यूजीसी NTA नेट जेआरएफ परीक्षा, दिसम्बर 2021 (संस्कृत)

Total Questions: 100

11. केन सह कस्य सम्बन्धः?

तालिका-I (सूत्र)तालिका-II (उदाहरण)
A. तथायुक्तं चानीप्सितम्I. अनु हरिं सुराः
B. हीनेII. गोषु दुह्यमानासु गतः
C. कर्तृकर्मणोः कृतिIII. ग्रामं गच्छन्तृणं स्पृशति
D. यस्य च भावेन भावलक्षणम्IV. जगतः कर्ता कृष्णः

समुचितं विकल्पं चिनुत - 

Correct Answer: (c) A-III, B-I, C-IV, D-II
Solution:

सुमेलित तालिका है-

तालिका-I (सूत्र)तालिका-II (उदाहरण)
A. तथायुक्तं चानीप्सितम्I. ग्रामं गच्छन्तृणं स्पृशति
B. हीनेII. अनु हरिं सुराः
C. कर्तृकर्मणोः कृतिIII. जगतः कर्ता कृष्णः
D. यस्य च भावेन भावलक्षणम्IV. गोषु दुह्यमानासु गतः

अतः विकल्प (C) A-III, B-I, C-IV, D-II सही है।

12. शतपथब्राह्मणस्य प्रथमकाण्डस्य विषयौ कौ ?

A. अग्निहोत्रम् B. सोमयागः C. राजसूयः D. पिण्डपितृयज्ञः

Correct Answer: (b) A एवं D
Solution:

शतपथब्राह्मणस्य प्रथमकाण्डस्य विषयों 'अग्निहोत्रम, पिण्डपितृयज्ञः । शतपथ ब्राह्मण के प्रथम काण्ड का विषय अग्निहोत्र, पिण्डपितृयज्ञ है।

शुक्लयजुर्वेद का ब्राह्मण शतपथ ब्राह्मण है। इसके रचयिता वाजसनि के पुत्र याज्ञवल्क्य माने जाते हैं। वाजसनि के पुत्र होने से इन्हें 'वाजसनेय' भी कहा जाता है। सूर्य की कृपा से प्राप्त शुक्ल यजुर्वेद की व्याख्या वाजसनेय याज्ञवल्क्य ने की।

माध्यन्दिन (शुक्लयजुर्वेदीय) शतपथ ब्राह्मण में 14 काण्ड, 100 अध्याय, 438 ब्राह्मण और 7624 कण्डिकायें हैं। काण्व शतपथ ब्राह्मण में माध्यन्दिन शतपथ ब्राह्मण से कुछ क्रम विन्यास में अन्तर है। इसमें 17 काण्ड, 104 अध्याय, 435 ब्राह्मण और 6806 कण्डिकाएँ हैं।

13. एते महाकविकालिदासप्रणीते महाकाव्ये स्तः

A. रघुवंशम् B. मेघदूतम्  C. अभिज्ञान शाकुन्तलम् D. कुमार सम्भवम्
समुचितं विकल् चिनुत - 

Correct Answer: (b) A एवं D
Solution:

एते महाकविकालिदासप्रणीते 'रघुवंशम्, कुमार सम्भवम् महाकाव्ये स्तः । इसमें महाकवि कालिदास प्रणीत महाकाव्य रघुवंशम्, कुमारसम्भवम् है। रघुवंशम् महाकवि कालिदास की रचना है। यह उन्नीस सग में विभक्त है। यह वीर रस प्रधानकाव्य है। इसमें वैदर्भी रीति का प्रयोग हुआ है।

रघुवंश में आकर्षक चरित्र-चित्रण विशद एवं रुचिर वर्णन, प्रौढ़ प्रतिभा, सुन्दर रस व्यञ्जना, सरल अलंकृत शैली का मणिकाञ्चन संयोग। इसका मूलस्रोत- वाल्मीकि रामायण है। रघुवंश के उन्नीस सर्गों में दिलीप से लेकर अग्निवर्ण तक रघुवंश के 29 राजाओं का वर्णन । मनु तथा इक्ष्वाकु सहित कुल 31 राजाओं का वर्णन है।

कुमारसम्भव सत्रह सर्गों में विभक्त महाकवि कालिदास की प्रारम्भिक रचना है। इसमें शिव-पार्वती विवाह, कुमार कार्तिकेय के जन्म तथा उसके द्वारा तारकासुर के वध की कथा वर्णित है। कुमारसम्भवं में 'सम्भव' शब्द सम्भावना की ही ध्वनि देता है। शिव पार्वती के असाधारण प्रेम और प्रणय लीलाओं का चित्रण इस काव्य में होने से सम्पूर्ण काव्य शृङ्गारमय है। मल्लिनाथ की संजीवनी टीका वस्तुतः आठ सर्गों तक ही है।

