Solution:आङ्गिक वाचिक आहार्य-सात्विक रूपाः अनुभावस्य, अभिनयस्य भेदाः सन्ति ।
जब नट अपनी वाणी, शारीरिक चेष्टा, भावभङ्गिमा, मुखमुद्रा, वेशभूषा के द्वारा दर्शकों को, शब्दों के भावों का ज्ञान और रस की अनुभूति कराते हैं तब उस सम्पूर्ण समन्वित व्यापार को अभिनय कहते हैं।
भरतमुनि ने चार प्रकार का अभिनय माना है-
1. आङ्गिक- शरीर, मुख और चेष्टाओं से कोई भाव या अर्थ प्रकट करना। सिर, हाथ, कटि, वक्ष, पार्श्व और चारण द्वारा किया जाने वाला अभिनय या आङ्गिक अभिनय कहलाता है।
2. सात्विक- सात्विक अभिनय तो उन भावों का वास्तविक और हार्दिक अभिनय है जिन्हें रस सिद्धान्त वाले सात्विक भाव कहते हैं और जिसके अन्दर स्वेद, स्तंभ, कंप, अश्रु, रोमांच, स्वरभङ्ग और प्रलय की गणना होती है।
3. वाचिक- अभिनेता रंगमंच पर जो कुछ कहता है वह सबका सब वाचिक अभिनय कहलाता है।
4. आहार्य- आहार्य अभिनय वास्तव में अभिनय का अंग न होकर नेपथ्य कर्म का अंग है और उसका संबंध अभिनेता से उतना नहीं है जितना नेपथ्य सज्जा करने वालों से।