यूजीसी NTA नेट जेआरएफ परीक्षा, दिसम्बर 2021 (संस्कृत)

Total Questions: 100

21. ऋग्वेदप्रातिशाख्यानुसारं रक्तसंज्ञोऽस्ति?

Correct Answer: (a) अनुनासिकः
Solution:

ऋग्वेदप्रातिशाख्यानुसारं रक्तसंज्ञः अनुनासिकः अस्ति। 'ऋक प्रातिशाख्य' ऋग्वेद का एकमात्र उपलब्ध प्रातिशाख्य है। इसके रचयिता शौनक हैं। ऋग्वेद प्रातिशाख्य तीन अध्यायों में विभक्त है, प्रत्येक अध्याय में 6 पटल हैं, कुल 18 पटल हैं। ऋग्वेदप्रातिशाख्य के अनुसार 'अनुनासिक' रक्तसंज्ञक है।

22. केन सह कस्य सम्बन्धः?

तालिका – Iतालिका – II
A. शैवI. अग्निपुराणम्
B. वैष्णवII. पद्मपुराणम्
C. ब्राह्मIII. मार्कण्डेयपुराणम्
D. आग्नेयIV. गरुडपुराणम्

समुचितं विकल्पं चिनुत - 

Correct Answer: (c) A-III, B-IV, C-II, D-I
Solution:

सुमिलित तालिका है-

तालिका–Iतालिका–II
A. शैवI. मार्कण्डेयपुराणम्
B. वैष्णवII. गरुडपुराणम्
C. ब्राह्मIII. पद्मपुराणम्
D. आग्नेयIV. अग्निपुराणम्

अतः विकल्प (c) A-III, B-IV, C-II, D-I सही है।

23. अस्मिन् श्लोके अलंकार छन्दसोः स्थितिरियम् वर्तते श्रियः कुरुणामधिपस्य पालनीं, प्रजासु वृत्तिं यमयुङ्क्त वेदितुम् स वर्णिलिङ्गी विदितः समाययौ युधिष्ठिरं द्वैतवने वनेचरः

A. उपमा B. वृत्त्यानुप्रासः C. मालिनी D. वंशस्थम्
समुचितं विकल्पं चिनुत – 

Correct Answer: (c) B एवं D
Solution:

अस्मिन् श्लोके वृत्त्यानुप्रासः अलंकारः - वंशस्थम् छन्दसोः स्थितिरियम् वर्तते। 'श्रियः कुरुणामधिपस्य पालनीं, प्रजासु वृत्तिं यमयुङ्क्त वेदितुम्' स वर्णिलिङ्गी विदितः समाययौ युधिष्ठिरं द्वैतवने वर्नचरः ।' इस श्लोक में वृत्त्यानुप्रास अलङ्कार और वंशस्थ छन्द है।

वृत्त्यानुप्रास अलङ्कार-आवृत्तवर्ण सम्पूर्णवृत्तयानुप्रासवद्वचः।
अमन्दानन्द सन्दोहस्वच्छन्दास्पदमन्दिरम् ।।

आवृत्त (दुहरायेगये) वर्णों (व्यञ्जनों से भरी हुई तथा अमन्दअत्यधिक आनन्द के समूह की स्वतंत्र स्थिति की निधान-भूत रचना वृत्त्यनुप्रास अलङ्कार से युक्त होती है।

वंशस्थ छन्द- 'जतौ तु वंशस्थमुदीरितं जरौ।' वंशस्थ के प्रत्येक पाद में 12 वर्ण होते हैं। क्रमशः । जगण, 1 तगण, 1 जगण, 1 रगण।

24. अधोऽङ्कितेषु भाषाविज्ञानानुसारं अर्धस्वरौ स्तः

A. अ
B. य्
C. ड
D. व्
समुचितं विकल्पं चिनुत -

Correct Answer: (c) B एवं D
Solution:

अधोऽङ्कितेषु भाषाविज्ञानानुसारम् अर्धस्वरौ य्, व् स्तः । भाषा विज्ञान के अनुसार अर्धस्वर य, व हैं। स्वर और व्यञ्जन के बीच में कुछ और ध्वनियाँ हैं, जिनको हम अर्ध-स्वर कहते हैं। संस्कृत में इनको अन्तस्थ कहा जाता है। अन्तस्थ का अभिप्राय यह है कि ये ध्वनियाँ न तो स्वर की तरह पूर्णतया अवरोध रहित हैं और न व्यञ्जन की तरह पूर्णतया अवरुद्ध । ये ध्वनियाँ य्. व् हैं।

25. अधोऽङ्क्तेिषु कयोर्द्वयोः सम्बन्धोऽस्ति?

