यूजीसी NTA नेट जेआरएफ परीक्षा, दिसम्बर 2021 जून 2022 (संस्कृत)

Total Questions: 100

1. सम्यग्दर्शनादिगुणजनितक्षयोपशमनिमित्तमवच्छिन्नविष यं ज्ञानम् -

Correct Answer: (c) अवधिः
Solution:

सम्यग्दर्शनादिगुणजनितक्षयोपशमनिमित्तमवच्छिन्नविषयं ज्ञानम् अवधिः अस्ति। अर्थात् सम्यक् दर्शनादि के कारण होने वाले क्षय के उपशमन (बचाव ) के कारण अन्य विषय का ज्ञान अवधि (काल या समय) है। जैन दर्शन में ज्ञान के दो भेद माने हैं-

2. सिद्धान्ते 'वैश्वदेवेन यजेत' इत्यत्र 'वैश्वदेव' पदं यागनामधेयम् अस्ति-

Correct Answer: (b) तत्प्रख्यशास्त्रात्
Solution:

सिद्धान्ते 'वैश्वदेवेनयजेत' इत्यत्र वैश्वदेव पदं यागनामधेयम् तत्प्रख्यशास्त्रात् अस्ति। सिद्धान्त में वैश्वदेवेन यजेत यहाँ वैश्वदेव पद यागनमधेय तत्प्रक्ष्यशास्त्र से है। अर्थात् विधेय अर्थ का निश्चय कराता हुआ सार्थक नामधेय होता है। नामधेय का अर्थ याग का नाम। यागों के नाम हैं

उद्भिदा यजेत, बलभिदा यजेत, विश्वजित यजेत, वाजपेयेन यजेत, वैश्वदेवेन यजेत। वस्तुतः प्रकृत स्थल में भी तत्प्रख्यरूशास्त्ररूप निमित्त से ही 'वैश्वदेव' शब्द याग विशेष का नामधेय होता है।

प्रस्तुत याग में विश्वेदेव रूप गुण का प्रकाशक अर्थवाद वाक्य 'यद विश्वेदेवाः समयजन्त तद् वैश्वदेवस्य वैश्वदेवत्वम्' है। इसलिये 'वैश्वदेवेन यजेत' में 'वैश्वदेव' शब्द याग का नामधेय होता है।

3. यथोचित मेलनं कुरुत-

सूची-Iसूची-II
(A) निपातः(I) कृत्तद्धितसमासाश्च
(B) नाम(II) भावप्रधानम्
(C) आख्यात(III) सत्त्वप्रधानानि
(D) प्रातिपदिकम्(IV) उच्चावचेष्वर्थेषु निपतन्ति

समुचितं विकल्पं चिनुत-

ABCD
(a)IIIIIIIV
(b)IVIIIIII
(c)IVIIIIII
(d)IIIIIIIV
Correct Answer: (c)
Solution:

 यथोचितं मेलनं अस्ति-

सूची-Iसूची-II
(A) निपातः(IV) उच्चावचेष्वर्थेषु निपतन्ति
(B) नाम(III) सत्त्वप्रधानानि
(C) आख्यात(II) भावप्रधानम्
(D) प्रातिपदिकम्(I) कृत्तद्धितसमासाश्च

उच्चावच्चेषु अर्थेषु निपतन्ति इति निपाताः अर्थात् अनके अर्थों को लेकर जो वाक्य में गिरने लगते हैं या प्रयोग किये जाते हैं उन्हें निपात कहते हैं। निपात तीन प्रकार के होते है-
(1) उपमार्थक निपात। (2) पदपूरणार्थक निपात। (3) कर्मोपसंग्रहार्थक निपात।

सत्वप्रधानानानि नामानि भाव प्रधानम् आख्यातम्। अर्थात् सत्व (द्रव्य) की प्रधानता होता है उसे नाम कहते हैं। जैसे ब्रज्, गम्, पच् इत्यादि और जहाँ भाव (क्रिया) की प्रधानता होती है। उसे आख्यात कहते हैं। जैसे ब्रजति, चलति, पचति आदि।

कृत्तद्धिसमासाश्च प्रातिपदिकम् अर्थात् कृदन्त, तद्धितान्त और समासश्च प्रातिपदिक होते हैं।

4. याज्ञवल्क्यानुसारं प्रत्यभियोगं केषु विवादेषु कर्तुं शक्यते ?

