यूजीसी NTA नेट जेआरएफ परीक्षा, दिसम्बर 2021 (संस्कृत)

Total Questions: 100

31. सदानन्दप्रणीते वेदान्तसारे 'तत्त्वमसि अत्र अखण्डार्थबोधकेषु त्रिषु सम्बन्धेषु अयं नास्ति

Correct Answer: (a) अयुतसिद्धसम्बन्धः
Solution:

सदानन्दप्रणीते वेदान्तसारे 'तत्त्वमसि' अत्र अखण्डार्थबोधकेषु त्रिषु सम्बन्धेषु 'अयुतसिद्धसम्बन्धः' नास्ति। तत्त्वमसि इस महावाक्य का अर्थ है- वह ब्रह्म तुम्ही हो। सृष्टि के जन्म से पूर्व, द्वैत के अस्तित्व से रहित, नाम और रूप से रहित एक मात्र सत्य स्वरूप, अद्वितीय ब्रह्म ही था।

वही ब्रह्म आज भी विद्यमान है। उसी ब्रह्म को 'तत्त्वमसि' कहा गया है। वह शरीर और इन्द्रियों में रहते हुए भी, उनसे परे है। आत्मा में इसका अंश मात्र उसी से उसका अनुभव होता है, किन्तु वह अंश परमात्मा नहीं है। वह उससे दूर है।

वह सम्पूर्ण जगत् में प्रतिभासित होते हुए भी उससे दूर है।

32. सरविलियमजोन्समहोदयः ब्राह्मीलिप्योत्पत्तिः मन्यते

Correct Answer: (d) सेमेटिकलिपितः
Solution:

सरविलियमजोन्समहोदयः ब्राह्मीलिप्योत्पत्तिः | 'सेमेटिकलिपितः' मन्यते। ब्राह्मी लिपि की सेमेटिक उत्पत्ति का सिद्धान्त विलियम जोन्स इस सिद्धान्त के मुख्य प्रस्तुत करता है। ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति के विषय में अनेक सिद्धान्त प्रस्तुत किये गए हैं। इन सिद्धान्तों को दो मुख्य धाराओं में विभक्त किया जा सकता है।

(1) विदेशी उत्पत्ति का सिद्धान्त (2) वृद्ध भारत की स्वदेशी उत्पत्ति का सिद्धान्न। विदेशी उत्पत्ति के सिद्धान्त को मानने वाले पुनः दो भागों में विभक्त है।

(क) यूनानी मूल से ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति इस सिद्धान्त के पोषक अल्फ्रेडम्युलर हैं।
(ख) ब्राह्मी लिपि की सेमेटिक उत्पत्ति का सिद्धान्त जोन्स के द्वारा प्रस्तुत किया गया इसे भी तीन भागों में विभक्त किया है।
(1) फिनीशीयान मूल (2) दक्षिण सेमेटिक मूल (3) उत्तर समेटिक मूल

33. अर्थसंग्रहे कतिधा वेद उच्यते

Correct Answer: (d) पञ्चविधः
Solution:

अर्थसंग्रहे 'पञ्चविधः' वेद उच्यते। लौगाक्षिभास्कर कृत अर्थसंग्रह में वेद के पञ्चविध का वर्णन किया गया है। जो निम्नवत् हैं।

वेद का लक्षण - अपौरुषेयं वाक्यं वेदः।
(अपौरुषेय वाक्य को वेद कहते हैं।)
स च विधि-मंत्र नामधेय निषेधार्थवाद-भेदात्पञ्चविधः

वेद के पाँच विभाग (पंचविध विभाग)

मीमांसा शास्त्र के अनुसार, वेद के वाक्यों को मुख्य रूप से पाँच श्रेणियों में बाँटा गया है:

विधि : ये वे वाक्य हैं जो किसी कार्य को करने की प्रेरणा या आज्ञा देते हैं (जैसे- "यज्ञ करें")। इमेज में इसे 'विधि' के रूप में लिखा गया है।

मन्त्र : ये वे शब्द या वाक्य हैं जिनका प्रयोग अनुष्ठान या यज्ञ के समय देवताओं की स्तुति या स्मरण के लिए किया जाता है।

नामधेय : ये शब्द किसी विशेष यज्ञ या अनुष्ठान के नाम को दर्शाते हैं (जैसे- 'अग्निहोत्र')।

निषेध : ये वे वाक्य हैं जो किसी अनुचित कार्य को करने से रोकते हैं या मना करते हैं (जैसे- "झूठ न बोलें")।

