यूजीसी NTA नेट जेआरएफ परीक्षा, दिसम्बर 2021 (संस्कृत)

Total Questions: 100

71. अथर्ववेदीय राष्ट्राभिवर्धन - सूक्तस्य देवता का?

Correct Answer: (b) ब्रह्मणस्पतिः
Solution:

अथर्ववेदीय राष्ट्राभिवर्धन - सूक्तस्य देवता 'ब्रह्मणस्पतिः' अस्ति। अथर्ववेद में राष्ट्राभिवर्धनम् सूक्त के देवता ब्राह्मणस्पति हैं। वैदिक साहित्य में अथर्ववेद का स्थान बड़ा ही अनुपम है, जहाँ अन्य वेद देवताओं की स्तुति को ही अपना प्रतिपाद्य विषय बनाते हैं।

'राष्ट्राभिवर्धनम्' सूक्त का भी एक विशिष्ट स्थान है। इसमें राष्ट्र की सुख समृद्धि के लिए ऋषि प्रार्थना करते हुए कहता है कि है ! ब्रह्मणस्पति जिस समृद्धिदायक मणि से इन्द्र की वृद्धि हुई है, उसी मणि के द्वारा तू हमें देश के हित के निमित्त विस्तृत करें।

अथर्ववेद के राष्ट्राभिवर्धनसूक्त में राष्ट्र की वृद्धि के लिए राजा द्वारा अभिवर्त मणि बाँधने की प्रार्थना है- "तेनास्मान् ब्राह्मणस्पतेतेभि राष्ट्राय वर्धय” जिससे तात्पर्य है कि राजा को राष्ट्र की उन्नति और सुरक्षा के लिए क्या-क्या उपाय करना चाहिए। इसको यहाँ प्रतीक रूप में बताया गया है।

72. अधोलिखितेषु द्वावेतौ सिद्धान्तरूपेण बौद्धदर्शन स्वीक्रियेते

A. शब्दनित्यतावादः  B. प्रतीत्यसमुत्पादः C. सप्तभङ्गीनयः D. क्षणिकवादः
समुचितं विकल्पं चिनुत - 

Correct Answer: (c) B एवं D
Solution:

अधोलिखितेषु सिद्धान्तरूपेण बौद्धदर्शन 'प्रतीत्यसमुत्पादः, क्षणिकवादः एतौ द्वौ स्वीक्रियेते। प्रतीत्यसमुत्पादः- बौद्ध भैषज्य शास्त्र की शब्दावली में प्रतीत्यसमुत्पाद वह आध्यात्मिक रसायन है, जिसके सेवन से संसार रूपी महारोग का समन होता है और समूल विनाश भी।

प्रतीत्यसमुत्पाद के सम्यक् सम्बोधन द्वारा समस्त मिथ्या दृष्टियों का निरसन होता है और प्रथम तीन आर्य सत्यों का सम्यक एवं |यथाभूत प्रकाशन होता है।

प्रतीत्यसमुत्पाद के अनुसार वस्तु नित्य नहीं है वस्तुओं की उत्पत्ति अन्य कारण से होती है। परन्तु इनका पूर्ण विनाश नहीं होता, बल्कि उसका कुछ कार्य एवं परिणाम अवश्य शेष रह जाता है। अतः प्रतीत्यसमुत्पाद न तो पूर्ण नित्यवाद है और न ही अपूर्ण विनाशवाद ।

क्षणिकवादः- बौद्धदर्शन में सबसे महत्वपूर्ण दर्शन क्षणिकवाद का है। इसके अनुसार, इस ब्रह्माण्ड में सब कुछ क्षणिक और नश्वर है।

यह शरीर और ब्रह्माण्ड उसी तरह है जैसे घोड़े, पहिए और पालकी के संगठित रूप को रथ कहते हैं और इन्हें अलग करने से रथ का अस्तित्व नहीं माना जाता। इस सिद्धान्त का मूल महात्मा बुद्ध द्वारा दिये गये चार आर्य-सत्यों पर आधारित है।

अतः दिये गये विकल्पों में प्रतीत्यसमुत्पाद और क्षणिकवाद समुचित विकल्प के रूप में स्वीकार किये गये हैं।

73. केन सह कस्य सम्बन्धः ?

