यूजीसी NTA नेट जेआरएफ परीक्षा, दिसम्बर 2021 जून 2022 (संस्कृत)

Total Questions: 100

91. अधोलिखितं परिच्छेदं पठित्वा प्रश्नानाम् (91-95) उत्तराणि देयानि-

देव ! मयापि परिभ्रमता विन्ध्याटव्यां कोऽपि कुमारः क्षुधा तृषा च क्लिश्यन्त्रक्लेशार्हः क्वचित्कूपाभ्यासेऽष्टवर्षदेशीयो दृष्टः । स च त्रासगद्गद्भगदत् महाभाग ! क्लिष्टस्य में क्रियतामार्य ! साहाय्यकम्।

अस्य मे प्राणापहारिणीं पिपासां प्रतिकर्तुमुदकयुदञ्चे कूपे कोऽपि
निष्कलो ममैकशरणभूतः पतितः। तमलमस्मि नाहमुद्धर्तम् इति ।

यथाहमभ्येत्य व्रतत्या कयापि वृद्धमुत्तार्य, तं च बालं वंशनालीमुखोद्धृताभिरद्धिः फलैश्च पञ्चषैः शरक्षेपोच्छितस्य लकुचवृक्षस्य शिखरात् पाषाणपातितैः प्रत्यानीतप्राणवृत्तिमापाद्य, तरुतलनिषण्णस्तं जरन्तम् अब्रवम्।

एषः गद्यांशः कस्मिन् काव्ये प्राप्यते?

Correct Answer: (a) दशकुमारचरिते
Solution:

एषः गद्यांश 'दशकुमारचरिते' काव्ये प्राप्यते । अर्थात् यह गद्यांश दशकुमारचरित काव्य में प्राप्त होता है। इसमें आठ उच्छ्वास हैं। यह तीन पीठिका में विभक्त है।

(1) पूर्वपीठिका (2) चरित्र भाग (3) उत्तर पीठिका। पूर्व पीठिका में पाँच उच्छ्वास हैं। उत्तर पीठिका में तीन उच्छ्वास हैं। इसमें 10 कुमारो के जीवन-चरित्र का वर्णन है।

'हर्षचरित्र' बाणभट्ट का ऐतिहासिक गद्य काव्य है इसमें आठ उच्छ्वास हैं। कादम्बरी बाणभट्ट की कथा काव्य तथा नलचम्पू, त्रिविक्रम भट्ट का चम्पूकाव्य है।
अतःविकल्प (a) सही है।

92. 'पाषाणपातितैः प्रत्यानीतप्राणवृत्तिमापाद्य' इत्यस्मिन् वाक्ये कः अलङ्कारः ?

Correct Answer: (b) वृत्यानुप्रासः
Solution:

'पाषाणपातितैः प्रत्यानीतप्राणवृत्तिमापाद्य' इत्यस्मिन् वाक्ये वृत्यानुप्रासः अलङ्कारः अस्ति।
अर्थात् इस वाक्य में वृत्यानुप्रास अलङ्कार है। 'एकस्याप्यसकृत्परः' एक वर्ण का भी और अनेक वर्णों का भी अनेक बार का आवृत्तिसाम्य होने पर वृत्यानुप्रास अलंकार होता है।

यह अनुप्रास का एक भेद है। इसमें प वर्ण, पा पा वर्ण तथा त वर्णों की अनेक बार आवृत्ति हुई है। अनेक वर्णों की एक बार आवृत्तिसाम्य छेकानुप्रास होता है।

जहाँ पर पदों का साम्य होता है। वहाँ लाटानुप्रास अलंकार होता है। अर्थवान् होते हुए भिन्न-भिन्न अर्थ देने वाले वर्णों की उसी क्रम से पुनरावृत्ति यमक अलंकार कहलाती है।

93. 'क्वचित्कूपाभ्यासे' इत्यत्र अभ्यासपदस्य कः अर्थः?

Correct Answer: (c) सामीप्यम्
Solution:

'क्वचित्कूपाभ्यासे' इत्यत्र अभ्यासपदस्य 'सामीप्यम् अर्थः अस्ति। अर्थात् इस वाक्य में अभ्यासपद का 'सामीप्य अर्थ है। क्वचित्कूपाभ्यासे का अर्थ किसी कुएँ के पास में।
द्वित्वम् का अर्थ है- दो होना
नैरन्तर्यम् का अर्थ निरन्तरता, अविच्छिन्नता, निरन्तरत्व है।
प्रवृत्तिः का अर्थ - मन का झुकाव, आदत, स्वभाव है।
अतः विकल्प (c) सही है।

94. कुमारस्य वयः किम् आसीत्?

