यूजीसी NTA नेट जेआरएफ परीक्षा, दिसम्बर 2021 (संस्कृत)

Total Questions: 100

61. 'सा नो दधातु भद्रया प्रिये धामनिधामनि' अत्र स्तूयमाना देवी का?

Correct Answer: (b) भूमिः
Solution:

'सा नो दधातु भद्रया प्रिये धामनिधामनि' अत्र स्तूयमाना देवी भूमिः । अर्थात् समस्त प्राणियों का जीवन सुखमय तथा आनन्दमय हो, इस प्रकार की स्तुति भूमि सूक्त में की गयी है। अथर्ववेद के 12वें काण्ड का प्रथम सूक्त भूमि सूक्त है जिसमें कुल 63 मन्त्र हैं।

अथर्ववेद के रचनाकार अथर्वन या अथर्वा ऋषि का चिन्तन पृथ्वी के समस्त चर-अचर के प्रति भूमि सूक्त में मुखरित होता है। भूमि सूक्त में पृथ्वी के पर्यावरण, जीव जगत् चर-अचर के सम्बन्धों की जो वैज्ञानिकता मुखरित हुई है वो आज अपने रचनाकाल के समय से ज्यादा प्रासङ्गिक प्रतीत होती है।

62. अत्र कथनद्वयं वर्तते तत्र (A) इत्यभिकथनम् (R) इति च तस्य कारणम् ।

अभिकथनम् (A) : न्याय दिशा तु न गुणगुणिनोः समानकालीनं जन्म। किन्तु द्रव्यं निर्गुणमेव प्रथममुत्पद्यते, पश्चात् तत्समवेता गुणा उत्पद्यन्ते ।
कारणम् (R): समानकालोत्पत्तौ तु गुणगुणिनोः समानसामग्रीकत्वाद् भेदो न स्यात्, कारणभेदनियतत्वात् कार्यभेदस्य।
उपर्युक्तम् (A) इत्यभिकथनं (R) इति कारणं चाश्रित्य समुचितं विकल्पं चिनुत 

Correct Answer: (c) (A) तथा (R) उभयं सत्यम्
Solution:

अत्र कथनद्वयं वर्तते तत्र (A) इत्यभिकथनम्, (R) इति च तस्य कारणम् उभयं सत्यम् । न्याय दिशा तु न गुणगुणिनोः समानकालीनं जन्म।

किन्तु द्रव्यं निर्गुणमेव प्रथममुत्पद्यते, पश्चात् तत्समवेता गुणा उत्पद्यन्ते। समानकालोत्पत्तौ तु गुणगुणिनोः समानसामग्रीकत्वाद् भेदो न स्यात, कारणभेदनियतत्वात् कार्य दस्य।

अर्थात् न्याय दिशानुसार गुण और गुणी की समान काल में उत्पत्ति नहीं होती। किन्तु पहले द्रव्य निर्गुण ही उत्पन्न होता है, बाद में उसमें समवाय सम्बन्ध से रहने वाले गुण उत्पन्न होते हैं।

यदि गुण तथा गुणी (दोनों) की समान काल में उत्पत्ति होगी तो उनकी कारण सामग्री भी समान होगी अतः उन दोनों में (यह गुण है यह गुणी है) इस प्रकार का भेद न होगा। क्योंकि कार्य का भेद कारण के भेद से व्याप्त है इसलिए प्रथमक्षण में निर्गुण घट ही उत्पन्न होता है।

वह (रूप आदि) गुणों से पूर्वभावी है, इस प्रकार वह गुणों का समवायिकारण होता है। अतः अभिकथन Aऔर R दोनों सत्य हैं।

63. केशवमिश्रानुसारं संयुक्तसमवायसन्निकर्षस्योदाहरणमस्ति

Correct Answer: (c) चक्षुः - घटरूपम्
Solution:

केशवमिश्रानुसारं संयुक्तसमवायसन्निकर्षस्योदाहरणं चक्षुः घटरूपम् अस्ति । अर्थात् केशवमिश्र के अनुसार संयुक्त समवायसन्निकर्ष का उदाहरण है चक्षु घटरूप। अर्थात् जब चक्षु के द्वारा घट के रूप में समवेत रूप का ग्रहण होता

तब चक्ष इन्द्रिय है, रूप अर्थ (विषय) है। इन दोनों का सन्निकर्ष संयुक्त समवाय ही है। क्योंकि चक्षु से संयुक्त घट में रूप समवेत हैं (यह समवाय सम्बन्ध से रहता है)।

चक्षुरादिना घटरूपादिकं गृह्यते, घटे श्यामं रूपमस्तीति, तदा चक्षुरिन्द्रियं, घटरूपमर्थः अनयोः सन्निकर्षः संयुक्त समवाय एव ।

64. अधस्तनेषु के द्वे शैवविषयक पुराणे स्तः

A. भागवतपुराणम्  B. मत्स्यपुराणम् C. गरुडपुराणम् D. ब्रह्माण्डपुराणम्
समुचितं विकल्पं चिनुत - 

Correct Answer: (d) B एवं D
Solution:

अधस्तनेषु पुराणे शेवविषयक मत्स्यपुराणम्, ब्रह्माण्डपुराणम् द्वे स्तः । अर्थात् दिये गये विकल्पों में दो पुराण मत्स्यपुराण और ब्रह्माण्डपुराण शैवविषयक पुराण के अन्तर्गत समाहित हैं। मत्स्यपुराण ऐतिहासिक पुराण है। इसमें आन्ध्र राजाओं की प्रमाणिक वंशावली का वर्णन है।

मत्स्यपुराण में दक्षिण भारत की मूर्तिकला, वास्तुकला एवं स्थापत्यकला का सुन्दर वर्णन है। लिङ्गपूजा का पहला स्पष्ट वर्णन मत्स्य पुराण में मिलता है। समस्त महापुराणों में 'ब्रह्माण्डपुराण' अन्तिम पुराण होते हुए भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। वैज्ञानिक दृष्टि से इस पुराण का विशेष महत्व है।

ब्रह्माण्डपुराण में लगभग 12000 श्लोक और 156 अध्याय हैं। ब्रह्माण्डपुराण के मध्य भाग में श्राद्ध और पिण्डदान सम्बन्धी विषयों का विस्तार के साथ वर्णन किया गया है।

साथ हि परशुरामचरित्र की विस्तृत कथा, राजा सगर की वंश परम्परा, भगीरथ द्वारा गङ्गा की उपासना, शिवोपासना, गङ्गा को पृथ्वी पर लाने का व्यापक प्रसङ्ग सूर्य एवं चन्द्रवंश के राजाओं का चरित्र वर्णन प्राप्त होता है।

65. याज्ञवल्क्यस्मृतेः व्यवहाराध्यायस्य प्रकरणे स्तः

A. उपनिधिप्रकरणम्  B. उपोद्धातप्रकरणम् C. साहसप्रकरणम् D. स्नातकधर्मप्रकरणम्
समुचितं विकल्पं चिनुत - 

Correct Answer: (b) A एवं C
Solution:

याज्ञवल्क्यस्मृतेः व्यवहाराध्यायस्य प्रकरणे 'उपनिधिप्रकरणम्, साहसप्रकरणम् स्तः । अर्थात् याज्ञवल्क्यस्मृति के व्यवहाराध्याय के प्रकरण में उपनिधिप्रकरण तथा साहसप्रकरण का वर्णन मिलता है। याज्ञवल्क्यस्मृति धर्मशास्त्र परम्परा का एक हिन्दू धर्मशास्त्रीय ग्रन्थ है।

याज्ञवल्क्य स्मृति का 'विषय निरूपण पद्धति अत्यन्त सुगठित है। इस पर विरचित मिताक्षरा टीका हिन्दू धर्मशास्त्र के विषय में भारतीय न्यायालयों में प्रमाण मानी जाती रही है।