A. बभूवे B. नेर्विशः  C. समवप्रविभ्यः स्थः D. भावकर्मणोः
समुचितं विकल्पं चिनुत - 

Correct Answer: (c) A एवं D
Solution:

अधोऽङ्कितेषु 'बभूवे, भावकर्मणोः एतयोः द्वयोः' सम्बन्धोऽस्ति।
भाव कर्मणोः । तस्यात्मनेपदम् ।।
भाव और कर्म में हुए लकार के स्थान पर आत्मनेपद प्रत्यय है। भाववाच्य और कर्मवाच्य में परस्मैपद का नितान्त अभाव होता है। धातु चाहे परस्मैपदी हो या आत्मनेपदी अथवा उभयपदी भी क्यों न हो, भाववाच्य और कर्मवाच्य में आत्मनेपद का ही प्रयोग होगा, परस्मैपद का नहीं।

26. योगदर्शनानुसारमधोऽङ्कितेषु वृत्तिर्वर्तत

Correct Answer: (b) निद्रा
Solution:

योगदर्शनानुसारमधोऽङ्क्तेिषु 'निद्रा' वृत्तिर्वर्तते । योगदर्शन के प्रणेता 'महर्षि पतञ्जलि' हैं। योगदर्शन का आधार योग सूत्र है। योगदर्शन का पहला सूत्र 'अथ योगानुशासनम्' है। इसमें चित्त वृत्तियों की संख्या 5 है-
प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा, स्मृति ।
निद्रा- 'अभाव प्रत्ययालम्बना वृत्तिद्रा।' (1/10)
जायत तथा स्वप्नावस्था की वृत्तियों के अभाव के कारणभूत तमोगुण को विषय बनाने वाली वृत्ति निद्रा कही जाती है।

27. योगदर्शनानुसारं 'संयमः' इत्यनेन कस्य निर्देशः ?

Correct Answer: (b) धारणा - ध्यान - समाधयः
Solution:

योगदर्शनानुसारं 'संयमः' इत्यनेन 'धारणा - ध्यान - समाधयः । संयम- ये धारणा, ध्यान और समाधि तीनों एकत्र अर्थात् एक ही आलम्बनगत होने पर संयम कहे जाते हैं।
'त्रयमेकत्र संयमः' (3/4)
अन्तरङ्ग साधन-यमादि साधनों की अपेक्षा वे धारणा, ध्यान और समाधि सम्प्रज्ञात समाधि के लिये अन्तरङ्ग माने जाते हैं। त्रयमन्तरङ्ग
पूर्वेभ्यः (3/7) संयम भी निर्बीजसमाधि के लिए बहिरङ्ग ही है। 'तदपि बहिरङ्गं निर्बीजस्य' (3/8)
तीनों परिणामों में संयम करने से योगी को अतीत तथा अनागत का साक्षात्कार होता है।
परिणामत्रय संयमादतीतानागतज्ञानम् (3/16)
सूर्य में किये गये संयम में समस्त भुवनों का ज्ञान होता है।
 'भुवनज्ञानं सूर्ये संयमाद (3/26)

28. 'यथा हिरण्यं शुचिधातुमध्ये मेरुर्गिरीणां सरसां समुद्रः ' इदं वचनं कस्मिन काव्ये विलसति?

