यूजीसी NTA नेट जेआरएफ परीक्षा, दिसम्बर 2021 जून 2022 (संस्कृत)

Total Questions: 100

41. अधोलिखितेषु मीमांसादर्शनस्य आचार्यो न स्तः-

(A) मुरारिमिश्रः (B) शबरस्वामी (C) गदाधरः (D) जगदीशः
समुचितं विकल्पं चिनुत- 

Correct Answer: (b) (C) एवम् (D)
Solution:

उपरिलिखितेषु मीमांसादर्शनस्य आचार्यो शबरस्वामी, गदाधरः न स्तः अर्थात् उपरिलिखित मीमांसादर्शन के आचार्य शबरस्वामी और गदाधर नहीं है। जबकि अन्य दोनों विकल्प मुरारिमिश्र और जगदीश मीमांसादर्शन के आचार्य हैं।

मीमांसा या पूर्वमीमांसा दर्शन हिन्दुओं के छः दर्शनों में से एक है जिसमें वेद के यज्ञपरक वचनों की व्याख्या की गयी है। इसके प्रणेता आचार्य जैमिनि हैं।

मीमांसा का तत्व सिद्धान्त विलक्षण है। इसकी गणना अनीश्वरवादी दर्शनों में से एक है। मीमांसा दर्शन में छः प्रमाण स्वीकार किये जाते हैं- प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, अर्थापत्ति और अनुपलब्धि ।

जैमिनि-सूत्रों पर शबर स्वामी का विशद् भाष्य है जिसे शबरभाष्य कहते हैं। प्रभाकर और कुमारिल के समान ही मुरारि मिश्र ने मीमांसा के क्षेत्र में एक नये मत का प्रतिपादन किया जिसे मुरारिमत कहते हैं। इनके ग्रन्थ क्रमशः इस प्रकार हैं-
(i) त्रिपादी (ii) नीतिनयन (iii)एकादशाध्यायाधिकरण

42. शब्दालङ्कारौ स्तः-

(A) यमकम् (B) रूपकम् (C) उत्प्रेक्षा (D) अनुप्रासः
समुचितमुत्तरं चिनुत- 

Correct Answer: (a) (A) एवम् (D)
Solution:

शब्दालङ्कारौ स्तः - यमकम्, अनुप्रासः । काव्य में शब्दगत चमत्कार या शब्द से जो प्रभाव किसी काव्य पर डाला जाता है उसे शब्दालङ्कार कहते हैं। शब्दालङ्कार काव्य में शब्दों पर आश्रित होता है।

शब्दालङ्कार के भेद- शब्दालङ्कार के मुख्य रूप से 7 भेद होते हैं जो इस प्रकार हैं
1. अनुप्रास अलङ्कार 2. यमक अलङ्कार 3. श्लेष अलङ्कार 4. वक्रोक्ति अलङ्कार 5. पुनरूक्तिवदाभास अलङ्कार 6. वीप्सा अलङ्कार
जबकि रूपक एवं उत्प्रेक्षा अलङ्कार की गणना अर्थालङ्कार में की जाती है।

43. विनियोगविधेः प्रमाणानि क्रमशः लिखत-

Correct Answer: (d) (C), (A), (B), (D), (E)
Solution:

विनियोगविधेः प्रमाणानि क्रमशः लिखत- श्रुतिः लिङ्गम, वाक्यम. प्रकरणम्, स्थानम्।
अङ्गप्रधानसम्बन्धबोधको विधिर्विनियोगविधिः । अर्थात् अङ्गों के साथ सम्बन्धबोधक विधि को विनियोग विधि कहते हैं। उदाहरणार्थ दध्ना जुहोति अर्थात् दधि के द्वारा होम का सम्पादन होता है।

44. तत्पुरुषसमासस्य भेदद्वयं किम्?

(A) प्रादिः (B) उपपदम् (C) तद्‌गुणसंविज्ञानः (D) इतरेतरयोगः
समुचितमुत्तरं चिनुत- 

Correct Answer: (c) (A) एवम् (B)
Solution:

तत्पुरुषसमासस्य भेदद्वयं- प्रादिः उपपदम्। जिस समास में उत्तरपद प्रधान होता है उसे तत्पुरुष समास कहते हैं। जब समास में पूर्व पद उपसर्ग हो वहाँ प्रादि तत्पुरुष समास होता है। जैसे- पर्यध्ययनः ।

और जब तत्पुरुष समास में उत्तरपद कोई क्रिया होती है तब उपपदतत्पुरुष समास होता है। जैसे कुम्भकारः, धनदः, मर्मज्ञः, धर्मज्ञः ।

45. यथोचित मेलनं कुरुत-

सूची - Iसूची - II
(A) प्रत्यक्षप्रमाणम्(I) अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिः
(B) अनुमानम्(II) प्रख्याप्रवृत्तिस्थितिशीलम्
(C) चित्तम्(III) विशेषावधारणप्रधाना वृत्तिः
(D) निद्रा(IV) सामान्यावधारणप्रधाना वृत्तिः

समुचितं विकल्पं चिनुत-

विकल्पABCD
(a)IVIIIIII
(b)IIIIIIIV
(c) IIIIVIII
(d)IIIIVIII
Correct Answer: (c)
Solution:

यथोचितं मेलनं अस्ति-

सूची - Iसूची - II
(A) प्रत्यक्षप्रमाणम्विशेषावधारणप्रधानावृत्तिः
(B) अनुमानम्सामान्यावधारणप्रधाना वृत्तिः
(C) चित्तम्प्रख्याप्रवृत्तिस्थितिशीलम्
(D) निद्राअभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिः

समुचित विकल्प (c) सही उत्तर है।

46. आधुनिकयुगे ब्राह्मीलिपिं सर्वप्रथमं कः पठितुं समर्थः अभवत्?

