यूजीसी NTA नेट जेआरएफ परीक्षा, दिसम्बर 2021 (संस्कृत)

Total Questions: 100

81. अशोकस्य शाहबाज़गढ़ी शिलालेखस्य लिपिरस्ति

Correct Answer: (a) खरोष्ठी
Solution:

अशोकस्य शाहबाज़गढ़ी शिलालेखस्य 'खरोष्ठी' लिपिरस्ति। अर्थात् अशोक के शाहबाजगढ़ी शिलालेख की लिपि खरोष्ठी है। शाहबाजगढ़ी मौर्य सम्राट अशोक से सम्बन्धित महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल है, यह पाकिस्तान के उत्तरी भाग में खैबर प्रान्त के मरदान जिले में स्थित है।

यहाँ तीसरी शताब्दी ई.पू. के मौर्य राजवंश के सम्राट अशोक के शिला पर अभिलेख का सबसे प्राचीन उदाहरण मिलता है। क्योंकि भारतीय उपमहाद्वीप में लिखाई का यह सबसे पुराना ज्ञात नमूना है।

82. सा केन सह कस्य सम्बन्धः ?

तालिका – Iतालिका – II
A. सङ्कल्पकम्I. सिद्धि:
B. नवधाII. मन:
C. अष्टधाIII. तामिस्र:
D. अष्टादशधाIV. तुष्टि:

समुचितं विकल्पं चिनुत 

Correct Answer: (c) A-II, B-IV, C-I, D-III
Solution:

तालिकानुसार समुचित विकल्प (c) है।

तालिका – Iतालिका – II
A. सङ्कल्पकम्I. मनः
B. नवधाII. तुष्टिः
C. अष्टधाIII. सिद्धिः
D. अष्टादशधाIV. तामिस्रः

"सङ्कल्पकमत्र मनः” अर्थात् संकल्प करने वाला मन हैं। 'संकल्प से मन लक्षित होता है। इन्द्रिय के द्वारा किसी विषय के 'यह वस्तु' इस प्रकार अविविक्त (अर्थात सामान्य विषय से रहित) या अस्पष्ट रूप से ज्ञात होने पर मन के द्वारा 'यह वस्तु ऐसी है ऐसी नहीं इस प्रकार से उनका संकल्प ज्ञात होता है।

तुष्टिर्नवधा - (i) प्रकृति (ii) उपादान (iii) काल (iv) भाग (v) पार (vi) सुपार (vii) पारापार (viii) अनुत्तमाम्भस् (ix) उत्तमाम्भस् अष्टधा सिद्धिः (i) अणिमा (ii) महिमा (iii) लघिमा (iv) गरिमा (v) प्राप्ति (vi) प्राकाम्य (vii) ईशित्व (viii) वशित्व ।

83. 'न ब्राह्मणासो न सुतेकरासः' इति मन्त्रांशे 'सुतेकरासः इति पदस्य सायणानुसारमर्थोऽस्ति?

Correct Answer: (a) ऋत्विजः
Solution:

'न ब्राह्मणासो न सुतेकरासः इति मन्त्रांशे 'सुतेकरासः' इति पदस्य सायणानुसारमर्थो ऋत्विजः अस्ति। सायणानुसार 'न ब्राह्मणासो न सुतेकरासः' इस मन्त्र में सुतेकरासः पद का अर्थ 'ऋत्विज' है।

ऋग्वेद के 10वें मण्डल में ब्राह्मण, ज्ञान एवं यज्ञों के सम्पादन को श्रेष्ठ और हल आदि कार्यों से जीविकोपार्जन का हेय माना गया है।

अर्थात् जो वेदार्थ न जानने वाले अविद्वान इस लोक में ब्राह्मणों के और परलोक में देवों के साथ यज्ञादि कर्म नहीं करते और जो न ब्रह्मवेद जानने वाले हैं और न सोमयज्ञकर्ता हैं, वह ज्ञानी नहीं होते।

वे ये पापकारिणी लौकिक वाणी को प्राप्त कर मूर्ख व्यक्ति के समान हल आदि साधन लेकर अपना भरण-पोषण कृषि आदि व्यवहार से करते हैं।

84. यशोधर्मणः मन्दसौरस्तम्भलेखानुसारं यशोधर्मा कस्य देवस्य समर्चनां करोति

Correct Answer: (d) शिवस्य
Solution:

यशोधर्मणः मन्दसौरस्तम्भलेखानुसारं यशोधर्मा 'शिवस्य' देवस्य समर्चनां करोति यशोधर्मन के मन्दसौरस्तम्भलेखानुसार यशोधर्मा शिव की अर्चना करता है। यशोधर्मन का दूसरा नाम विष्णुवर्धन था। उसने राजाधिराजपरमेश्वर और सम्राट की उपाधि धारण की थी।

अभिलेख में उस‌के अच्छे शासन और उसके सद्‌गुणों के कई उल्लेख हैं। यशोधर्मन की तुलना मनु, भरत से की गयी है। यशोधर्मन (विष्णुवर्धन) का मन्दसौर शिलालेख मध्यप्रदेश के मन्दसौर में स्थित एक शिलालेख है जो संस्कृत भाषा एवं गुप्तलिपि में है। यह लेख 'ॐ' से आरम्भ होता है, जिसके पश्चात् शिव का मङ्गलाचरण है।

85. सामवेदस्य शाखे स्तः ?

A. वाधूल - संहिता B. शाट्यायनीय संहिता C. कपिष्ठल कठ संहिता D. जैमिनीय संहिता

Correct Answer: (c) B एवं D
Solution:

सामवेदस्य शाखे स्तः- (i) शाट्यायनीय संहिता (ii) जैमिनीय संहिता। अर्थात् महाभाष्य में पतञ्जलि ने सामवेद की एक सहस्र शाखाओं का उल्लेख किया है, (सहस्रवर्त्या सामवेदाः) जबकि जैमिनि गृह्यसूत्र में 13 शाखाओं का उल्लेख मिलता है।

86. 'वाक्यं स्याद्योग्यताकांक्षासत्तियुक्तः पदोच्चयः' इदं वाक्यस्वरूपं प्रतिपादितमाचार्येण अनेन

Correct Answer: (d) आचार्य - विश्वनाथेन
Solution:

'वाक्यं स्याद्योग्यताकांक्षासत्तियुक्तः पदोच्चयः' इदं वाक्यस्वरूपं प्रतिपादितमाचार्येण विश्वनाथेन। अर्थात् आचार्य विश्वनाथ ने 'आकांक्षा, योग्यता और आसत्ति से युक्त पद-समूह को वाक्य माना है।
आकांक्षा = अर्थज्ञान की पूर्ति की जिज्ञासा
योग्यता = बुद्धि सम्मत सम्बन्ध
आसत्ति = अव्यवधान
यदि आकांक्षा पद न होता तो के बिना हाथी, मनुष्य, घोड़ा, यह पद समूह भी वाक्य हो जाता ।
योग्यता- 'पदार्थों के परस्पर सम्बन्ध में बाध का न होना। यदि कोई कहे 'वह्निना सिञ्चति' आग से सींचता है तो यह वाक्य न होगा।

आमत्ति- आसत्ति के लिए अपेक्षित होता है अर्थ के विचार से परस्पर सम्बद्ध दो पदों के बीच समय और पदार्थ दोनो का अव्यवधान |

87. अथर्ववेदस्य शाखे स्तः ?

A. हारिद्रवीय - संहिता B. शौनक - संहिता C. छागलेय - संहिता D. पैप्पलाद - संहिता
समुचितं विकल्पं चिनुत - 

Correct Answer: (c) B एवं D
Solution:

अथर्ववेदस्य शाखे स्तः (i) शौनक - संहिता (ii) पैप्पलाद - संहिता। अथर्ववेद की उपलब्ध शाखा- (i) शौनकीय शाखा (शौनक) अथर्ववेद संहिता शौनकीय शाखा है। इसमें 20 काण्ड, 730 सूक्त, 5987 मन्त्र हैं।

(ii) पैप्पलाद शाखा- पिप्पलाद ऋषि के नाम पर इस शाखा का नामकरण किया गया। पैप्पलाद शाखा की संहिता 'पैप्पलाद संहिता' है। पिप्पलाद शाखा की एकमात्र प्रति कश्मीर में शारदालिपि में प्राप्त हुई थी। महाभाष्य काल में पिप्पलाद पैप्पलाद शाखा सर्वाधिक प्रचलित थी।

पतञ्जलि ने महाभाष्य में 'नवधाऽथर्वणो वेदः' कहकर अथर्ववेद की 9 शाखाओं का उल्लेख किया है जो इस प्रकार हैं- (1) पिप्पलाद पैप्पलाद (2) स्तौद तौद (3) मौद (4) शौनकीय (5) जाजल (6) जलद (7) ब्रह्मवेद (8) देवदर्श (9) चारणवैद्य

88. वाचः काठिन्यमायान्ति भङ्गश्लेषविशेषतः। नोद्वेगस्तत्र कर्त्तव्यो यस्मान्नैको रसः कवेः॥

इति पद्यं कस्मिन काव्ये विलसति ? 