व्यवहाराध्याय में पच्चीस प्रकरण हैं- साधाराव्यवहारमातृका, असाधाराव्यवहारमातृका, ऋणादान, उपनिधि, साक्षि, लेख्य, दिव्य, दायविभाग, सीमाविवाद, स्वामिपालविवाद, अस्वामिविक्रय, दत्ताप्रदानिक, क्रीटानुशया, अभ्युपेत्याशुश्रूषा, संविद्यव्यतिक्रम, वेतनादान, धूतसमाहवय, वाक्पारुष्य, साहस, विक्रीयासम्प्रदान, सम्भूयसमुत्थान, स्तेय, स्त्रीसंग्रहण, प्रकीर्णक, दण्डपारुष्य

66. पाणिनीय शिक्षानुसारम् अधमपाठकस्य दोषोऽस्ति

Correct Answer: (a) गीती
Solution:

पाणिनीय शिक्षानुसारम् अधमपाठकस्य दोषो 'गीतीऽस्ति'। अर्थात् पाणिनीय शिक्षा के अनुसार अधम पाठक के दोषों में गीती का वर्णन है।
माधुर्यमक्षरव्यक्तिः पदच्छेदस्तु सुस्वरः धैर्यं 
लयसमर्थश्च षडेते पाठकगुणाः । (उत्तमपाठक)
गीती, शीघ्री, शिरः कम्पी तथा लिखितपाठकः
अनर्थज्ञोऽल्पकण्ठश्च षडेते पाठकाधमाः ॥ 

(अधमपाठक)
पाणिनीय शिक्षानुसार अधम पाठक के दोषों में गीती, अर्थात् गाकर पढ़ने वाला, शीघ्री शीघ्र पाठी, शिरः कम्पी पढ़ते समय सिर हिलाने वाला, अनर्थज्ञ पाठ्य के अर्थ को नहीं जानने वाला और अल्पकण्ठ ये छः अधम पाठक माने गये हैं।

67. 'अध्यात्मम्' अत्र कतमः समासः ?

Correct Answer: (a) अव्ययीभावः
Solution:

'अध्यात्मम्' अत्र 'अव्ययीभावः' समासः । अध्यात्मम् पद का लौकिकविग्रह आत्मनि इति । तथा अलौकिक विग्रहआत्मनि ङि अधि सु। “अव्ययं विभक्ति समीप समृद्धि-------" सूत्र से 'अधि' अव्यय का 'आत्मन् डि' सुबन्त के साथ अव्ययीभाव समास हुआ।

'प्रथमानिर्दिष्टं समास उपसर्जनम्' सूत्र से 'अधि' की उपसर्जनसंज्ञा और 'उपसर्जनं पूर्वम्' सूत्र से पूर्वनिपात होकर अधि आत्मन् ङि बना। 'कृत्तद्धितसमासाश्च' सूत्र से 'अधि आत्मन् ङि' की प्रतिपदिक संज्ञा और 'सुपो धातुप्रातिपदिकयोः सूत्र से सुप् 'डि' का लोप होकर 'अधि + आत्मन्'बना।

'अनश्च' सूत्र से अध्यात्मन्' तथा अन्नन्त से समासान्त ट्च प्रत्यय होकर 'अध्यात्मन् + टच् (अ) बना। 'नस्तद्विते' सूत्र से 'अध्यात्मन्' के टि 'अन्' का लोप होकर 'अध्यात्म् + टच्' = अध्यात्म + अ बना।

'एकदेशविकृतस्यानन्यत्वात्' न्याय से 'डि' सुप् के लोप होने पर भी 'अध्यात्म' की प्रातिपदिकता अक्षुण्ण है अतः 'ड्यापप्रातिपदिकात् सूत्र से प्रथमा विभक्ति एकवचन की विवक्षा में 'सु' सुप की प्राप्ति हुई। इस प्रकार अध्यात्म + सु बना।