→ 'मेघदूतम्' महाकवि कालिदास का दो भागों में विभक्त खण्डकाव्य है।
→ 'अभिज्ञानशाकुन्तलम्' सात अंकों में विभक्त कालिदास का अद्वितीय नाटक है।

14. अनैकान्तिकहेत्वाभासस्य कौ द्वौ प्रकारी वर्तते तर्कभाषायाम्

A. साधारणः B. सत्प्रतिपक्षः C. असाधारणः D. आश्रयासिद्धः
समुचितं विकल्पं चिनुत - 

Correct Answer: (b) A एवं C
Solution:

अनैकान्तिकहत्वाभासस्य 'साधारणः 'असाधारणः' एतो द्वौ प्रकारौ वर्तेते तर्कभाषायाम्। तर्कभाषा में अनैकान्तिक हेत्वाभास साधारण, असाधारण दो प्रकार के हैं।
सव्यभिचारोऽनैकान्तिकः। सः द्विविधः साधारणानकान्तिकोऽसाधारणानैकान्तिकश्चेति । सव्यभिचार हेतु अनैकान्तिक (हेत्वाभास) कहलाता है। वह दो प्रकार का है-
(क) साधारण अनैकान्तिक
(ख) असाधारण अनेकान्तिक
(क) साधारण अनैकान्तिक उनमें से पक्ष, सपक्ष तथा विपक्ष में रहने वाला साधारण अनेकान्तिक है। जैसे- शब्द नित्य है (प्रतिज्ञा), क्योंकि वह प्रमेय है (हेतु), आकाश के समान।

(ख) जो सपक्ष तथा विपक्ष (दोनों) से व्यावृत्त होकर केवल पक्ष में ही रहता है वह असाधारण अनैकान्तिक (हेत्वाभास) है। जैसे- भूमि नित्य है (प्रतिज्ञा), क्योंकि यह गन्ध वाली है (हेतु)। यहाँ गन्धत्व (हेतु दिया गया) है वह सपक्ष = नित्य से तथा विपक्ष = अनित्य से व्यावृत्त है जो केवल पृथ्वी में रहता है।

15. 'उचित प्राहुराचार्याः सदृशं किल यस्य तत्' इति वचनं वर्तते

Correct Answer: (b) क्षेमेन्द्रस्य
Solution:

'उचितं प्राहुराचार्याः सदृशं किल यस्य तत्' इति वचनं क्षेमेन्द्रस्य वर्तते । औचित्य सम्प्रदाय के प्रवर्तक आचार्य क्षेमेन्द्र माने जाते हैं। उन्होंने औचित्य को काव्य का 'जीविततत्त्व' कहा है। 'औचित्यं रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् ।'
आचार्य क्षेमेन्द्र औचित्य को परिभाषित करते हुए कहते हैं,
'उचितं प्राहुराचार्याः सदृशं किल यस्य यत्।
उचितस्य च यो भावस्तदौचित्यं प्रचक्षते ।"
(औचित्यविचार चर्चा)
अर्थात् जो वस्तु जिसके अनुरूप होती है उसे 'उचित' कहते हैं और उचित का जो भाव है, वह औचित्य कहलाता है। यह औचित्य ही रस का जीवितभूत है, उसका प्राण है और काव्य में चमत्कारी तत्त्व है।
'औचित्यं रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम्।'
आनंदवर्धन - 'काव्यस्यात्मा ध्वनिरति बुधैर्यः समाम्नातपूर्वः ।'
भामह- भामह अलङ्कार सम्प्रदाय के प्रवर्तक हैं 'काव्यालङ्कार' इनका अलङ्कार ग्रन्थ है। रसवद्दर्शितस्पष्टशृङ्गारादिरसं यथा।
विश्वनाथ - 'वाक्यं रसात्मकं काव्यम्।'

16. केन सह कस्य सम्बन्धः ?

तालिका - I (लेखक)तालिका - II (ग्रंथ)
A. त्रिविक्रमभट्टःI. मृच्छकटिकम्
B. भट्टनारायणःII. मुद्राराक्षसम्
C. विशाखदत्त :III. वेणीसंहारम्
D. शूद्रक :IV. नलचम्पू

समुचितं विकल्पं चिनुत - 

Correct Answer: (d) A-IV, B-III, C-II, D-I
Solution:

सुमेलित है-

तालिका - I (लेखक)तालिका - II (ग्रंथ)
A. त्रिविक्रमभट्टःI. नलचम्पू
B. भट्टनारायणःII. वेणीसंहारम्
C. विशाखदत्त :III. मुद्राराक्षसम्
D. शूद्रक :IV. मृच्छकटिकम्

अतः विकल्प (d) A-IV, B-III, C-II, D-I सही है।

17. महाभाष्यानुसारं कयो योरुचितः सम्बन्धोऽस्ति?

