यूजीसी NTA नेट जेआरएफ परीक्षा, जून 2020 (संस्कृत)

Total Questions: 100

51. योगदर्शनानुसारेण अधोऽङ्कितेषु कस्य ग्रहणं क्रियायोगेऽस्ति।

Correct Answer: (d) स्वाध्यायस्य
Solution:

योगदर्शनानुसारेण 'स्वाध्यायस्य' ग्रहणं क्रियायोगेऽस्ति । अर्थात् योग दर्शन के अनुसार स्वाध्याय का ग्रहण क्रियायोग में होता है।

52. रससम्प्रदायस्य आचार्यों स्तः ?

(A) भरतमुनिः (B) वामनः (C) क्षेमेन्द्रः (D) अभिनवगुप्तः
अत्र समुचितं विकल्पं चिनुत

Correct Answer: (c) (A) एवम् (D)
Solution:

रसम्प्रदायस्य आचाय भरतमुनिः, अभिनवगुप्तः स्तः। भरतमुनि इनके द्वारा रचित ग्रंथ 'नाट्यशास्त्र' भारतीय नाट्य और काव्यशास्त्र का आदिग्रन्थ है। इसमें सर्वप्रथम रस सिद्धान्त की चर्चा की गयी है। सूत्र- 'विभावानुभाव विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रस निष्पत्तिः ।'

अभिनवगुप्त- अभिनवगुप्त दार्शनिक रहस्यवादी एवं साहित्यशास्त्र के मूर्धन्य आचार्य हैं। इन्होंने भरत मुनि के रससिद्धान्त की व्याख्या 'अभिव्यक्तिवाद' नाम से की है।

53. योगसूत्रानुसारेण लिखत अधोऽङ्कितेषु कयो द्वयोः समुचितंः सम्बन्धोऽस्ति?

(A) अनुमानप्रमाणम् (B) यमाः (C) चित्तभूमिः (D) चित्तवृत्तिः
अत्र समुचित विकल्पं चिनुत

Correct Answer: (b) (A) एवम् (D)
Solution:

योगसूत्रानुसारेण लिखत 'अनुमानप्रमाणम्', चित्तवृत्तिः समुचितः सम्बन्धोऽस्ति। आचार्य पतञ्जलि के योगसूत्र में चिन्तवृत्तियाँ पाँच हैं- (1) प्रमाण (2) विपर्यय (3) विकल्प (4) निद्रा (5) स्मृतिअतः स्पष्ट है कि चित्तवृत्तियों के अन्तर्गत प्रमाण तथा प्रमाण के अन्तर्गत अनुमान प्रमाण आता है।

54. 'बृहच्छब्देन्दुशेखरः' इति ग्रन्थस्य कर्ता?

Correct Answer: (b) नागेशभट्टः
Solution:

'बृहच्छब्देन्दुशेखरः' इति ग्रन्थस्य कर्ता नागेशभट्टः सन्ति। अर्थात् बृहत्छब्देन्दुशेखर इस व्याकरण ग्रन्थ के कर्ता आचार्य नागेशभट्ट हैं-

ग्रन्थ ग्रन्थकर्ता 
प्रदीप (टीका)कैय्यट
सौन्दर्यालङ्कार वामन 

55. अथवा कृतवारद्वारे वंशेऽस्मिन्पूर्वसूरिभिः । मणौ वज्रसंमुकीर्णे सूत्रस्येवास्ति मे गतिः ॥

पद्येऽस्मिन् मे इति पदं केन सम्बद्धम् ?

Correct Answer: (c) कालिदासेन
Solution:

अथवा कृतवाग्द्वारे वंशेऽस्मिन्पूर्वसूरिभिः। मणौ वज्रसंमुकीर्णे सूत्रस्येवास्ति मे गतिः ।।
पद्येऽस्मिन् मे इति पदं कालिदासेन सम्बद्धम् ?

