Solution:अर्थसंग्रहे 'पञ्चविधः' वेद उच्यते। लौगाक्षिभास्कर कृत अर्थसंग्रह में वेद के पञ्चविध का वर्णन किया गया है। जो निम्नवत् हैं।
वेद का लक्षण - अपौरुषेयं वाक्यं वेदः।
(अपौरुषेय वाक्य को वेद कहते हैं।)
स च विधि-मंत्र नामधेय निषेधार्थवाद-भेदात्पञ्चविधः
वेद के पाँच विभाग (पंचविध विभाग)
मीमांसा शास्त्र के अनुसार, वेद के वाक्यों को मुख्य रूप से पाँच श्रेणियों में बाँटा गया है:
विधि : ये वे वाक्य हैं जो किसी कार्य को करने की प्रेरणा या आज्ञा देते हैं (जैसे- "यज्ञ करें")। इमेज में इसे 'विधि' के रूप में लिखा गया है।
मन्त्र : ये वे शब्द या वाक्य हैं जिनका प्रयोग अनुष्ठान या यज्ञ के समय देवताओं की स्तुति या स्मरण के लिए किया जाता है।
नामधेय : ये शब्द किसी विशेष यज्ञ या अनुष्ठान के नाम को दर्शाते हैं (जैसे- 'अग्निहोत्र')।
निषेध : ये वे वाक्य हैं जो किसी अनुचित कार्य को करने से रोकते हैं या मना करते हैं (जैसे- "झूठ न बोलें")।
अर्थवाद : ये वे वाक्य हैं जो किसी विधि की प्रशंसा करते हैं या निषेध की निंदा करते हैं, ताकि व्यक्ति सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित हो सके। (इमेज में इसे 'अर्थवाद' लिखा गया है)।