Correct Answer: (b) अष्टवर्षीयः
Solution:

कुमारस्य वयः 'अष्टवर्षीयः' आसीत्।
अर्थात् कुमार की आयु सोलह वर्ष थी। यह दशकुमारचरितम् के विश्रुत चरित से कथित है। आचार्य दण्डी परिष्कृत गद्य शैली के जन्मदाता हैं। वैदर्भी शैली के कवि हैं।
दण्डी की कृतियाँ-
1. दशकुमारचरितम् 2. काव्यादर्श 3. अवन्तिसुन्दरी कथा 4. छन्दोविचिति 5. कलापरिच्छेद 6. द्विसन्धानकाव्य

95. 'कोऽपि निष्कलो ममैकशरणभूतः पतितः' इत्यत्र 'निष्कलः' शब्दः कस्य अर्थस्य परामर्शकः ?

Correct Answer: (c) वृद्धस्य
Solution:

'कोऽपि निष्कलो ममैकशरणभूतः पतितः' इत्यत्र 'निष्कल' शब्दस्य वृद्धार्थस्य परामर्शकः।
अर्थात् यहाँ पर निष्कल शब्द वृद्ध अर्थ का परामर्शक है। यह गद्य भाग विश्रुत चरित दशकुमार के अष्टम् उच्छ्वास से है यह कथन कुमार विश्रुत का है, कि इस कुएँ में गिर गया है वह मेरे लिए एक मात्र आश्रय था।

कलारहितस्य का अर्थ है- कला से हीन, विद्यारहितस्य का अर्थविद्या से हीन तथा कलहरहितस्य का अर्थ-कलह से रहित ।

96. अधोलिखितं परिच्छेदं पठित्वा प्रश्नानाम् (96-100) उत्तराणि देयानि-

'गौः शुक्लः चलो डित्थ इत्यादौ चतुष्टयी शब्दानां प्रवृत्तिः' इति महाभाष्यकारः । परमाण्वादीनां तु गणपाठमध्यपाठात् पारिभाषिकं गुणत्वम् । गुणक्रियायदृच्छानां वस्तुतः एकरूपाणामप्याश्रयभेदाद् भेद एव लक्ष्यते ।

यथैकस्य मुखस्य खड्गमुकुरतैलाद्यालम्बनभेदात् हिमपयःशङ्खाद्याश्रयेषु परमार्थतो भिन्नेषु शुक्लादिषु यद्रशेन शुक्लः शुक्ल इत्यादिरभिन्नाभिधानप्रत्ययोत्पत्तिस्तच्छुक्लत्वादि सामान्यम् ।

गुडतण्डुलादिपाकादिष्वेवमेव पाकादित्वम्। बालवृद्धशुकाद्युदीरितेषु डित्थादिशब्देषु च प्रतिक्षणं भिद्यमानेषु डित्याद्यर्थेषु वा डित्थादित्वमस्तीति सर्वेषां शब्दानां जातिरेव प्रवृत्तिनिमित्तमित्यन्ये । तद्वानपोहो वा शब्दार्थः कैश्चिदुक्त इति ग्रन्थगौरवभयात् प्रकृतानुपयोगाच्च न दर्शितम्।

'हिमपयःशङ्खाद्याश्रयेषु परमार्थतो भिन्नेषु शुक्लादिषु यद्वशेन शुक्लः शुक्लः इत्यादिरभिन्नाभिधान प्रत्ययोत्पत्तिस्तच्छुक्लत्वादि सामान्यम्।' इत्यस्मिन् गद्यांश केषां सिद्धान्तः अस्ति? 

Correct Answer: (c) मीमांसकानाम्
Solution:

'हिमपयःशङ्खाद्याश्रयेषु परमार्थतो भिन्नेषु शुक्लादिषु यदृशेन शुक्लः शुक्लः इत्यादिरभिन्नाभिधान प्रत्ययोत्पत्तिस्तच्छुक्लत्वादि सामान्यम् ।' इत्यस्मिन् गद्यांशे मीमांसकानां सिद्धान्तः अस्ति। अर्थात् वर्ष, दूध, शख आदि में रहने वाला शुक्ल वास्तव में भिन्न होता है

परन्तु शुक्ल आदि गुणों में जिनमें जिनके कारण शुक्लः शुक्लः इस प्रकार का एकाकार कथन और प्रतीति की उत्पत्ति होती है वह शुक्लत्व आदि सामान्य जाति है। यह सिद्धान्त मीमांसको का है। 'संकेतितश्चतुर्भेदो जात्यादिर्जातिरेव वा' अर्थात् वैयाकरण संकेतक जाति आदि में मानते हैं परन्तु मीमांसक केवल जाति में ही मानते हैं।

97. उपर्युक्तगद्यांशे कः सिद्धान्तः वर्तते?