Correct Answer: (c) बुद्धचरिते
Solution:

'यथा हिरण्यं शुचिधातुमध्ये मेरुगिरीणां सरसां समुद्रः इदं वचनं 'बुद्धचरिते' काव्ये विलसति । यह कथन 'बुद्धचरितम् से है। बुद्धचरितम् अश्वघोष की रचना है।

यह एक महाकाव्य है। इसमें बुद्ध का जीवन चरित तथा उनके सिद्धान्त वर्णित हैं। इसमें बुद्ध के जन्म से लेकर महानिर्वाण तक की कथा वर्णित है। इस महाकाव्य में मूल रूप से 28 सर्ग हैं।

यथा हिरण्यं शुचि धातुमध्ये मेरुर्गिरीणां सरसां समुद्रः ।
तारासु चन्द्रस्तपतां च सूर्यः पुत्रस्तथा ते द्विपदेषु वर्यः ॥
अर्थात् जिस प्रकार धातुओं में शुद्ध वर्ण, पर्वत में सुमेरु, जलाशयों में समुद्र, ताराओं में चन्द्रमा तथा अग्नियों में सूर्य श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार मनुष्यों में आपका पुत्र श्रेष्ठ है।

29. कथनद्वयम् अधोलिखितम् - तत्र एकम् अभिकथनम् (A) अपरञ्च तस्य कारण (R) इति -

अभिकथनम् (A): वितरति गुरुः प्राज्ञे विद्यां तथैव जडे, न तु खलु तयोर्जाने शक्तिं करोत्यपहन्ति वा। भवति हि पुनर्भूयान् भेदः फलं प्रति तद् यथा,
कारणम् (R) : प्रभवति शुचिर्बिम्बग्राहे मणिर्न मृदादयः ॥
उपर्युक्तं अभिकथन - कारणमाश्रित्य समुचितं विकल्पं चिनुत -

Correct Answer: (c) (A) तथा (R) उभावपि सत्यम्
Solution:

कथनद्वयम् अधोलिखितम्- तत्र एकम् अभिकथनम् (A) अपरञ्च तस्य कारण (R) इति
अभिकथनम् (A): वितरति गुरुः प्राज्ञे विद्यां तथैव जडे, न तु खलु तयो ने शक्तिं करोत्यपहन्ति वा। भवति हि पुनर्भयान् भेदः फल प्रति तद् यथा गुरु तीव्र बुद्धि एवं मंद बुद्धि वाले दोनों तरह के छात्रों को एक समान शिक्षा प्रदान करता है।

दोनों में से किसी को न अलग से समझने की सामर्थ्य प्रदान करता है और न ही किसी के बोध शक्ति को नष्ट ही करता है। ऐसा होने पर भी परिणाम में बहुत भिन्नता होती है, जैसे कि हीरा
कारण (R): प्रभवति शुचिर्बिम्बग्राहे मणिर्न मृदादयः ।।
(उत्तररामचरितम्)
स्फटिक मणि आदि सभी प्रतिबिम्ब ग्रहण करने में समर्थ होते हैं किन्तु मिट्टी आदि पदार्थ प्रतिबिम्ब धारण नहीं कर सकते। (A) तथा (R) उभावपि सत्यम् अर्थात् (A) तथा (R) दोनों सत्य हैं।

30. सामवेदस्य ब्राह्मणग्रन्थौ कौ स्तः ?

A. ऐतरेय - ब्राह्मणम् B. पञ्चविंश - ब्राह्मणम्  C. शांखायन - ब्राह्ममण् D. वंश ब्राह्मणम्

Correct Answer: (c) B एवं D
Solution:

सामवेदस्य ब्राह्मणग्रन्थौ एतौ द्वौ पञ्चविंश, वंश ब्राह्मण स्तः। पञ्चविंश और वंश सामवेदीय ब्राह्मण ग्रन्थ हैं। सामवेद में कुल 8 ब्राह्मण ग्रन्थ उपलब्ध होते हैं- ताण्ड्य (पञ्चविंश), षड्विंश, सामविधान, आर्षेय, दैवत, उपनिषद्, संहितोपनिषद्, वंश ।

नोट:-
(1) ताण्ड्य ब्राह्मण - इसे (पञ्चविंश) भी कहते हैं। इसमें कुल 25 अध्याय हैं। इसका मुख्य प्रतिपाद्य विषय सोमयाग है।
(2) ताण्ड्य ब्राह्मण - यह सबसे छोटा ब्राह्मण ग्रन्थ है। इसमें 3 खण्ड हैं। स्वयंभू ब्रह्म से सामवेद की परम्परा का आरम्भ माना जाता है।