Correct Answer: (a) साहसेषु
Solution:

याज्ञवल्क्यानुसारं प्रत्यभियोगं 'साहसेषु' विवादेषु कर्तुं शक्यते ।
कुर्यात् प्रत्यभियोगं च कलहे साहसेषु च। 
उभयोः प्रतिभूर्गाह्यः समर्थः कार्यनिर्णये ॥
अर्थात् कलह (वाग,दण्ड, पारुष्य) में और साहस के विषय में अभियोग लगाना चाहिए तथा दोनों के प्रतिभूः (उचित दण्ड) ग्रहण कर समर्थ कार्य का निर्णय करना चाहिए।

साहसस्तेयपारूष्यगोभिशापात्ययये स्त्रियाम्।
विवादयेत्सद्य एव कालोऽन्यत्रेच्छया स्मृताः ॥
अर्थात् याज्ञवल्क्य के अनुसार साहस, चोरी, गाली, गाय,अभिशाप (पाप का अभियोग) और स्त्री विषयक विवादों को तुरन्त निर्णय करे और विषयों में इच्छानुसार समय लगावें। याज्ञवल्क्यानुसार प्रत्यभियोग साहस के विवाद में करना चाहिए

5. रसादिध्वनौ अन्तर्भवतः -

(A) वस्तुध्वनिः (B) अलङ्कारध्वनिः (C) रसध्वनिः (D) भावध्वनिः
समुचितमुत्तरं चिनुत- 

Correct Answer: (c) (C) एवम् (D)
Solution:

रसादिध्वनौ 'रसध्वनि, भावध्वनि' अन्तर्भवतः। अर्थात् रसादि ध्वनि में रस ध्वनि और भाव ध्वनि अन्तर्भूत होती है। ध्वनि के दो भेद होते हैं- (1) लक्षणामूला ध्वनि (2) अभिधामूला ध्वनि । अभिधामूला के दो भेद-
(1) असलक्ष्य क्रम व्यङ्गय (2) संलक्ष्यक्रमव्यङ्गय।
संलक्ष्यक्रमव्यङ्गय के तीन भेद होते हैं-
(1) शब्दशक्त्युत्थ (2) अर्थशक्त्युत्थ (3) उभयशक्त्युत्थ।
शब्दशक्त्युत्थ के वस्तुध्वनि और अलंकार ध्वनि से दो भेद होते हैं। अर्थशक्त्युत्थ के 12 भेद तथा उभयशक्त्युत्थ के एक भेद होते है।

परन्तु असंलक्ष्यक्रमव्यङ्गय ध्वनि को रसध्वनि कहते हैं। अतः रसादि ध्वनि अर्थात् रसाभाव, भाव, भावाभास, भावशान्ति, भावोदय, भावसन्धि और भावशबलता आदि असंलक्ष्यक्रम व्यङ्गय के अन्तर्गत है। अतः विकल्प (c) सही है।

6. यथोचित मेलनं कुरुत

सूची-Iसूची-II
(A) स्पर्श-संघर्षी(I) ट्
(B) संघर्षी(II) च्
(C) स्पर्शः(III) ष्
(D) अर्धस्वरः(IV) य्

समुचितं विकल्पं चिनुत

Correct Answer: (b)
Solution:

यथोचितं मेलनं अस्ति-

सूची-Iसूची-II
(A) स्पर्श-संघर्षी(II) च्
(B) संघर्षी(III) ष्
(C) स्पर्शः(I) ट्
(D) अर्धस्वरः(IV) य्

स्पर्श-संघर्षी च् छ, ज्, झ, ञ्, वर्ग हैं, संघर्षी शू, ष, स्, ह, वर्ण हैं, स्पर्श वर्ण क से लेकर म् तक हैं तथा अर्धस्वर य् और ल वर्ण हैं अतः विकल्प (b) सही है।

7. 'वास्तव औपम्य अतिशय श्लेषाः इति रूपेण अलङ्काराणां चतुर्धा विभाजनं करोति -

Correct Answer: (b) रुद्रटः
Solution:

वास्तव औपम्य अतिशय श्लेषाः इति रूपेण अलङ्काराणां चतुर्धा विभाजनं रुद्रटः करोति । अर्थात् वास्तव औपम्य अतिशय श्लेष इस तरह अलङ्कारों का चार प्रकार से विभाजन रुद्रट करते हैं।