Correct Answer: (b) शक्तिग्रहसिद्धान्तः
Solution:

उपर्युक्तगद्यांशे शक्तिग्रहसिद्धान्तः वर्तते।
अर्थात् उपर्युक्तगद्यांश में शक्तिग्रहसिद्धान्त वर्णित है। संकेतितश्चतुर्भेदो जात्यादिर्जातिरेव वा। अर्थात् संकेतित अर्थ जाति आदि (अर्थात् जाति, गुण, क्रिया तथा यदृच्छा) भेदों से चार प्रकार का होता है।

अथवा मीमांसकों के मत में केवल जाति ही संकेतित अर्थ होता है। स्फोट सिद्धान्त वैयाकरणों का है, रस सिद्धान्त भरतमुनि का है। व्यञ्जना सिद्धान्त ध्वनिवादियों का है।
अतः विकल्प (b) सही है।

98. 'सर्वेषां शब्दानां जातिरेव प्रवृत्तिनिमित्तमित्यन्ये इत्यस्मिन् वाक्यांशे 'अन्ये' इति शब्दः कस्य परामर्शकः अस्ति?

Correct Answer: (c) मीमांसकानाम्
Solution:

'सर्वेषां शब्दानां जातिरेव प्रवृत्तिनिमित्तमित्यन्ये' इत्यस्मिन वाक्यांशे 'अन्ये' इतिशब्दः मीमांसकस्य परामर्शकः अस्ति। अर्थात् इस वाक्य में 'अन्ये' यह शब्द मीमांसकों का बोधक है।

इनके मत में जात्यादि चारों में प्रवृत्ति निमित्त न मानकर केवल जाति को ही प्रवृत्ति निमित्त मानना चाहिए और उसी में संकेतग्रह मानना चाहिए। परन्तु वैयाकरणों के मत में जाति आदि चारों में संकेतग्रह मानना चाहिए। अतः विकल्प (c) सही है।

99. 'तद्वान्' इति पदे अभिव्यक्तसिद्धान्तस्य विषये असत्यं कथनमस्ति -

Correct Answer: (d) अयं सिद्धान्तः बौद्धानाम् अस्ति।
Solution:

'तद्वान्' इति पदे अभिव्यक्तसिद्धान्तस्य विषये असत्यं कथनं 'अयं सिद्धान्तः बौद्धानाम्' अस्ति। अर्थात् 'तद्वान' इस पद में अभिव्यक्त सिद्धान्त के विषय में 'यह सिद्धान्त बौद्धों का है' असत्य कथन है। तद्वानपोहो वा शब्दार्थः कैश्चियुक्तः इति तद्वान् का अर्थ जातिमान् है।

अर्थात् जातिविशिष्ट व्यक्ति में संकेतग्रह मानना चाहिए, यह नैयायिकों का मत है। 'तत् पद सामान्य अर्थ का परामर्शक है तथा, वान् इस पद का अर्थ व्यक्ति अर्थ का परामर्शक है। 'अपोह' बौद्धों का सिद्धान्त है। अपोह का अर्थ 'अतद्-व्यावृति' या 'तद्भिन्नभिन्नत्व' होता है।

100. बौद्धानां सिद्धान्त कः ?

Correct Answer: (c) अपोहवादः
Solution:

बौद्धानां सिद्धान्तः 'अपोहवादः' अस्ति । अर्थात् बौद्धों का सिद्धान्त अपोहवाद है। उनके मत में शब्द का अर्थ अपोह होता है। 'अपोह' का अर्थ 'अतद्-व्यावृत्ति' या 'तद्भिन्नभिन्नत्व' होता है।

बौद्ध संकेतग्रह अपोह में मानते हैं। मीमांसक संकेतकग्रह जाति में, नव्य नैयायिक व्यक्ति में तथा न्यायवैशेषिक जाति विशिष्ट व्यक्ति में मानते हैं।

अतः विकल्प (c) सही है।