Correct Answer: (a) जेम्सप्रिंसमहोदयः
Solution:

आधुनिकयुगे ब्राह्मीलिपि सर्वप्रथमं जेम्सप्रिंसमहोदयः पठितुं समर्थः अभवत्।
अर्थात् आधुनिक युग में ब्राह्मीलिपि को पढ़ने में सर्वप्रथम जेम्सप्रिंस महोदय समर्थ हुए। प्राचीन भारतीय लिपि ब्राह्मी एवं खरोष्ठी के सर्वप्रथम वाचन का श्रेय जेम्स प्रिंसेस को प्राप्त है, जिन्होंने सर एलेक्जेंडर कनिंघम के सहयोग से मौर्य सम्राट अशोक के अभिलेखों को पढ़कर इस कार्य को प्रतिपादित किया

47. 'रिटोरिक' इति ग्रन्थस्य कर्ता कः ?

Correct Answer: (b) अरस्तुमहोदयः
Solution:

'रिटोरिक' इति ग्रन्थस्य कर्ता अरस्तू महोदयः।
'रिटोरिक' इस ग्रन्थ के लेखक अरस्तू है। अरस्तू एक ग्रीक दार्शनिक थे। वे दुनिया के बड़े विचारकों में से एक थे। अरस्तू का मानना था कि पृथ्वी ब्रह्मांड के केन्द्र में है और केवल चार तत्वों से बनी है- मिट्टी, जल, वायु, अग्नि।

अन्य रचनाएँ- पॉलिटिक्स, हिस्ट्री ऑफ एनिमल्स, ऑन मेमोरी ऑन स्लीप, ऑन ड्रीम्स ।

48. 'सुधां क्षीरनिधिं मध्नाति' इत्यत्र रेखाङ्कितपदे केन सूत्रेण द्वितीया विभक्तिः भवति ?

Correct Answer: (a) कर्मणि द्वितीया
Solution:

'सुधां क्षीरनिधिं मथ्नाति' इत्यत्र 'कर्मणि द्वितीया' इति सूत्रेण द्वितीया विभक्तिः भवति।
'सुधां क्षीरनिधिं मथ्नाति' अर्थात् वह अमृत के लिए समुद्र को मथता है। यहाँ सुधा वस्तुतः सम्प्रदान है किन्तु सम्प्रदान की अविवक्षा होने के कारण 'अकथितं च' सूत्र से कर्म संज्ञा और 'कर्मणि द्वितीया' से द्वितीया विभक्ति प्रयुक्त हुई। क्षीरनिधिं प्रधान कर्म है तथा 'सुधा' गौण कर्म है। सम्प्रदान की विवक्षा होने पर 'सुधायै क्षीरनिधिं मथ्नाति ही होगा।'

49. सांख्यमतानुमतं कथनद्वयं चिनुत

(A) प्रकृतिः आत्मना आत्मानं बध्नाति
(B) प्रकृतिः आत्मना आत्मानं न बध्नाति
(C) प्रकृति पुरुषं बध्नाति
(D) प्रकृतिः आत्मानं प्रकाश्य विनिवर्तते
समुचितमुत्तरं चिनुत- 

Correct Answer: (b) (A) एवम् (D)
Solution:

सांख्यमतानुमतं-
(i) प्रकृतिः आत्मना आत्मानं बध्नाति ।
(ii) प्रकृतिः आत्मानं प्रकाश्य विनिवर्तते
सांख्यमतानुसार प्रकृति स्वयं को अपने सात रूपों धर्म, अधर्म, अज्ञान, वैराग्य, राग, ऐश्वर्य, अनेश्वर्य के द्वारा अपने को बाँधती है- 'रूपैः सप्तभिरैव तु बध्नात्यात्मानमात्मना प्रकृतिः ।

जिस प्रकार संसार में स्वेच्छा पूर्ति के लिए लोग कार्यों में प्रवृत्ति होते हैं ठीक उसी प्रकार प्रकृति भी पुरुष के लिए प्रवृत्त होती है। जैसे नृत्याङ्गना नाट्यशाला में स्थित दर्शकों को नृत्य दिखाकर नृत्य से निवृत्त हो जाती है- 'रङ्गस्य दर्शयित्वा निवर्तते नर्तकी यथा पुरुषस्य नृत्यात् तथाऽऽत्मानं प्रकाश्य विनिवर्तते प्रकृतिः ।'

गुणवती एवं उपकारिणी प्रकृति निर्गुण होते हुए पुरुष के भोग एवं अपवर्ग रूप प्रयोजन को अनेक प्रकार के उपायों द्वारा बिना किसी स्वार्थभाव से सम्पादित करती हैं।

50. अलङ्कारसम्प्रदायस्य आचायाँ स्तः-

(A) भामहः दण्डी च (B) उद्धटः रुय्यकः च (C) रुद्रटः आनन्दवर्धनः च (D) रुय्यकः मम्मटः च
समुचितं उत्तरं चिनुत-

Correct Answer: (a) (A) एवम् (B)
Solution:

अलङ्कारस्य आचार्यो स्तः-
(i) भामहः दण्डी च
(ii) उद्भटः रुय्यकः च
सम्प्रदाय के प्रमुख आचार्य भामह (छठी शताब्दी का पूर्वार्ध) दण्डी (7वीं शताब्दी) उद्धट (8वीं शताब्दी) रुद्रट (9वीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध) है। भामह का अनुकरण दण्डी ने किया और भामह तथा दण्डी का उद्धट ने। उपरोक्त सभी आचार्य अलङ्कार को ही 'काव्य की आत्मा' मानते हैं। भारतीय काव्य शास्त्र के इतिहास में यही सम्प्रदाय सबसे प्राचीन माना जाता है।