यूजीसी NTA नेट जेआरएफ परीक्षा, दिसम्बर 2021 जून 2022 (संस्कृत)

Total Questions: 100

31. असमवायिकारणत्वम् एव अस्ति-

Correct Answer: (c) क्रियागुणयोः
Solution:

असमवायिकारणत्वम् एव क्रियागुणयोः अस्ति। असमवायिकरण गुण या कर्म (क्रिया) हुआ करते हैं, जैसे पट का असमवायी कारण तन्तु संयोग तथा पटरूप का असमवायी कारण तन्तु रूप दोनों ही हैं। क्रिया भी असमवायिकारण होती है,

जैसे- जब किसी गाड़ी के पहियों (अवयव) में गमन क्रिया होती है तो उससे गाड़ी (अवयवी) में भी गमन क्रिया हो जाती है। यहाँ गाड़ी की क्रिया में पहियों की क्रिया उसी प्रकार असमवायी कारण है जिस प्रकार पट रूप में तन्तु रूप असमवायी कारण है।

32. समुचितं मेलनं कुरुत-

सूची-I (ग्रन्थ)सूची-II (रचयिता)
(A) उणादिकोषः(I) भट्टोजिदीक्षितः
(B) प्रौढमनोरमा(II) हेमचन्द्रः
(C) महाभाष्यदीपिका(III) पाणिनिः
(D) हेमशब्दानुशासनम्(IV) भर्तृहरिः

समुचितं विकल्पं चिनुत-

विकल्पABCD
(a)IIIIIVII
(b)IIIIIIIV
(c)IVIIIIII
(d)IIIVIIII
Correct Answer: (a)
Solution:

समुचितं मेलनं कुरुत-

सूची-I (ग्रन्थ)सूची-II (रचयिता)
(A) उणादिकोषःपाणिनिः
(B) प्रौढमनोरमाभट्टोजिदीक्षितः
(C) महाभाष्यदीपिकाभर्तृहरिः
(D) हेमशब्दानुशासनम्हेमचन्द्रः

उणादिकोषः- उणादिकोष पाणिनि के पाँच उपदेशों का एक भाग है। यह व्याकरणिक ग्रन्थ है। आचार्य पाणिनि के 5 उपदेश इस प्रकार है-
1. अष्टाध्यायी, 2. धातुपाठ, 3. गणपाठ, 4. उणादिकोष, 5. लिङ्गानुशासनम्

प्रौढ़मनोरमा - भट्टोजि दीक्षित 17वीं शताब्दी में उत्पन्न संस्कृत वैयाकरण थे जिन्होंने सिद्धान्त कौमुदी की रचना की। इस ग्रन्थ पर उन्होंने स्वयं प्रौढ़मनोरमा टीका लिखी। पाणिनीय सूत्रों पर अष्टाध्यायी क्रम से एक अपूर्ण व्याख्या शब्दकौस्तुभ तथा वैयाकरणभूषण कारिका भी इनके ग्रन्थ हैं। इनकी सिद्धान्त कौमुदी लोकप्रिय है।

महाभाष्यदीपिका- यह आचार्य भर्तृहरि की महाभाष्य पर विस्तृत तथा प्रौढ़ व्याख्या है। अनेक उद्धरणों से अनुमान होता है कि उन्होंने पूरे महाभाष्य पर दीपिका नामक टीका लिखी।

हेमशब्दानुशासनम्- आचार्य हेमचन्द्र ने समस्त व्याकरण वाङ्मय का अनुशीलन कर शब्दानुशासन एवं अन्य व्याकरण ग्रन्थों की रचना की।

33. काव्यालङ्कारसूत्रस्य 'कविप्रिया' वृत्तेः रचयिता कः ?

Correct Answer: (d) वामनः
Solution:

काव्यालङ्कारसूत्रस्य 'कविप्रिया' वृत्तेः रचयिता वामनः । काव्यालङ्कार सूत्र के 'कविप्रिया' नामक वृत्ति के रचयिता आचार्य वामन हैं। काव्यालङ्कारसूत्र आचार्य वामन द्वारा रचित एकमात्र ग्रन्थ है।

यह सूत्र शैली में लिखा गया है। इसमें 5 अधिकरण हैं। प्रत्येक अधिकरण अध्यायों में विभक्त हैं। इस ग्रन्थ में कुल 12 अध्याय हैं। आचार्य वामन ने इस पर कविप्रिया नामक वृत्ति लिखी।

प्रणम्य परमं ज्योतिर्वामनेन कविप्रिया। 
काव्यालङ्कारसूत्राणां स्वेषां वृत्तिर्विधीयते ॥ 

34. अधोलिखितं कथनद्वयमाश्रित्य समुचितमुत्तरं चिनुत-

कथनम् (I) : रुपकेषु नाटके पूर्वमुच्यतेः यतः
कथनम् (II) : अन्येषां प्रकृतित्वात्, भूयः रसपरिग्रहात् सम्पूर्णलक्षणत्त्वात्

Correct Answer: (a) (I) तथा (II) उभे अपि सत्ये
Solution:

उपरिलिखितं कथनद्वयमाश्रित्य समुचितमुत्तरं (I) तथा (II) उभे अपि सत्ये अस्ति ।
अर्थात् उपर्युक्त दो कथनों पर आश्रित समुचित उत्तर (1) तथा (II) दोनों सत्य हैं। 'रूपक तत्समारोपात्' अर्थात् रूपकों में नाटक सबसे प्रथम कहा गया है।
नाटकं सप्रकरणं भाणः प्रहसनं डिमः।
व्यायोगसमवकारौ वीथ्यङ्केहामृगा इति ।।
दशरूपक नाटक अन्य रूपकों का कारण होने से और रस ग्रहण करने से सम्पूर्ण लक्षण घटित होने से नाटक रूपकों में प्रथम स्थान पर होता है। अतः विकल्प (a) सही है।

35. 'सिति च' सूत्रेण का सञ्जा विधीयते?

