यूजीसी NTA नेट जेआरएफ परीक्षा, दिसम्बर 2021 (संस्कृत)

Total Questions: 100

51. ब्राह्मणग्रन्थेषु वर्णनं नोपलभ्यते?

Correct Answer: (d) परमाण्वस्त्रस्य
Solution:

ब्राह्मणग्रन्थेषु वर्णनं 'परमाण्वस्त्रस्य' नोपलभ्यते । ब्राह्मणग्रन्थों में 'परमाण्वस्त्र' का वर्णन नहीं उपलब्ध होता जबकि, आत्मा, तीनों लोकों का, पुनर्जन्म का वर्णन प्राप्त होता है। ब्राह्मण ग्रन्थ इस प्रकार हैं-
(1) ऋग्वेदीय ब्राह्मण (i) ऐतरेय ब्राह्मण (ii) कौषीतकि ब्राह्मण
(2) यजुर्वेदीय ब्राह्मण (i) शुक्ल यजुर्वेद का केवल एक ब्राह्मण 'शतपथ' ब्राह्मण प्राप्त होता है।
(ii) कृष्ण यजुर्वेदीय दो ब्राह्मण ग्रन्थ हैं।

(3) सामवेदीय ब्राह्मण - 8 प्राप्त होते हैं- (1) ताण्ड्यविंश ब्राह्मण (2) षड्विंश (3) सामविधान (4) आर्षेय (5) दैवत (6) उपनिषद् (7) संहितोपनिषद् (8) वंश
(4) अथर्ववेदीय ब्राह्मण- अथर्ववेद का एकमात्र ब्राह्मण 'गोपथ' ब्राह्मण है।

52. 'जाबालेः नास्तिकमतस्य रामेण खण्डनम्' इति विषयः रामायणस्य कस्मिन् काण्डे वर्णितोऽस्ति?

Correct Answer: (a) अयोध्याकाण्डे
Solution:

'जाबालेः नास्तिकमतस्य रामेण खण्डनम्' इति विषयः रामायणस्य 'अयोध्याकाण्डे' वर्णितोऽस्ति।
→ जाबालिक का नास्तिक मत एवं राम द्वारा खण्डन यह विषय रामायण के अयोध्याकाण्ड में वर्णित है।
→ महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण में सात काण्ड हैं।

क्र.सं.काण्डों के नामसर्गों की संख्या
(1)बालकाण्ड77 सर्ग
(2)अयोध्याकाण्ड119 सर्ग
(3)अरण्यकाण्ड75 सर्ग
(4)किष्किन्धाकाण्ड67 सर्ग
(5)सुन्दरकाण्ड68 सर्ग
(6)युद्धकाण्ड128 सर्ग
(7)उत्तरकाण्ड111 सर्ग

रामायण में 24 हजार श्लोक हैं। रामायण में मुख्यतः अनुष्टुप् छन्द का प्रयोग किया गया है। रामायण में प्रधान रस 'करुण' है।

53. याज्ञवल्क्यानुसारं सीमातिक्रमणे दण्डाः प्रोक्ताः

Correct Answer: (b) उत्तमसाहसाः
Solution:

याज्ञवल्क्यानुसारं सीमातिक्रमणे 'उत्तमसाहसाः' दण्डाः प्रोक्ताः अस्ति। याज्ञवल्क्य के अनुसार दण्ड का उद्देश्य-
अधर्मदण्डनं स्वर्गकीर्ति लोकविनाशनम्।
संयुक्त दण्डनं राज्ञः स्वर्गकीर्तिजयावहम् ।।

दण्ड का प्रयोग धर्म नियंत्रण में होना चाहिए। इस प्रकार का दण्ड प्रयोग करने वाला राजा धर्म का अवतार कहा गया है। धनदण्ड के अनेक भेद हैं- याज्ञवल्क्य ने उत्तम, मध्यम और अधम साहस के तीन भेद किये हैं।

उनके अनुसार एक हजार अस्सी पण का दण्ड उत्तम होता है। इसका आधा मध्यम साहस में दण्ड दिया जाता है। मध्यम साहस का आधा दण्ड अधम या प्रथम साहस में दिया जाता था।

54. बुद्धचरिते सर्गप्राथम्येन क्रमशः सर्गाणामुचितमुत्तरं चिनुत -

A. संवेग - उत्पत्तिः B. अभिनिष्क्रमणम् C. स्त्री - निवारणम् D. तपोवन प्रवेशः E. अन्तःपुर विलाप
समुचितं विकल्पं चिनुत - 

Correct Answer: (b) A, C, B, D, E
Solution:

बुद्धचरिते सर्गप्राथम्येन क्रमशः - संवेग उत्पत्तिः, स्त्री निवारणं, अभिनिष्क्रमणम्, तपोवनप्रवेशः, अन्तःपुरविलाप सर्गाणामुचितमुत्तरं समुचितं विकल्पं अस्ति। 'बुद्धचरितम्' महाकाव्य है। इसके रचयिता अश्वघोष हैं। इनका रचनाकाल दूसरी शताब्दी है। इसमें गौतम बुद्ध का जीवनचरित वर्णित है। बुद्धचरित 28 सर्गो से युक्त है।

जिसमें 14 सर्गो तक बुद्ध के जन्म से बुद्धत्व प्राप्ति तक का वर्णन किया गया है। 28 सर्गों में विरचित इस महाकाव्य के दूसरे सर्ग से लेकर तेरहवें सर्ग तक पूर्ण रूप से तथा पहला एवं चौदहवें सर्ग के कुछ अंश ही मिलते हैं।

बुद्धचरितं के 28 सर्गों में प्रथम सर्ग से तेरह सर्गों तक के नाम इस प्रकार हैं- (1) भगवत्रसूति, (2) अन्तः पुरविहार, (3) संवेगोत्पत्ति, (4) स्त्रीविघातन, (5) अभिनिष्क्रमण, (6) छन्दक निवर्तनम् (7) तपोवनप्रवेशम्, (8) अन्तः पुरविलाप, (9) कुमारान्वेषणम्, (10) श्रेणभिगमनम् (11) काम विगर्हणम्, (12) आराडदर्शन, (13) मार विजय

55. काण्वसंहितायाः भाष्यकारान् कालक्रमेण योजयत

A. मुरारिमिश्रः B. कालनाथः C. आनन्दबोधः D. अनन्ताचार्यः E. सायणः
समुचितं विकल्पं चिनुत - 

Correct Answer: (b) B, E, A, C, D
Solution:

काण्वसंहितायाः भाष्यकारान् कालक्रमेण कालनाथः, सायण, मुरारिमिश्र, आनन्दबोध, अनन्ताचार्यः सन्ति ।

→ काण्व संहिता के अनुसार भाष्यकारों का काल निर्धारण की योजना क्रमशः इस प्रकार है-
कालनाथ- संवत् 1250 के लगभग इनका समय माना जाता है। कालनाथ के ग्रन्थ का नाम यजुर्मञ्जरी है। इसमें 250 मन्त्रों का भाष्य है।

सायण- सायण का समय 1317-1387 ई. के आस-पास माना जाता है। सायणाचार्य ने 5 संहिताओं पर भाष्य तथा 13 ब्राह्मण आरण्यकों की व्याख्या लिखे हैं। सायण ने अपने ऋग्वेदभाष्य का नाम 'वेदार्थ प्रकाश' रखा है।

मारिमिश्र- मुरारि मिश्र भारतीय दार्शनिक थे। उन्हें मीमांसा दर्शन में तृतीय सम्प्रदाय का प्रवर्तक माना जाता है। इन्होंने 'मिमांसासूत्र' की व्याख्या लिखी है।

आनन्दबोध- जातवेद भट्टोपाध्याय के पुत्र आनन्दबोध ने सम्पूर्ण काण्व संहिता पर 'काण्डवेदमंत्र भाष्य संग्रह' की रचना की हैं।

अनन्ताचार्य- इनका स्थित काल 16वीं शती माना जाता है। इन्होंने 'भाषिक सूत्र भाष्य' 'यजुः प्रातिशाख्य भाष्य' और शतपथ ब्राह्मण भाष्य भी लिखा है।

56. कथनद्वयं अधोलिखितम् - तत्र एकम् अभिकथनम् (A) अपरञ्च तस्य कारणम् (R) इति

अभिकथनम् (A): रामादिवत् वर्तितव्यं न रावणादिवत्
कारणम् (R): दुश्चारित्र्यम् अपकीर्तेः कारणं भवति
उपर्युक्त - अभिकथन - कारणमाश्रित्य समुचितं विकल्पं चिनुत -

Correct Answer: (a) (A) तथा (R) उभावपि सत्यम्, (R) इति उचितं कारणमस्ति (A) इत्यस्य
Solution:

कथनद्वयं अधोलिखितम् तत्र एकम् अभिकथनम् (A) अपरञ्च तस्य कारणम् (R) इति अभिकथनम् (A) :रामादिवत् वर्तितव्यं न रावणादिवत् कारणम् (R) : दुश्चारित्र्यम् अपकीर्तेः कारणं भवति कारणमाश्रित्य समुचितं विकल्पं (A) तथा (R) उभावपि सत्यम्, (R) इति उचितं कारणमस्ति (A) इत्यस्य।

अर्थात् अधोलिखित दो कथन हैं- उसमें एक अभिकथन (A), दूसरा उसका कारण है (R), इस प्रकार अभिकथन (R) रामादि के समान आचरण करना चाहिए

