यूजीसी NTA नेट जेआरएफ परीक्षा, दिसम्बर 2021 जून 2022 (संस्कृत)

Total Questions: 100

11. 'वितर्कितः पुरा बुद्ध्या काचिदर्थे निवेशितः' इत्यत्र पुरा बुद्ध्या वितर्कितः कः ?

Correct Answer: (b) स्फोटरूपः बौद्धशब्दः
Solution:

'वितर्कितः पुरा बुद्ध्या काचिदर्थे निवेशितः' इत्यत्र पुरा बुद्ध्या वितर्कितः 'स्फोटरूपः बौद्धशब्दः' वितर्कितः पुरा बुद्ध्या काचिदर्धे निवेशितः।

कारणेभ्यो विवृत्तेन ध्वनिना सोऽनुगृह्यते।। (वाक्यपदीयम्) उच्चारण के पहले ही बुद्धि (अन्तःकरण की वृत्ति) से शब्द और अर्थ में अभेदाध्यास कर किसी एक अर्थ में विचारा गया और उसी अर्थ में तादात्म्य प्राप्त शब्द (स्फोट) फिर बोध कराने की इच्छा से स्थान और प्रयत्नों के द्वारा भाषित होकर स्वयं अविकारी भी कत्व, गत्वरूप विकृतधर्मों में भाषता है और घटध्वनि से अभिव्यक्त स्फोट पटध्वनि से अभिव्यक्तस्फोट से भिन्न है अतः घट ध्वनि पट का बोध नहीं करवाता।
'वाक्यपदीयम्' में कुल तीन काण्ड
1. ब्रह्मकाण्ड - 156
2. वाक्यकाण्ड - 486
3. पदकाण्ड 1218 तथा 1860 कारिकाएँ

12. 'एको रसोऽङ्गीकर्त्तव्यो वीरः शृङ्गार एव वा' इति कस्याचार्यस्योक्तिः ?

Correct Answer: (b) धनञ्जयस्य
Solution:

'एको रसोऽङ्गीकर्तव्यो वीरः शृङ्गार एव वा' इति धनञ्जयाचार्यस्योक्ति अर्थात् आचार्य धनञ्जय के अनुसार काव्य में एक ही रस शृङ्गार अथवा वीर रस होना चाहिए।

13. अधोलिखितं कथनद्वयम् आश्रित्य समुचितम् उत्तरं चिनुत-

कथनम् (I) : आन्वीक्षकीत्रयीवार्तानां योगक्षेमसाधनो दण्डः
कथनम् (II) : दुष्प्रणीतः क्रामक्रोधाभ्यामज्ञानाद् वानप्रस्थपरिव्राजकान् अपि कोपयति ।

Correct Answer: (a) (I) तथा (II) उभे अपि सत्ये
Solution:

उपरिलिखितं कथनद्वयम् आश्रित्य समुचितम् उत्तर स्तः-
कथनम् (i) - आन्वीक्षकीत्रयीवार्तानां योगक्षेम- साधनो दण्डः।
कथनम् (ii) - दुष्प्रणीतः कामक्रोधाभ्याम्-ज्ञानाद् वानप्रस्थपरिव्राजकान् अपि कोपयति ।
अत्र उभे अपि विकल्पं सत्ये।
अर्थशास्त्र के रचनाकार कौटिल्य के अनुसार चार प्रकार की विधाएँ हैं।
1. आन्वीक्षकी प्रदीपः सर्वविद्यानामुपायः सर्वकर्मणाम्। आश्रयः सर्वधर्माणां शश्वदान्वीक्षकीमता।।
2. त्रयी - सामर्युजुदास्त्रयस्त्रयी।
3. वार्ता - कृषि पशुपाल्ये वाणिज्या च वार्ता ।
4. दण्डनीति - आन्वीक्षकी त्रयीवार्तानां योगक्षेम साधनो दण्डः ।
तस्यनीति दण्डनीतिः ।

14. व्यवहारस्य पादान् क्रमेण नियोजयत-

(A) उत्तरपादः (B) क्रियापादः (C) सिद्धिपादः (D) भाषापादः
समुचितं विकल्पं चिनुतः 

Correct Answer: (a) (D), (A), (B), (C)
Solution:

व्यवहारस्य पादान् क्रमेण नियोजयत- भाषापादः उत्तरपादः - क्रियापादः सिद्धिपाठः ।
व्यवहार के पदों को क्रम से 'भाषापाद उत्तर पद क्रियापाद → सिद्धिपाद' होते हैं। याज्ञवल्क्य ने बीस व्यवहार पदों की गणना की है। कौटिल्य ने सोलह, नारद ने अठ्ठारह और बृहस्पति ने उनीस स्वीकार किये है। उक्त अट्ठारह अथवा बीस ऋणादानादि व्यवहारपदों या विवादों में चतुष्पाद अर्थात् चतुरंश की कल्पना से व्यवहार वर्णित होता है। ये चार पाद हैं भाषापाद, उत्तरपाद, क्रियापाद और सिद्धिपाद।
(1) भाषापाद- अर्थात् अर्थी ने जैसा आवेदन किया है प्रत्यर्थी ने वैसा सामने लिखे। लेख पर वर्ष, मास, पक्ष, दिन, नाम जाति आदि लिखे- यह भाषापाद है।

(2) उत्तरपाद- वादी के वाद को सुनने के बाद प्रतिवादी द्वारा सुने गये विषय-अभियोग का उत्तर पहले के आवेदक के सामने लिखना चाहिए यह उत्तर पाद है।

(3) क्रियापाद- प्रतिवादी का उत्तर सुनने के बाद वादी को तुरन्त प्रतिज्ञात अर्थ या लगाए गये अभियोग का साधन प्रमाण लिखना चाहिए। यह क्रियापाद है।

(4) सिद्धिपाद- उस साधन या प्रमाण की सिद्धि होने पर वादी सिद्धि या विजय प्राप्त करता है और इसके विपरीत होता है। यह सिद्धिपाद है। यह चतुष्पाद व्यवहार कहा जाता है।

15. अर्थशास्त्रे तन्त्रयुक्तीनां विवेचनं कस्मिन् अधिकरणे प्राप्यते ?

Correct Answer: (d) पञ्चदशे
Solution:

अर्थशास्त्रे तन्त्रयुक्तीनां विवेचनं पञ्चदशे अधिकरणे प्राप्यते अर्थात् अर्थशास्त्र में तन्त्रयुक्तियों का विवेचन पन्द्रहवें अधिकरण में प्राप्त होता है। अर्थशास्त्र, कौटिल्य या चाणक्य (चौथी शदी ई.पू.) द्वारा रचित संस्कृत का एक ग्रन्थ है।

इसमें राजव्यवस्था, कृषि, न्याय एवं राजनीति आदि के विभिन्न पहलुओं पर विचार किया गया है। इसकी शैली उपदेशात्मक और सलाहात्मक है।

1. विनयाधिकरण 2. अध्यक्ष प्रचार 3. धर्मस्थीयाधिकरण 4. कंटक शोधन 5. वृत्ताधिकरण 6. योगजन्याधिकरण 7. षाड्गुण्य 8. व्यसनाधिकरण 9. अभियास्यत्कर्माधिकरण 10. संग्रामाधिकरण 11. संघवृत्ताधिकरण 12. आबलीयसाधिकरण 13. दुर्गलम्भोपायाधिकरण 14. औपनिषदिकाधिकरण 15. तंत्रयुक्ताधिकरण
अर्थशास्त्र में कुल 15 अधिकरण, 150 अध्याय, 180 उपविभाग तथा 6,000 श्लोक हैं।

16. यथोचित मेलनं कुरुत-

सूची-Iसूची-II
(A) नागेशः(I) विवरणपञ्जिका
(B) कैय्यटः(II) प्रदीपः
(C) जिनेन्द्रबुद्धिः(III) लघुशब्देन्दुशेखरः
(D) पतञ्जलिः(IV) इष्टिः

समुचितं विकल्पं चिनुत-

ABCD
(a)IIIIVIII
(b)IIIIIIIV
(c)IIIIIIIV
(d)IVIIIIII
Correct Answer: (c)
Solution:

यथोचित मेलनं अस्ति-

सूची-Iसूची-II
(A) नागेशःलघुशब्देन्दुशेखरः
(B) कैय्यटःप्रदीपः
(C) जिनेन्द्रबुद्धिःविवरणपञ्जिका
(D) पतञ्जलिः इष्टिः

17. अधोलिखितेषु ध्वनिपरिवर्तनस्य कारणं नास्ति-

Correct Answer: (c) एकान्तवार्ता
Solution:

उपरिलिखितेषु ध्वनिपरिवर्तनस्य कारणं एकान्तवार्ता नास्ति। अर्थात् उपर्युक्त में से ध्वनिपरिवर्तन का कारण 'एकान्तवार्ता' नहीं है जबकि भावावेशः, शीघ्रभाषणम्, कृत्रिमता ध्वनिपरिवर्तन का कारण है।

18. केन सह कस्य सम्बन्धः-

सूची-I (काव्यशास्त्रकृतयः)सूची-II (टीकाकाराः)
(A) अलङ्कारसर्वस्वम्(I) अनन्तदासः
(B) काव्यादर्शः(II) केशवभट्टारकः
(C) चित्रमीमांसा(III) जयरथः
(D) साहित्यदर्पणम्(IV) धरानन्दः

समुचितं विकल्पं चिनुत

ABCD
(a)IIIIIIIV
(b)IIIIIIVI
(c)IIIIIIVI
(d)IIIIIIIV
Correct Answer: (c)
Solution:

समुचित विकल्पं अस्ति

सूची-I (काव्यशास्त्रकृतयः)सूची-II (टीकाकाराः)
(A) अलङ्कारसर्वस्वम्जयरथः
(B) काव्यादर्शःकेशवभट्टारकः
(C) चित्रमीमांसाधरानन्दः
(D) साहित्यदर्पणम्अनन्तदासः
रचनारचनाकार
अलङ्कारसर्वस्वम्रूय्यक
काव्यादर्शदण्डी
चित्रमीमांसाअप्पयदीक्षित
साहित्यदर्पणआचार्य विश्वनाथ

19. 'सामदण्डौ प्रशंसन्ति राष्ट्राभिवृद्धये।' इति श्लोकांशः कस्माद् उद्धृतः ?

Correct Answer: (a) मनुस्मृतेः
Solution:

'सामदण्डौ प्रशंसन्ति नित्यं राष्ट्राभिवृद्धये।' इति श्लोकांशः मनुस्मृते उद्धृतः। अर्थात् बुद्धिमान लोग साम और दण्ड की प्रशंसा राष्ट्र के उत्थान के लिए नित्य करते थे।
श्लोकांश मनुस्मृति में उद्धृत है-
सामादीनां उपायानां चतुर्णां अपि पण्डिताः
सामदण्डौ प्रशंसन्ति नित्यं राष्ट्राभिवृद्धये ।।
बुद्धिमान लोग साम, दान, दण्ड और भेद इन चार उपायों में से साम और दण्ड की प्रशंसा राष्ट्र के उत्थान के लिए नित्य करते थे।

20. आङ्गिक वाचिक - आहार्य सात्त्विक रूपाः भेदाः सन्ति -

(A) अनुभावस्य (B) अभिनयस्य (C) विभावस्य (D) सञ्चारिभावस्य
समुचितं विकल्पं चिनुत-

Correct Answer: (b) (A) एवम् (B)
Solution:

आङ्गिक वाचिक आहार्य-सात्विक रूपाः अनुभावस्य, अभिनयस्य भेदाः सन्ति ।
जब नट अपनी वाणी, शारीरिक चेष्टा, भावभङ्गिमा, मुखमुद्रा, वेशभूषा के द्वारा दर्शकों को, शब्दों के भावों का ज्ञान और रस की अनुभूति कराते हैं तब उस सम्पूर्ण समन्वित व्यापार को अभिनय कहते हैं।

भरतमुनि ने चार प्रकार का अभिनय माना है-
1. आङ्गिक- शरीर, मुख और चेष्टाओं से कोई भाव या अर्थ प्रकट करना। सिर, हाथ, कटि, वक्ष, पार्श्व और चारण द्वारा किया जाने वाला अभिनय या आङ्गिक अभिनय कहलाता है।

2. सात्विक- सात्विक अभिनय तो उन भावों का वास्तविक और हार्दिक अभिनय है जिन्हें रस सिद्धान्त वाले सात्विक भाव कहते हैं और जिसके अन्दर स्वेद, स्तंभ, कंप, अश्रु, रोमांच, स्वरभङ्ग और प्रलय की गणना होती है।

3. वाचिक- अभिनेता रंगमंच पर जो कुछ कहता है वह सबका सब वाचिक अभिनय कहलाता है।

4. आहार्य- आहार्य अभिनय वास्तव में अभिनय का अंग न होकर नेपथ्य कर्म का अंग है और उसका संबंध अभिनेता से उतना नहीं है जितना नेपथ्य सज्जा करने वालों से।