A. दुष्टः शब्दः B. गुणो नाम सः  C. कर्मण्यण् D. विभक्तिं कुर्वन्ति
समुचितं विकल्पं चिनुत - 

Correct Answer: (c) A एवं D
Solution:

महाभाष्यानुसार 'दुष्टः शब्दः, विभक्तिं कुर्वन्ति' एतयो ईयोरुचितः सम्बन्धोऽस्ति अस्ति। दुष्टः शब्दः-
"दुष्टः शब्दः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्याप्रयुक्तो न तमर्थमाह।
स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति यथेन्द्रशत्रुः स्वरतोपराधाद् ॥"
विभक्तिं कुर्वन्ति-यज्ञिकाः पठन्ति- "प्रयाजाः सविभक्तिकाः कार्याः" इति। न चान्तरेण व्याकरणं प्रयाजा सविभक्तिकाः शक्याः कर्तुम् विभक्तिं कुर्वन्ति ।

18. केन सह कस्य सम्बन्धः ?

तालिका - Iतालिका - II
A. संस्कृत भाषाI. श्लिष्ट वियोगात्मक
B. हिन्दी भाषाII. अश्लिष्ट मध्ययोगात्मक
C. तिब्बती भाषाIII. अयोगात्मक
D. सन्थाली भाषाIV. श्लिष्ट संयोगात्मक

समुचितं विकल्पं चिनुत - 

Correct Answer: (d) A-IV, B-I, C-III, D-II
Solution:

सुमेलित है-

तालिका - Iतालिका - II
A. संस्कृत भाषाI. श्लिष्ट संयोगात्मक
B. हिन्दी भाषाII. श्लिष्ट वियोगात्मक
C. तिब्बती भाषाIII. अयोगात्मक
D. सन्थाली भाषाIV. अश्लिष्ट मध्ययोगात्मक

19. अधोलिखितानां रामायणस्य विषयवस्तूनाम् समुचितः क्रमोऽस्ति

A. ताडकावधः B. दशरधेन यज्ञानुष्ठानम्  C. मिथिला - प्रस्थानम् D. रामजन्म E. रामद्वारा धनुर्भङ्गः
समुचितं विकल्पं चिनुत - 

Correct Answer: (d) B, D, A, C, E
Solution:

अधोलिखितानां रामायणस्य विषयवस्तूनाम् समुचितः क्रमः अस्ति।
दशरथेन यज्ञानुष्ठानम्, रामजन्म, ताडकावधः, मिथिला प्रस्थानम्, रामद्वारा धनुर्भङ्गः ।

रामायण महर्षि वाल्मीकि की रचना है। यह सात काण्डों में विभक्त है। इसमें 24000 श्लोक हैं, अतः इसे 'चतुर्विंशति साहस्री संहिता' भी कहते हैं।

रामायण में मुख्यतः 'अनुष्टुप् छन्द का प्रयोग हुआ है। ऋषि वाल्मीकि के द्वारा विरचित होने के कारण इसे 'आर्षकाव्य' भी कहा जाता है। ब्रह्मा की आज्ञा से वाल्मीकि ऋषि ने रामायण को रचा।
'न ते वागनृताकाव्ये काचिदन भविष्यति ।
कुरु रामकथा पुण्यां श्लोकबद्धां मनोरमाम् ।'
यह सनातन काव्य बीज होने से परवर्ती काव्यों का उपजीव्य है। 'काव्यबीजं सनातनम्।'
रामायण का महत्व एक शास्त्रीय ग्रन्थ के रूप में भी अङ्गीकार किया जा सकता है। कथाओं के मध्य मध्य में धर्मशास्त्रीय, नीति शास्त्रीय तथा राजनीति विषयक श्लोक आये हैं। जिनमें शास्त्रीयता दृष्टिगत होती है।

20. संस्कृत व्याकरणानुसारं 'भवति' इत्यस्य का सञ्जा भवति?

Correct Answer: (b) पदम्
Solution:

संस्कृत व्याकरणानुसारं 'भवति' इत्यस्य पदम् सञ्जा भवति । संस्कृत व्याकरण के अनुसार 'भवति' की पद संज्ञा होती है। पद- 'सुप्तितं पदम् अर्थात् सुप् - प्रत्ययान्त और तिङ् - प्रत्ययान्त शब्दों की पद सज्ञा होती है।'

सुपू (प्रत्याहार) प्रातिपदिक (नामविहित) संज्ञक विभक्ति प्रत्यय (स्वौजसमौट) से विहित 21 'सु', 'औ', 'जस्' आदि। तिङ् (प्रत्याहार) धातु से विहित विभक्ति प्रत्यय- 'तिप्प, तस्, झि' आदि 18 प्रत्यय।

भवति = भू + तिप्
निष्ठा संज्ञा = क्तक्तवतू निष्ठा।
भ संज्ञा = यचिभम्
सर्वनामस्थानम् - सुडनपुंसकस्य, शि सर्वनामस्थानम्।