56. कालक्रमानुसारम् अधोलिखितवैयाकरणानां समुचितं क्रमं चिनुत

(A) वरदराजः, भट्टोजिदीक्षितः, पतञ्जलिः, भर्तृहरिः
(B) भट्टोजिदीक्षितः, वरदराजः, पतञ्जलिः, भर्तृहरिः
(C) पतञ्जलिः, भट्टोजिदीक्षितः, भर्तृहरिः, वरदराजः
(D) पतञ्जलिः, भर्तृहरिः, भट्टोजिदीक्षितः, वरदराजः
अत्र समुचितं उत्तरं चिनुत

Correct Answer: (d)
Solution:

कालक्रम के अनुसार वैयाकरणों का क्रम
पतञ्जलिः, भर्तृहरिः, भट्टोजिदीक्षितः, वरदराजः

57. बालगंगाधर तिलकेन मृगशिरा काले ऋग्वेदस्य अधिकांश मन्त्रणां रचना स्वीकृतास्ति । अधोलिखितेषु मृगशिरा कालः वर्तते?

Correct Answer: (b) 4000-2500 वि.पू.
Solution:

लोकमान्य ने वैदिककाल को चार युगों में विभक्त किया है-
मृगशिराकाल - आर्य सभ्यता के इतिहास मे नितान्त महत्वशाली युग यही था जब ऋग्वेद के अधिकांश मंत्रो का निर्माण किया गया। रचना की दृष्टि से यह विशेषतः क्रियाशील था।
यह वैदिक काल के चार कालखंडों और उनके अनुमानित समय को दर्शाती है।
अदिति काल: 6000-4000 ई.पू.
मृगशिरा काल: 4000-2500 ई.पू.
कृत्तिका काल: 2500-1400 ई.पू.
अन्तिम काल: 1400-500 ई.पू.

58. रणेषु तस्य प्रहिताः प्रचेतसा सरोषहुंकारपरा‌मुखीकृताः।

प्रहतुरेवोरगराजरज्जवो जवेन कण्ठं सभयाः प्रपेदिरे ।
शिशुपालवधस्य श्लोकेऽस्मिन् कस्य दिक्पालस्य वर्णनं कृतम्?

Correct Answer: (b) वरुणस्य
Solution:

रणेषु तस्य प्रहिताः प्रचेतसा सरोषहुंकारपरामुखीकृताः ।
प्रहर्तुरेवोरगराजरज्जवो जवेन कण्ठं सभयाः प्रपेदिरे ।।
शिशुपालवधस्य श्लोकेऽस्मिन् वरुणस्य दिक्पालस्य वर्णनं कृतम्।
शिशुपालवध महाकवि माघ क अलौकिक ग्रन्थ है।

59. आकृतिमूलकवर्गीकरणमाश्रित्य अधस्तनासु का भाषा योगात्मकभाषासु नास्ति?

Correct Answer: (c) चीनी
Solution:

आकृतिमूलकवर्गीकरणमाश्रित्य अधस्तनासु 'चीनी' भाषा योगात्मकभाषासु नास्ति।

60. "कविक्रतुः" अधोलिखितेषु कस्य विशेषणं विद्यते?

Correct Answer: (c) अग्रेः
Solution:

"कविक्रतुः” अधोलिखितेषु कस्य विशेषणं विद्यते। अग्नि सूक्त ऋषि-मधुच्छन्दा, निवास स्थान पृथ्वीस्थानीय, सूक्ति संख्या- ऋग्वेद
ऋग्वेदीय देवों में अग्नि का सबसे प्रमुख स्थान है। वैदिक मंत्रों के अनुसार अग्निदेव नेतृत्व शक्ति से सम्पन्न, यज्ञ की आहुतियों को ग्रहण करने वाले, तेज तथा प्रकाश के अधिष्ठाता हैं।
ऋग्वेद में अग्नि को घृतपृष्ठ, रक्तदत्त, गृहपति, द्रव्यवाहन, समिधान, दमूनस्, यविष्ट, मेद्य, 'कविक्रतुः' आदि नामों सम्बोधित किया गया है।
"अग्निहता कविक्रतु, सत्याश्चित्र श्रवस्तमः । देवो देवेभिरागमत् ।।"