Solution:वास्तव औपम्य अतिशय श्लेषाः इति रूपेण अलङ्काराणां चतुर्धा विभाजनं रुद्रटः करोति । अर्थात् वास्तव औपम्य अतिशय श्लेष इस तरह अलङ्कारों का चार प्रकार से विभाजन रुद्रट करते हैं।
रुद्रट ने अंलकारों का चार मूल तत्वों में विभाजन किया है। (i)वास्तव वर्ग में 23 (ii) औपम्यवर्ग में 21 (iii) अतिशय वर्ग में 12 (iv) श्लेष में 1अलङ्कार माना है।
रुद्रट ने काव्य में रस दोष को 'विरस' नाम से अभिहित किया है। उनके ग्रन्थ का नाम काव्यालङ्कार है जो विषय की दृष्टि से अत्यन्त व्यापक है। ग्रन्थ सोलह अध्यायों में पूर्ण है।
प्रथमाध्याय में काव्य प्रयोजन और काव्य हेतु, द्वितीय में काव्यलक्षण, रीति, भाषाभेद, वक्रोक्ति आदि तीन शब्दालङ्कार, तृतीय, चतुर्थ में क्रमशः यमक और श्लेष, पांचवे में चित्र काव्य, छठे में शब्ददोष एवं उनका परिहार,
सात से दस के चार अध्यायों में अर्थालङ्कार दोष, बारह से पन्द्रह तक के चार अध्यायों में रस आदि का निरूपण विवेचन और सोलहवें अध्याय में महाकाव्य, प्रबन्ध आदि का विवेचन किया गया है। ग्रन्थ की पद्यसंख्या 734 है।