अर्थवाद : ये वे वाक्य हैं जो किसी विधि की प्रशंसा करते हैं या निषेध की निंदा करते हैं, ताकि व्यक्ति सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित हो सके। (इमेज में इसे 'अर्थवाद' लिखा गया है)।

34. 'हर्षचरितम्' इत्यस्य रचनाकारः वर्तते

Correct Answer: (a) बाणभट्टः
Solution:

'हर्षचरितम्' बाणभट्टः रचनाकारः वर्तते। हर्षचरितं के रचनाकार बाणभट्ट हैं। इसमें भारतीय सम्राट हर्षवर्धन का जीवन चरित वर्णित है। ऐतिहासिक कथानक से सम्बन्धित यह संस्कृत का सबसे प्राचीन ग्रन्थ है। 'हर्षचरितम्' आठ उच्छ्वासों में विभाजित है। जिसमें से पहले ढाई उच्छ्वास बाण की आत्मकथा रूप में है।

35. अधोऽङ्कितान् वैय्याकरणान् कालक्रमेण प्रदर्शयत

A. कात्यायनः B. नागेशभट्टः C. कैय्यटः D. पाणिनिः E. भर्तृहरिः
समुचितं विकल्पं चिनुत - 

Correct Answer: (b) D, A, E, B, C
Solution:

पाणिनिः, कात्यायनः, भर्तृहरिः नागेशभट्टः, कैय्यटः वैय्याकरणान् कालक्रमेण प्रदर्शयत
कालक्रम की दृष्टि से वैय्याकरणों के नाम (पाणिनी-450 ई.पू.), (कात्यायन 350 ई.पू.), (भर्तृहरि सातवीं शती ई. पूर्वाद्ध), (नागेशभट्ट 1730 -1810 ई.पू.), (कैय्यट 18वीं शताब्दी) प्राप्त होता है। जो कि इनका व्यवस्थित कालक्रम है।

36. अर्थसंग्रहानुसारं देशसामान्यं स्थानम्, तच्च द्विविध, किं तत् ?

A. पाठसादेश्यम्  B. अनुष्ठानसादेश्यम् C. यथासंख्यसादेश्यम् D. मीमांसासादेश्यम्
समुचितं विकल्पं चिनुत-

Correct Answer: (a) A एवं B
Solution:

अर्थसंग्रहानुसारं देशसामान्यं स्थानम्, तच्च द्विविध, 'पाठसादेश्यम्, अनुष्ठानसादेश्यम्' तत्। लौगाक्षिभाष्कर कृत अर्थसंग्रह में देश सामान्य के स्थान को दो प्रकार के रूप में दिखाया गया है- (1) पाठसादेश्यम् (2) अनुष्ठानसादेश्यम् स्थानम् - देशसामान्यं स्थानम्। तद् द्विविधं पाठसादेश्यं अनुष्ठानसादेश्यं चेति । स्थानं क्रमश्चेत्यनथान्तरं पाठसादेश्यमपि द्विविधम्, यथासंख्यापाठः सन्निधिपाठश्चेति ।

(1) पाठसादेश्यम् - तत्र ऐन्द्राग्नमेकादशकपालं निर्वपेत्। वैश्वानरं द्वादशकपालं निर्वपेत् इत्येवं क्रमविहितेषु 'इन्द्राग्नी रोचना दिव इत्यादीनां याज्यानुवाम्यामन्त्रणां यथासंख्य प्रथमस्य प्रथमं द्वितीयस्य द्वितीयम् इत्येवं रूपो विनियोगो यथासंख्यपाठात्

(2) अनुष्ठानसादेश्यम् - पशुधर्माणाम् अग्नीषोमीयार्थत्वम् अनुष्ठानसादेश्यात् औपवसथ्येऽहनि अग्नीषोमीयः पशुः अनुष्ठीयते तस्मिन्नेव दिने ते धर्माः पठ्यन्ते। अतस्तेषां कैमथ्यकाङ्क्षायाम् अनुष्ठेयत्वेन उपस्थितं पश्वपूर्वमेव भाव्यत्वेन सम्बध्यते

37. सर्वप्राचीन रचनायाः प्राथम्येन कालक्रमानुसारमुचितमुत्तरं चिनुत -

A. किरातार्जुनीयम् B. कुमारसंभवम्  C. नैषधीयचरितम् D. रामायणम् E. स्वप्रवासवदत्तम्
समुचितं विकल्पं चिनुत - 

Correct Answer: (d) D, E, B, А, C
Solution:

सर्वप्राचीन रचनायाः प्राथम्येन कालक्रमानुसारं वर्ण परिवर्तन का क्रम रामायण, स्वप्नवासवदत्तम्, कुमारसंभवम् किरातार्जुनीयम् नैषधीयचरितम् उत्तरं अस्ति। सर्वप्राचीन रचना प्रथम दृष्टि में कालक्रमानुसार रामायण, स्वप्नवासवदत्तम्, कुमारसंभवम्, किरातार्जुनीयम्, नैषधीयचरितम्
रचनाएँ-
(1) वाल्मीकि कृत रामायण
(2) भास कृत स्वप्नवासवदत्तम्
(3) कालिदास कृत कुमारसंभवम्
(4) भारवि कृत किरातार्जुनीयम्
(5) श्रीहर्ष कृत नैषधीयचरितम्

38. सांख्यकारिकायां 'संघात परार्थत्वात्' अनेन हेतुना साध्यते

Correct Answer: (c) पुरुषः
Solution:

सांख्यकारिकायां 'संघात परार्थत्वात्' अनेन हेतुना पुरुषः साध्यते। संघातो का दूसरों के लिए होना त्रिगुणत्व इत्यादि का अभाव होना, सभी त्रिगुणात्मक वस्तुओं के लिए (चेतन) अधिष्ठाता एवं भोक्ता की अपेक्षा होने एवं केवल्य या मोक्ष के लिये प्रवृत्ति होने के कारण पुरुष की पृथक् सत्ता सिद्ध होती है।

अव्यक्त इत्यादि से पृथक् पुरुष की सत्ता है, क्योंकि सभी संघात (वस्तु-समुदाय) किसी दूसरे के लिए होते हैं, अव्यक्त, महत् और अहंकार इत्यादि संघात होने के कारण दूसरे के लिये हैं, जैसे- शयन, आसन-इत्यादि ।

39. तत्पुरुषसमासस्य उदाहरणानीमानि विभक्तिक्रमेण प्रदर्शयत

A. धान्यार्थः B. राजपुरुषः C. सुखप्राप्तः D. चोरभयम् E. यूपदारु
समुचितं विकल्पं चिनुत - 

Correct Answer: (d) C, A, E, D, B
Solution:

तत्पुरुषसमासस्य उदाहरणानीमानि विभक्तिक्रमेण-

समस्त पदविग्रहसमास का नाम
सुखप्राप्तःसुखं प्राप्तःद्वितीया तत्पुरुष
धान्यार्थःधान्येन अर्थःतृतीया तत्पुरुष
यूपदारुयूपाय दारुचतुर्थी तत्पुरुष
चोरभयम्चोरात् भयम्पञ्चमी तत्पुरुष
राजपुरुषःराज्ञः पुरुषःषष्ठी तत्पुरुष

उपर्युक्त सभी उदाहरण तत्पुरुष के हैं जो कि विभक्ति के क्रम में दर्शाया गया है।

40. ग्रिमस्य नियमानुसारं ग्, द्, ब् (घोष अल्प प्राण) ध्वनीनां परिवर्तनक्रमः कः ?

Correct Answer: (b) ग्→ क्;→ द्→ त्;→ ब्→ प्
Solution:

ग्रिमस्य नियमानुसारं ग्, द्, ब् (घोष अल्प प्राण) ध्वनीनां परिवर्तनक्रमः ग्→ क्;→ द्→ त्;→ ब्→ प् । ग्रिम, असमान और वर्नर नियम मूल भारोपीय भाषा से सम्बद्ध हैं। इन नियमों के मूल भारोपीय भाषा की ध्वनियों में परिवर्तन का वर्णन है।

ग्रिम नियम- यह ध्वनि नियम प्रो. याकोब ग्रिम (1785-1863) के नाम से प्रसिद्ध है। इस नियम को 'ध्वनि परिवर्तन' का नाम दिया गया था। प्रो. मैक्समूलर ने इसे (ग्रिम नियम) नाम दिया है।

ग्रिम नियम के अनुसार मूल भारोपीय भाषा की निम्नलिखित ध्वनियों को अंग्रेजी और जर्मन भाषा में ये ध्वनियाँ हो जाती हैं।
(प्रथम को द्वितीय 1 को 2) क्रमशः क् त्  प् को ह् (ख), थ् फ्।
(चतुर्थ को तृतीय 4 को 3) क्रमशः घ् धू भ् को ग् द्  ब्।