Correct Answer: (b) दशकुमारचरिते
Solution:

वाचः काठिन्यमायान्ति भङ्गश्लेषविशेषतः । नोद्रेगस्तत्र कर्तव्यो यस्मात्रैको रसः कवेः।। इति पद्यं 'नलचम्पू काव्ये' विलसति । अर्थात् (काव्य की) वाणियाँ सभङ्गश्लेष की विशेषता से कठिन हो जाती है पर उससे घबराना नहीं चाहिए। क्योंकि कवि के लिए एक ही रस नहीं है।

कवि अपने काव्य में कहीं कठिनता और कहीं कोमलता का प्रयोग करता है, जिससे रसास्वाद दुष्कर नहीं होता है। यह पद्य नल चम्पू काव्य में मिलता है।

89. कथनद्वयम् अधोलिखितम् तत्र एकम् अभिकथनम् (A), अपरञ्च तस्य कारणम् (R) इति -

अभिकथनम् (A): यो वै एताम् एवं वेद, अपहत्य पाप्मनम्, अनन्ते स्वर्गलोके, ज्येये प्रतितिष्ठति प्रतितिष्ठतिः
कारणम् (R): 'यतः स जानाति तपः दमः कर्म इति प्रतिष्ठा, वेदाः सर्वाङ्गानि सत्यमायतनम्'
उपर्युक्त - अभिकथन कारणमाश्रित्य समुचितं विकल्पं चिनुत -

Correct Answer: (c) (A) एवम् (R) उभावपि सत्यम् (R) इति उचितं कारणमस्ति (A) इत्यस्य
Solution:

अभिकथनम् (A) यो वै एताम् एवं वेद, अपहत्य पाप्मनम्, अनन्ते स्वर्गलोके, ज्येये प्रतितिष्ठति प्रतितिष्ठतिः कारणम् (R) : 'यतः स जानाति तपः दमः कर्म इति प्रतिष्ठा, वेदाः सर्वाङ्गानि सत्यमायतनम्'

(A) एवम् (R) उभावपि सत्यम् (R) इति उचितं कारणमस्ति (A) इत्यस्य अर्थात् (A) और (R) दोनों सत्य है, (R) उचित कारण है (A) का।

90. 'स एकस्त्रीणि जयति जगन्ति कुसुमायुधः। हरताऽपि तनुं यस्य शंभुना न हृतं बलम् ॥

इत्यस्मिन् पद्ये कः अलङ्कारे वर्तते? 

Correct Answer: (d) विशेषोक्तिः
Solution:

'स एकस्त्रीणि जयति जगन्ति कुसुमायुधः । हरताऽपि तनुं यस्य शंभुना न हृतं बलम्।। इत्यस्मिन् पद्ये 'विशेषोक्तिः' अलङ्कारो वर्तते। इस पद्य में विशेषोक्ति अलङ्कार है।

लक्षण - 'विशेषोक्तिरखण्डेषु कारणेषु फलावचः ।।' (काव्यप्रकाश) 'सति हेतौ फलाभावे विशेषोक्तिस्तथा द्विधा।।' (साहित्य दर्पण) हेतु अर्थात् कारण के होते हुए भी फलाभिव्यक्ति न होने पर विशेषोक्ति अलङ्कार होता है विशेषोक्ति भी विभावना की ही तरह दो प्रकार की होती है

उक्तिनिमित्ता तथा अनुक्तनिमित्ता। आचार्य विश्वनाथ ने मम्मट द्वारा स्वीकृत 'अचिन्त्यनिमित्ता' नामक विशेषोक्ति के तृतीय भेद को 'अनुक्तनिमित्ता' में ही अन्तर्भूत माना है।

स एकस्त्रीणि---------------बलम् ।
यह अचिन्त्यनिमित्ता विशेषोक्ति अलङ्कार का उदाहरण है।
तुल्ययोगिता- 'नियतानां समृद्धर्मः सा पुनस्तुल्ययोगिता।' (काव्यप्रकाश)
निदर्शना- 'सम्भवन् वस्तुसम्बन्धोऽसम्भवन्वाऽपि कुत्रचित् ।
अभवन् वस्तुसम्बन्धः उपमापरिकल्पकः निदर्शना ।।' (काव्यप्रकाश)
विभावना- 'क्रियायाः प्रतिषेधेऽपि फलव्यक्तिर्विभावना।'
(काव्यप्रकाश)