनं पूर्वे तेन नारायणः स्मृतः ।।
यह श्लोक मनुस्मृति के प्रथम अध्याय से लिया गया हैं। जिसमें 'जल' को 'नार' कहा गया हैं।

46. रामायणस्य बालकाण्डस्य सर्गानुसारम् उपाख्यानानां समुचितं क्रमोऽति -

Correct Answer: (b) क्रौञ्चवधाख्यानम् - ऋष्यशृङ्गाख्यानम् - अहिल्योद्धाराख्यानम् - शुनःशेपाख्यानम्-
Solution:

रामायण के बालकाण्ड में दिये गये विकल्पों के अनुसार सर्गों का उपाख्यान क्रम इस प्रकार है क्रौञ्चवधाख्यान, ऋषिशृङ्ग का आख्यान, अहिल्या उद्धार की कथा तथा शुनः शेपाख्यानम्। रामायण के बालकाण्ड में कुल 77 सर्ग हैं।

बालकाण्ड के आरम्भ के 4 सर्गों में रामायण की पूर्व पीठिका दी गयी है। नारद ने महर्षि वाल्मीकि को रामकथा सुनायी।

47. 'प्रवीणः' इति पदम् कयोः उदाहरणं वर्तते-

(a) अर्थसङ्कोचस्य (b) अर्थपरिवर्तनस्य (c) अर्थविस्तारस्य (d) अर्थहानेः
अधोलिखितेषु समुचितं विकल्पं चिनुत- 

Correct Answer: (b) (b) एवं (c)
Solution:

अर्थ परिवर्तन की दिशाएँ (प्रकार) अर्थ परिवर्तन किनकिन दिशाओं में होता है अथवा उसके कितने प्रकार होते हैं इस विषय पर सबसे पहलें फ्रांसीसी भाषा विज्ञान वेत्ता ब्रील ने विचार किया था।

उन्होंने तीन दिशाओं की खोज की अर्थ संकोच, अर्थविस्तार, अर्थादेश। अर्थ विस्तार - अर्थ विस्तार का अर्थ है अर्थ का सीमित क्षेत्र से निकलकर विस्तार पा जाना।

अतः 'प्रवीण' पद अर्थ परिवर्तन की दिशाओं के अन्तर्गत अर्थ विस्तार का उदाहरण है। प्रवीण मूलतः वीणा बजाने में पटु-प्रकृष्टो वीणायाम, अब किसी कार्य को करने में प्रवीण ।
अन्य उदाहरण - कुशल, निपुण, महाराज,श्रीगेश, गवेषणा, तैल

48. वेदान्तसारानुसारं 'तत्त्वमसि' इत्यत्र अखण्डार्थबोधकसम्बन्धः कतिविधः ?

Correct Answer: (b) त्रिविधः
Solution:

वेदान्तसार के अनुसार 'तत्त्वमसि' (वह तू है) इत्यादि वाक्य तीन सम्बन्धों से अखण्ड अर्थ बोध कराने वाला होता है। (1) समानाधिकरण (2) विशेषण विशेष्यभाव (3) लक्ष्य लक्षण भाव ये तीन सम्बन्ध होते हैं। 'तत्त्वमसि' महावाक्य वस्तुतः उपदेश वाक्य है। जो एक गुरु द्वारा अधिकारी प्रमाता को उपदेश रूप में दिया जाता है। 'तत्त्वमसि' यह ब्रह्म और जीव की एकता को बताता है।

49. 'गो + अग्रम्' इत्यत्र न सम्भवति -

Correct Answer: (d) संहिताया अभावः
Solution:
यहाँ पर ‘सर्वत्र विभाषा गो:’ सूत्र से -लौकिक एवं वैदिक संस्कृत के प्रयोगों में एङन्त ‘गो’ शब्द का पदान्त में विकल्प से प्रकृतिभाव होता है। गो + अग्रम् = गोअग्रम्, गोऽग्रम् (गाय का अग्रभाग) प्रकृतिभाव न होने के पक्ष में अवङ्आदेश होकर ‘गवाग्रम्’ भी बनता है।
‘अवङ्स्फोटायनस्य’ सूत्र से। और एङन्त पद गो के बाद अग्रम् के ‘अ’ स्वर आने पर पूर्वरूप सन्धि होकर = गोऽग्रम् ‘एङ: पदान्तादति’ से प्रकृतिभाव के अभाव में बना। अतः विकल्प (d) संहिताया अभाव: इसका सही उत्तर होगा।

50. 'राम' शब्दस्य पञ्चम्येकवचनस्य विषये समुचितं कथनं नास्ति-

Correct Answer: (c) अवसाने खरः स्थाने चरो भवति
Solution:

राम शब्द से पञ्चमी विभक्ति का एकवचन में 'ङसि' प्रत्यय आया है। उसके स्थान में ‘टाङसिङसामिनात्स्याः’ से आत् आदेश होने से राम + आत् यह स्थिति हुई। इसमें सवर्ण दीर्घ होकर रामात् बना। तब तकार झल् के पदान्त होने से ‘झलां जशोऽन्ते’ सूत्र से तकार के स्थान में दकार ‘जश्’ हुआ। तदनन्तर ‘झल्’ दकार की ‘विरामोऽवसानम्’ सूत्र से अवसान संज्ञा होने से अग्रिम सूत्र की प्रवृत्त होगी। ‘अवसाने झलां चरो वा स्युः’ अर्थात् अवसान में झलो को चर् विकल्प से हो। अतः ‘रामाद्’ में दकार के स्थान पर चर् तकार विकल्प से हुआ। अतः पञ्चमी एकवचन में रामाद् / रामात् दो रूप बनते हैं।