Correct Answer: (d) पदसज्ञा
Solution:

'सिति च' सूत्रेण पदसंज्ञा विधीयते । अर्थात् 'सिति च' सूत्र से पदसंज्ञा का विधान होता है। यचिभम् सूत्र भसंज्ञक, सुडनपुंसकस्य सूत्र सर्वनाम स्थान संज्ञक सूत्र है। अतः विकल्प (d) सही है।

36. यथोचित मेलनं कुरुत-

सूची-I (आचार्याः)सूची-II (ग्रन्थाः)
(A) कालिदासः(I) छन्दसूत्रम्
(B) केदारभट्टः(II) वृत्तरत्नाकरः
(C) क्षेमेन्द्रः(III) श्रुतबोधः
(D) पिङ्गलः(IV) सुवृत्ततिलकम्

समुचितं विकल्पं चिनुत-

विकल्पABCD
(a)IIIIIIIV
(b)IIIIIIVI
(c)IIIIIIVI
(d)IVIIIIII
Correct Answer: (c)
Solution:

यथोचितं मेलनं अस्ति । सूची-I (आचार्याः) अर्थात् समुचित मेल है

सूची-I (आचार्याः)सूची-II (ग्रन्थाः)
(A) कालिदासःश्रुतबोधः
(B) केदारभट्टःवृत्तरत्नाकरः
(C) क्षेमेन्द्रःसुवृत्ततिलकम्
(D) पिङ्गलःछन्दसूत्रम्

अतः विकल्प (c) सही है।

37. 'स नः पितेव सूनवे......' इति मन्त्रांशः कस्मिन् सूक्ते वर्तते?

Correct Answer: (a) अग्निसूक्ते
Solution:

'स नः पितेव सुनवे.......'इति मन्त्रांशः अग्निसूक्ते वर्तते । अर्थात् यह मन्त्रांश अग्निसूक्त में है।
स नः पितेव सूनवेऽग्ने सूपायनो भव । 
सचस्वा नः स्वस्तये ।।१।।
अर्थ अग्नि ! तुम हमारे लिए सुगम बनो, जैसे-पिता अपने पुत्र के लिए (सुगम होता है) तथा हमारे कल्याण के लिए सदा हमारे साथ रहो । अग्नि सूक्त में गायत्री छन्द है।

यह प्रथम मण्डल के प्रथम सूक्त का 9वीं मन्त्र है। इस सूक्त के ऋषि 'मधुच्छन्दा' तथा देवता अग्नि है। गायत्री छन्द में तीन पाद तथा प्रत्येक पाद में 8 वर्ण होते हैं अतः कुल 24 वर्ण होते हैं।

38. वर्गाणां पञ्चमवर्णैः युक्तो हकारो भवति-

Correct Answer: (b) ओठ्यः
Solution:

वर्गाणां पञ्चमवर्णैः हकारो 'ओष्ठ्यः' भवति । अर्थात् वर्गों के पञ्चम वर्णों से युक्त ह वर्ण ओष्ठ्य होता है।
हकारं पञ्चमैर्युक्तमन्तःस्थाभिश्च संयुतम्।  
उरस्य तं विजानीयात्कण्ठ्यमाहुरसंयुतम् ।।16।।
आठ उच्चारण वर्णों में उरस् से उच्चार्यमाण ओष्ठ्य है। वह हकार जो कवर्गादि के पञ्चम व्यञ्जन से एवं अन्तःस्थ वर्ग (य, र, ल, व) से संयुक्त हो। इसमें भिन्न हकार कण्ठस्थानक (कण्ठ्य) है।

39. 'ब्रह्मावर्त' किं प्रचक्षते?

Correct Answer: (a) सरस्वतीदृषद्वत्योः यदन्तरम्
Solution:

'ब्रह्मावर्त' सरस्वतीदृषद्वत्योः यदन्तरम् प्रचक्षते ।
अर्थात् 'ब्रह्मावत' सरस्वती और दृषद्वती देव नदियों के बीच का भाग कहलाता है।
सरस्वतीदृषद्वत्योर्देवनद्योर्यदन्तरम्। त देवनिमितं देशं ब्रह्मावर्त प्रचक्षते ।।17।।
अर्थ- सरस्वती और दृषद्वती देव नदियों के मध्य का जो देवताओं का रचा हुआ देश है उसको ब्रह्मावर्त कहते हैं।

40. शब्दब्रह्मणः शक्तिद्वयं किम्?

(A) अर्थशक्तिः (B) अभ्यनुज्ञा  (C) प्रतिबन्धः (D) शब्दशक्तिः
समुचितं विकल्पं चिनुत-

Correct Answer: (c) (B) एवम् (C)
Solution:

शब्दब्रह्मणः अभ्यनुज्ञा, प्रतिबन्धः अस्ति। अर्थात् शब्दब्रह्म की अभ्यनुज्ञा और प्रतिबन्ध दो शक्तियाँ हैं।