अव्ययीभावश्च सूत्र से अध्यात्म 'सु' की अव्यय संज्ञा हुई और 'नाव्ययीभावादतोऽमृत्वपञ्चम्याः' सूत्र से 'सु' के लोप का निषेध हुआ और 'सु' के स्थान पर अम् आदेश होकर 'अध्यात्म अम्' बना। 'अमिपूर्वः' सूत्र से पूर्व रूप एकादेश होकर 'अध्यात्मम्' रूप सिद्ध हुआ।

68. 'श्रूयतां महाभाग विदर्भों नाम जनपदः तस्मिन् भोज वंश भूषणम्_______'

इति गद्यखण्डं कस्यां रचनायां विद्यते? 

Correct Answer: (b) दशकुमारचरिते
Solution:

'श्रूयतां महाभाग विदर्भों नाम जनपदः तस्मिन् भोज वंश भूषणम् इति गद्यखण्ड 'दशकुमारचरिते' रचनायां विद्यते । सारांश इस प्रकार है वह वृद्ध विश्रुत अश्रु के कारण अवरुद्धकण्ठ से गद्गद् स्वर में बोला-महोदय सुनें विदर्भ नामक जनपद है

वहाँ भोजवंश के अलङ्कार, धर्म के अंशावतार अत्यन्त बलवान, सत्यनिष्ठ, दानशील, उदारप्रवृत्ति, विनम्र, यशस्वी धर्मशास्त्र तथा अर्थशास्त्र के अध्ययन में संलग्न पावनकीर्ति पुण्यवर्मा नाम का राजा था। यह गद्य खण्ड 'दशकुमारचरितम्' में वर्णित है।

दशकुमारचरितम् दण्डी द्वारा प्रणीत संस्कृत गद्यकाव्य है। इसमें दश कुमारों का चरित वर्णित होने के कारण इसका नाम 'दशकुमारचरित है। जबकि कादम्बरी कथा बाणभट्ट, स्वप्नवासवदत्तं भास का नाटक ग्रन्थ तथा हर्षचरित बाणभट्ट कृत आख्यायिका ग्रन्थ के अन्तर्गत आते हैं।

69. 'अन्धं तमः प्रविशन्ति ये असम्भूतिमुपासते। ततो भूय इव ते तमः य उ सम्भूत्यां रताः।"

अत्र मन्त्रे 'असम्भूति - सम्भूति' पदयोः अर्थो कौ ?
A. विकृतिः  B. प्रकृतिः C. कार्यब्रह्म D. अविनाशः

Correct Answer: (c) B एवं C
Solution:

'अन्धं तमः प्रविशन्ति ये असम्भूतिमुपासते । ततो भूय इव ते तमः य उ सम्भूत्यां रताः ।" अत्र मन्त्रे 'असम्भूति सम्भूति' - पदयोः अर्थो प्रकृतिः, कार्यब्रह्म अस्ति।

असम्भूति अर्थात् अव्यक्त प्रकृति के उपासक घोर अंधकार में प्रवेश करते हैं तथा जो सम्भूति अर्थात् हिरण्यगर्भ नामक कार्यब्रह्म की उपासना करते हैं वह उनसे भी अधिक घोर अंधकार में प्रवेश करते हैं।

कार्यों के बीज रूप अव्यक्त प्रकृति का सूचक है- असम्भूति पद और कार्य ब्रह्म हिरण्यगर्भ के लिए सम्भूति पद का वर्णन है।

70. नियमपूर्वकविद्याध्यने अध्यापकः किं संज्ञो भवति ?

Correct Answer: (b) अपादानसंज्ञः
Solution:

नियमपूर्वकविद्याध्यने अध्यापकः अपादानसंज्ञा भवति । अर्थात् जिस गुरु या अध्यापक या मनुष्य से कोई वस्तु नियमपूर्वक पढ़ी जाती है अथवा मालूम की जाती है, वह गुरु या अध्यापक या अन्य मनुष्य अपादान संज्ञक होता है।
जैसे- उपाध्यायाद अधीते - उपाध्याय से पढ़ता है।