रावणादि के समान नहीं, कारण (R) यह दुःचरित अपकीर्ति का कारण होता है। कारण आश्रित समुचित विकल्प Aतथा R दोनों सही हैं। R इस प्रकार उचित कारण हैं, A इस अभिकथन का।

57. एतद् नाटकद्वयं महाकवि भवभूति विरचितं नास्ति

A. विक्रमोर्वशीयम् B. उत्तररामचरितम् C. मृच्छकटिकम् D. मालतीमाधवम्
समुचितं विकल्पं चिनुत -

Correct Answer: (b) A एवं C
Solution:

एतद् नाटकद्वयं 'विक्रमोर्वशीयम्, मृच्छकटिकम् महाकवि भवभूति विरचितं नास्ति।
→ 'विक्रमोर्वशीयम् और मृच्छकटिकम् महाकवि भवभूति के द्वारा विरचित नाटकों में से नहीं हैं। विक्रमोशीयम् - कालिदास द्वारा रचित 'त्रोटक' नाटक है। जबकि मृच्छकटिकम् - शूद्रक का प्रकरण ग्रन्थ है।
→ भवभूति कृत उत्तररामचरितं में 7 अङ्क, मालतीमाधव में 10 अंक हैं। जो कि भवभूति के द्वारा रचित नाटक है। उत्तररामचरितं करुण रस प्रधान, जबकि मालतीमाधव शृङ्गार रस प्रधान नाटक है।

58. 'अग्निर्वे देवानां मुखम्' इति कथम्?

Correct Answer: (d) हविर्भक्षणात्
Solution:

'अग्निर्व देवानां मुखम्' इति 'हविर्भक्षणात्' । अर्थात् अग्नि देवताओं का मुख है। ऋग्वेदीय देवों में अग्नि का सबसे प्रमुख स्थान है। यह यजमानों के द्वारा विभिन्न देवों के उद्देश्य से अपने में प्रक्षिप्त हविष् को उनके पास पहुँचाता है।

वैदिक आर्यों के लिए देवताओं में इन्द्र के पश्चात् अग्नि देव का ही पूजनीय स्थान है। वैदिक मन्त्रों के अनुसार अग्निदेव नेतृत्व शक्ति से सम्पन्न यज्ञ की आहुतियों को ग्रहण करने वाला तथा तेज एवं प्रकाश का अधिष्ठाता है। ऋग्वेद में अग्नि को धृतपृष्ठ, शोचिषकेश, गृहपति, दमूनस आदि नामों से सम्बोधित किया गया है।

59. कौटिलीयमते धर्मोपधशुद्धान् अमात्यान् स्थापयेत्

A. धर्मस्थानीयेषु B. सन्निधातृनिचयकर्मसु C. कण्टकशोधनेषु D. ब्राह्मभ्यन्तरविहाररक्षासु
समुचितं विकल्प चिनुत - 

Correct Answer: (b) A एवं C
Solution:

कौटिलीयमते धर्मोपधशुद्धान् अमात्यान 'धर्मस्थानीयेषु 'कण्टकशोधनेषु' स्थापयेत्। कौटिलीयमतानुसार धर्मोपधा (धार्मिक उपायों द्वारा) अमात्य पद के लिए दो प्रकार के न्यायालय की स्थापना की गयी थी।
(1) कण्टकशोधन न्यायालय जिसके अन्तर्गत अपराध सम्बन्धी समस्याओं का निस्तारण किया जाता था।
(2) धर्मस्थानीय न्यायालय जिसके अन्तर्गत सामान्य समस्याओं का निस्तारण किया जाता था।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र विश्व के राजशास्त्रीय और अर्थशास्त्रीय ग्रन्थों में मूर्धन्य माना जाता है। यह नितान्त यथार्थपरक और व्यावहारिक ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में कुल 15 अधिकरण, 150 अध्याय हैं।

60. योगदर्शनानुसारं सार्वभौमव्रतेषु कस्य गणना न भवति ?

Correct Answer: (c) ईश्वरप्रणिधानस्य
Solution:

योगदर्शनानुसारं सार्वभौमव्रतेषु 'ईश्वरप्रणिधानस्य' गणना न भवति । अर्थात् योगदर्शन के अनुसार सार्वभौमिक व्रतों में ईश्वरप्रणिधान की गणना नहीं की जाती है। ईश्वर प्रणिधान पाँच नियमों में से एक है। ईश्वर प्रणिधान का अर्थ है-

ईश्वर में भक्तिपूर्वक सब कर्मों का समर्पण करना। योगदर्शन में नियम के पाँच प्रकार बताये गये हैं- (i) शौच (ii) संतोष (iii) तप (iv) स्वाध्याय (मोक्षशास्त्र का अनुशीलन जप) (v) ईश्वरप्रणिधान (ईश्वर में भक्तिपूर्वक सब कर्मों का समर्पण) योगदर्शन के सार्वभौमिक व्रतों में सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह की गणना की जाती है।