रुद्रट ने अंलकारों का चार मूल तत्वों में विभाजन किया है। (i)वास्तव वर्ग में 23 (ii) औपम्यवर्ग में 21 (iii) अतिशय वर्ग में 12 (iv) श्लेष में 1अलङ्कार माना है।

रुद्रट ने काव्य में रस दोष को 'विरस' नाम से अभिहित किया है। उनके ग्रन्थ का नाम काव्यालङ्कार है जो विषय की दृष्टि से अत्यन्त व्यापक है। ग्रन्थ सोलह अध्यायों में पूर्ण है।

प्रथमाध्याय में काव्य प्रयोजन और काव्य हेतु, द्वितीय में काव्यलक्षण, रीति, भाषाभेद, वक्रोक्ति आदि तीन शब्दालङ्कार, तृतीय, चतुर्थ में क्रमशः यमक और श्लेष, पांचवे में चित्र काव्य, छठे में शब्ददोष एवं उनका परिहार,
सात से दस के चार अध्यायों में अर्थालङ्कार दोष, बारह से पन्द्रह तक के चार अध्यायों में रस आदि का निरूपण विवेचन और सोलहवें अध्याय में महाकाव्य, प्रबन्ध आदि का विवेचन किया गया है। ग्रन्थ की पद्यसंख्या 734 है।

8. अधोलिखितेषु को द्वौ क्यप्प्रत्ययान्तौ?

(A) आदृत्यः (B) आहत्य (C) शप्यम् (D) जुष्यः
समुचितं विकल्पं चिनुत- 

Correct Answer: (d) (A) एवम् (D)
Solution:

उपरिलिखितेषु आदृत्यः जुष्यः द्वौ क्यप्प्रत्ययान्तौ। अर्थात् आदृत्यः और जुष्यः ये दानों क्यप्प्रत्ययान्त शब्द है।

सूत्र- 'एतिस्तुशास्वृदृजुषः क्यप्' इ, स्तु, शास्, वृ, दृ, जुष् तथा वृत्, वृध् आदि अन्यान्य धातुओं से क्यप् प्रत्यय होता है।

क्यप में ककार की लशक्वतद्धिते से इत्संज्ञा और पकार की 'हलन्त्यम्' से इत्संज्ञा और दोनों का 'तस्यलोपः' से लोप होकर केवल 'य' शेष बचता है। आ+ +क्यप् = आवृत्यः, वृ+क्यप् = वृत्यः
शास् + क्यप् = शिष्यः, जुष् + क्यप् = जुष्यः ।

9. 'आर्स पोएतिका' इति ग्रन्थस्य कर्ता कः ?

Correct Answer: (d) होरेस महोदयः
Solution:

आर्स पोएतिका इति ग्रन्थस्य कर्ता 'होरेस महोदयः' अस्ति अर्थात् 'आर्स पोएतिका' इस ग्रन्थ के कर्ता (रचयिता) होरेस महोदय हैं।

आर्स पोएटिका और द आर्ट ऑफ पोएट्री होरेस द्वारा लिखित एक कविता है।

सैमुअल टेलर कोलरिज महोदय की रचना 'द राइम ऑफ द एन्शियंट मेरिनर और कुबला खान'है।

मैथ्यू आर्नल्डमहोदय की रचना द स्कॉलर जिप्सी, द स्टडी ऑफ पोएट्री, कल्चर एण्ड एनार्की आदि है।

ईवर आर्मस्ट्रॉग रिचर्ड्स महोदय की रचना द फिलॉसफी ऑफ रिटोरिक, कॉलरिज आन् इमैजिनेशन, साइन्स एण्ड पोएट्री आदि रचनाएँ हैं।

10. पदपूर्वार्धवक्रतायाः भेदेषु अस्ति-

Correct Answer: (b) क्रियावैचित्र्यवक्रता
Solution:

पदपूर्वार्धवक्रतायाः भेदेषु 'क्रियावैचित्र्यवक्रता' अस्ति वक्रोक्ति सिद्धान्त की वर्ण विन्यास वक्रता, पदपूर्वार्ध वक्रता के आठ भेद हैं-
1. रूढ़िवैचित्र्य वक्रता 2. पर्याय वक्रता 3. उपचार वक्रता 4. विशेषण वक्रता 5. संवृत्ति वक्रता 6. वृत्ति वक्रता 7. लिंगवैचित्र्य वक्रता 8. क्रियावैचित्र्य वक्रता