तालिका – Iतालिका – II
A. ऋग्वेद:I. आदित्य:
B. यजुर्वेद:II. अङ्गिरा:
C. सामवेद:III. अग्नि:
D. अथर्ववेद:IV. वायु:

समुचितं विकल्पं चिनुत - 

Correct Answer: (c) A-III, B-IV, C-I, D-II
Solution:

तालिकानुसार समुचित विकल्प का क्रम इस प्रकार है-

तालिका – Iतालिका – II
A. ऋग्वेद:I. अग्नि:
B. यजुर्वेद:II. वायु:
C. सामवेद:III. आदित्य:
D. अथर्ववेद:IV. अङ्गिरा:

वैदिक वाङ्मय एक दृष्टि में

वेदआचार्यदेवताऋत्विक्उपवेद
ऋग्वेदपैलअग्निहोताआयुर्वेद
यजुर्वेदवैशम्पायनवायुअध्वर्युधनुर्वेद
सामवेदजैमिनिआदित्यउद्गातागान्धर्ववेद
अथर्ववेदसुमन्तुसोमब्रह्मासर्पवेद

 

74. तैत्तिरीय संहितायाः भाष्यकारान् कालक्रमेण योजयत्?

A. भवस्वामी B. क्षुरः C. कुण्डिनः D. सायणः E. कौशिकः भट्ट भास्कर - मिश्रः
समुचितं विकल्पं चिनुत - 

Correct Answer: (b) C, A, E, B, D
Solution:

तैत्तिरीय - संहितायाः भाष्यकारान् कालक्रमेण योजयत् समुचितं विकल्पं- कुण्डिनः→ भवस्वामी→ कौशिकः→ भट्टभास्कर - मिश्रः→ क्षुरः→ सायणः।
तैत्तिरीय संहिता के भाष्यकारों को कालक्रमानुसार रखने पर समुचित विकल्प इस प्रकार बनता है- कुण्डिन, भवस्वामी, कौशिकभट्ट,भास्कर मिश्र, क्षुर और सायणाचायें।

तैत्तिरीय शाखा कृष्ण यजुर्वेद की प्रमुख शाखा है। विष्णुपुराण के अनुसार इस शाखा के प्रवर्तक यक्ष के शिष्य तित्तिर ऋषि थे। वैत्तिरीय संहिता में 7 काण्ड, 44 प्रपाठक,तथा 631 अनुवाक हैं जिसका वर्ण्यविषय यज्ञीय कर्मकाण्ड (पुरोडास, वाजपेय, राजसूय
इत्यादि यागानुष्ठान) का विशद वर्णन है।

75. वाक्यपदीयानुसारं शब्दब्रह्मविषये के कथने उचिते स्तः ?

A. नादैराहितबीजायाम्
B. अनादि निधनं ब्रह्म
C. बुद्धौ शब्दोऽवधार्यते
D. एकमेव यदाम्नातं भिन्नं शक्तिव्यपाश्रयात्
समुचितं विकल्पं चिनुत - 

Correct Answer: (c) B एवं D
Solution:

वाक्यपदीयानुसारं शब्दब्रह्मविषये 'द्वी' कथने उचिते स्तः (1) अनादि निधनं ब्रह्म (2) एकमेव यदाम्नातं भिन्नं शक्तिव्यपाश्रयात् ।

'वाक्यपदीय' संस्कृत व्याकरण का प्रसिद्ध ग्रन्थ है। इसे त्रिकाण्डी भी कहते हैं। वाक्यपदीय व्याकरण श्रृंखला का मुख्य दार्शनिक ग्रन्थ है। इसके रचयिता महावैयाकरण भर्तृहरि हैं। यह ग्रन्थ तीन भागों में विभक्त है जिन्हें 'काण्ड' कहते हैं।

यह समस्त ग्रन्थ पद्य में लिखा गया है। प्रथम ब्रह्मकाण्ड है जिसमें 157 कारिकाएँ हैं, दूसरा वाक्यकाण्ड है जिसमें 493 कारिकाएँ हैं और तीसरा 'पदकाण्ड' के नाम से प्रसिद्ध है। प्रथम काण्ड (ब्रह्मकाण्ड) मूल में एक प्रकार से आगमशास्त्र है।

इसकी अभिव्यक्ति महेश्वर से है। आगम के अनुसार शब्द के चार स्वरूप हैं- परा, पश्यन्ती, मध्यमा, बैखरी। इनमें 'परा' ही ब्रह्म है। इसीलिए वाक्यपदीय की प्रथम कारिका में |ही शब्दतत्व को अनादि और अनन्त तथा अक्षर ब्रह्म भी कहा गया है। इसी पररूप ब्रह्म से संसार के पदार्थों की उत्पत्ति तथा व्यवहार विवर्तरूप में माना गया है।

