Solution:राजयोग - राजयोग सभी योगो का राजा कहा जाता है। क्योकि इसमे प्रत्येक प्रकार के योग की कुछ न कुछ सामग्री अवश्य मिल जाती है राज योग महर्षि पतंजलि द्वारा रचित अष्टांग योग का का वर्णन आता है। राजयोग का विषय चितवृन्तियों का निरोध करना है।
लययोग - चिन्त का अपने स्वरूप विलीन होना या चिन्त की निरुद्ध अवस्था लययोग के अन्तर्गत आता है। साधक के चिन्त में जब चलते, बैठते, सोते और भोजन करते समय हर समय ब्रह्मा का ध्यान रहे इसी को इसी को लय योग कहते है।
मंत्रयोग - मंत्र का समान्य अर्थ है- 'मननात् त्रायते इति मंत्रः । मन को त्राय (पार करने वाला) मंत्र ही है। मंत्र योग का सम्बन्ध मन से है। मन को इस प्रकार परिभाषित किया गया है- 'मनन इति मनः'। जो मनन, चिन्तन करता है वही मन है। मन की चंचलता का निरोध मंत्र के द्वारा करना मंत्र योग है।
हठयोग - हठ का शाब्दिक अर्थ हठपूर्वक किसी कार्य को करने से लिया जाता है। 'ह' का अर्थ 'सूर्य' तथा 'ठ' का अर्थ 'चन्द्र' वताया गया है सूर्य और चन्द्र की समान अवस्था हठयोग है।