एकमेव यदाम्नातं भिन्न शक्तिव्यपाश्रयात्। अर्थात् कारण कार्यात्मक शक्तियों के बीज भूत और भोगरूप में अनेक प्रकार की स्थिति या लोक व्यवहार दृष्टिगत होता है। अर्थात् वह सूक्ष्म हुए भी सभी पदार्थों का मूल कारण है। यथा- वृक्ष के सभी भागों का कारण उसका बीज छोटा है।

76. स्त्री प्रत्ययानुसारमधोऽ‌ङ्कितेषु 'ङीष्' प्रत्ययान्तः शब्दोऽस्ति

Correct Answer: (d) भवानी
Solution:

स्त्री प्रत्ययानुसारमधोऽङ्क्तेिषु 'ङीष् प्रत्ययान्तः भवानी शब्दोऽस्ति। इन्द्र, वरुण, भव, शर्व, रुद्र, मृड, हिम, अरण्य, यव, यवन, मातुल और आचार्य इन बारह शब्दों से स्त्रीत्व की विवक्षा में डीष प्रत्यय एवं इनको ही आनुक् का आगम भी होता है।

भवानी शब्द से 'इन्द्र-वरुण-भव शर्व-रुद्र मड-हिमारण्य-यव-यवनमातुलाचार्याणामानुक्' सूत्र द्वारा आनुक् का आगम और ङीष् प्रत्यय हुआ। आगम और प्रत्यय में अनुबंध लोप होकर भव + आन् + ई बना।

भव + आन् में सवर्णदीर्घ करके भवान् + ई, भवानी। सु उसका 'हल्ड्याब्भ्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं हल् से 'सु' का लोप होकर भवानी रूप सिद्ध हुआ। स्त्री प्रत्ययानुसार दिये गये विकल्पों में भवानी ङीष् प्रत्ययान्त शब्द हैं।

77. 'सौत्रान्तिकमतम्', 'वैभाषिकमतम्' अनयोः सम्बन्धो वर्तते -

Correct Answer: (d) बौद्धदर्शनेन
Solution:

'सौत्रान्तिकमतम्', 'वैभाषिकमतम्' अनयोः 'बौद्धदर्शनेन' सम्बन्धो वर्तते। अर्थात् सौत्रान्तिक और वैभाषिकमत का सम्बन्ध बौद्ध दर्शन से है जो भगवान् बुद्ध के निर्वाण के बाद बौद्ध धर्म के विभिन्न सम्प्रदायों द्वारा विकसित किया गया है।

सिद्धान्तभेद के अनुसार बौद्ध परम्परा में चार दर्शन प्रसिद्ध हैं इनमें वैभाषिक और सौत्रान्तिक मत हीनयान परम्परा में हैं। योगाचार और माध्यमिक मत महायान परम्परा में हैं।

यह उत्तरी बौद्धमत है। सौत्रान्तिक मत के अनुसार पदार्थों का प्रत्यक्ष नहीं अनुमान होता है जबकि वैभाषिक मत बाह्य वस्तुओं की सत्ता तथा स्वलक्षणों के रूप में उनका प्रत्यक्ष मानता है।

78. मनुमते उत्तरोत्तरश्रेष्ठानि मान्यस्थानानि सन्ति

A. बन्धुः B. वयः C. कर्म D. विद्या E. वित्तम
समुचितं विकल्पं चिनुत -

Correct Answer: (d) E, A, B, C, D
Solution:

मनुमते उत्तरोत्तरश्रेष्ठानि मान्यस्थानानि वित्तम, बन्धुः, वयः, कर्म, विद्या सन्ति । मनुमतानुसार उत्तरोत्तर श्रेष्ठमान्य स्थानक्रम का समुचित विकल्प इस प्रकार है। वित्तम्→ बन्धु→ वय→ कर्म→ विद्या।
अतः प्रश्नानुसार समुचित विकल्प (d) है।

79. संयोगानन्तरं पञ्चसन्निकर्षाणामयं क्रमः तर्कभाषायामुपलभ्यते

A. समवेतसमवायः B. विशेषणविशेष्यभावः C. संयुक्तसमवेत समवायः D. समवायः E. संयुक्त समवायः
समुचितं विकल्पं चिनुत - 

Correct Answer: (d) E, C, D, A, B
Solution:

संयोगानन्तरं पञ्चसन्निकर्षाणामयं क्रमः तर्कभाषायामुपलभ्यते - संयुक्तसमवायः, संयुक्तसमवेतसमवायः, समवायः, समवेतसमवायः, विशेषणविशेष्यभावः, समुचितं विकल्पं अस्ति। इन्द्रिय तथा अर्थ का जो सन्निकर्ष है

वह प्रत्यक्ष ज्ञान (साक्षात्कारिणी प्रमा) का निमित्त होता है, वह 6 (छः) प्रकार से होता है, जैसे- (i) संयोग, (ii) संयुक्तसमवाय (iii) संयुक्तसमवेत समवाय (iv) समवाय (v) समवेतसमवाय (vi) विशेषणविशेष्यभाव ।

इन 6 (छः) प्रकार के सन्निकर्षों में सर्वप्रथम संयोग का ग्रहण इसलिए किया गया है, क्योंकि द्रव्य के साथ इन्द्रिय का संयोग सन्निकर्ष होता है। और समस्त पदार्थों का आश्रय होने के कारण द्रव्य ही प्रधान है।

संयोग के अनन्तर पाँच सन्निकर्षों में सर्वप्रथम संयुक्त समवाय का ग्रहण किया गया है। उसके अनन्तर गुण आदि में रहने वाली सामान्य के सन्निकर्ष (संयुक्त समवेत समवाय) का ग्रहण किया गया है। तृतीय स्थान पर समवाय सन्निकर्ष का ग्रहण है,

क्योंकि समवाय भाव पदार्थों का धर्म है। फिर समवेत समवाय सन्निकर्ष का ग्रहण है, क्योंकि वह समवेत पदार्थ में समवाय से स्थित सामान्य का ग्राहक है। तदनन्तर विशेषणविशेष्यभाव सन्निकर्ष को रखा गया है। क्योंकि वह समवाय आदि का ग्राहक है।

मुख्य रूप से संयोग तथा समवाय दो ही सम्बन्ध हैं, इन दोनों में ही सम्बन्ध का लक्षण घटित होता है अन्य सन्निकर्षों का गौण रूप से सम्बन्ध कहा जाता है। क्योंकि इनका सम्बन्ध किसी न किसी रूप में दोनों सम्बन्धों से रहा करता है। अतः समुचित विकल्प (d) है।

80. सांख्याचार्याणां कालक्रमो यथातथं विभावनीयः

A. कपिलः B. ईश्वरकृष्णः C. आसुरिः D. पञ्चशिखः
समुचिर्त विकल्पं चिनुत - 

Correct Answer: (c) A, C, D, B
Solution:

सांख्याचार्याणां कालक्रमो यथातथं विभावनीयः। अर्थात् कपिलः→ आसुरिः→ पञ्चशिखः→ ईश्वरकृष्णः । इति समुचितं विकल्पं अस्ति। सांख्याचार्यों के कालक्रम को विभाजन करने पर आचार्यों का समुचित क्रम इस प्रकार है- (1) कपिल (ii) आसुरि (iii)पञ्चशिख (i) ईश्वरकृष्ण

कपिल-आचार्य कपिल को सांङ्ख्यशास्त्र (तत्व पर आधारित ज्ञान) के प्रवर्तक के रूप में जाना जाता है जिसके मान्य अर्थों के अनुसार विश्व का उद्भव विकासवादी प्रक्रिया से हुआ है। गीता में
इन्हें श्रेष्ठ मुनि कहा गया है। 'सिद्धान्तो कपिलो मुनिः।'

आसुरि - आसुरि कपिलमुनि के शिष्य और सांख्याचार्य पञ्चशिख के गुरु थे।

पञ्चशिख-पञ्चशिख सांख्यदर्शन के एक प्रधान आचार्य थे जिनका वर्णन महाभारत के शान्तिपर्व में आया है। ये कपिल की शिष्य परम्परा में आसुरि के शिष्य थे। इनका उल्लेख वामनपुराण, कूर्मपुराण और वायुपुराण तथा तर्पण विधि में प्रतिष्ठित आचार्य के
रूप में हुआ है।
ईश्वरकृष्ण - 'सांख्यकारिका' सांख्यदर्शन का प्रकरण ग्रन्थ है जिसके लेखक ईश्वरकृष्ण हैं। ईश्वर कृष्ण के गुरु पञ्चशिख माने जाते हैं।