यूजीसी NTA नेट जेआरएफ परीक्षा, दिसम्बर 2021 जून 2022 (संस्कृत)

Total Questions: 100

51. यथोचित मेलनं कुरुत-

सूची-Iसूची-II
(A) प्रकृतिभावः(I) अग्रे + अत्र
(B) सवर्णदीर्घः(II) उप + ओषति
(C) पूर्वरूपैकादेशः(III) अहो + ईशाः
(D) पररूपैकादेशः(IV) यदि + इयम्

समुचितं विकल्पं चिनुत-

विकल्पABCD
(a)IIIIIIIV
(b)IVIIIIII
(c)IIIIVIII
(d)IIIIVIII
Correct Answer: (d)
Solution:

समुचितं विकल्पं-

सूची-Iसूची-II
(A) प्रकृतिभावःअहो + ईशाः
(B) सवर्णदीर्घःयदि + इयम्
(C) पूर्वरूपैकादेशःअग्ने + अत्र
(D) पररूपैकादेशःउप + ओषति

प्रकृतिभावः- संस्कृत व्याकरण में जब किसी सन्धि पद के अन्तर्गत सन्धि योग्य दशा की प्राप्ति होने पर सन्धि करने का निषेध करना प्रकृतिभाव कहलाता है। जैसे-अहो ईशाः = अहोईशाः

सवर्णदीर्घः- अक् प्रत्याहार के बाद उसका सवर्ण आये तो दोनो मिलकर दीर्घ हो जाते हैं। जैसे- यदि + इयम् = यदीयम्।

पूर्वरूपैकादेशः- यदि पदान्त एङ्अर्थात् ए और ओ के बाद अत् अर्थात् हस्व अ आवे तो पूर्व एवं पर के स्थान पर पूर्वरूप एकादेश हो जाता है। जैसे- अग्ने अत्र = अग्नेऽत्र।

पररूपैकादेशः- अवर्णान्त उपसर्ग के बाद एडादि अर्थात् (ए और ओ) से प्रारम्भ होने वाली धातु केे रहने पर अवर्ण और एड (ए, ओ) के स्थान पर पररूप एकादेश हो जाता है। जैसे- उप ओषति = उपोषति ।

52. 'यद्विषयकत्वेन ज्ञानस्यानुमितिविरोधित्वं तत्त्वम्'- अनेन वाक्येन कस्य लक्षणं प्रस्तूयते?

Correct Answer: (b) हेत्वाभाससामान्यस्य
Solution:

'यद्विषयकत्वेन ज्ञानस्यानुमितिविरोधित्वं तत्त्वम्'। अनेन वाक्येन हेत्वाभाससामान्यस्य लक्षणं प्रस्तूयते । असद् हेतु को हेत्वाभास कहते हैं, अर्थात् जो हेतु नहीं होता किन्तु हेतु के समान भासित होता है। 'आभासते इत्याभासः हेतोराभासः हेत्वाभासः ।' अर्थात् जिसके ज्ञान से अनुमिति के कारण अथवा साक्षात अनुमिति ही प्रतिबन्ध हो जाता है, वह हेत्वाभास या हेतुदोष कहलाता है।

53. शिक्षाग्रन्थस्य प्रतिपाद्येषु बलं नाम किम्?

(A) स्थानम् (B) प्रयत्नः (C) स्वरः (D) व्यञ्जनम्
समुचितमुत्तरं चिनुत- 

Correct Answer: (a) (A) एवम् (B)
Solution:

शिक्षाग्रन्थस्य प्रतिपाद्येषु बलं नाम-
(i) स्थानम। (ii) प्रयत्नः ।
'शिक्षा प्राणं तु वेदस्य ।' आचार्य सायणने शिक्षा की परिभाषा की है- 'स्वरवर्णाद्युच्चारणप्रकारो यत्रोपदिश्यते सा शिक्षा।' जिस वेदाङ्ग में स्वर और वर्ण आदि के उच्चारण की रीति का उपदेश दिया जाता है वह शिक्षा है।
शिक्षाग्रन्थ में इन छः अङ्गों का विवेचन किया जाता है-
1. वर्ण - अ, इ,उ, क, ख आदि वर्णों का उच्चारण।
2. स्वर वेदपाठ में प्रयुक्त उदात्त, अनुदात्त और स्वरित का उच्चारण।
3. मात्रा - हस्व, दीर्घ और प्लुत का उच्चारण।
4. बल - स्थान, प्रयत्न के अनुसार वर्णों का उच्चारण।
5. साम- दोषरहित और माधुर्य आदि गुण सहित ।
6. सन्तान- संहिता (सन्धि) के नियमों के साथ उच्चारण।

54. पक्षतायाः लक्षणम् अस्ति-

Correct Answer: (c) सिषाधयिषाविरहविषिष्टसिद्ध्यभावः पक्षता
Solution:

पक्षतायाः लक्षणम् सिषाधयिषाविरहविशिष्ट सिध्यभावः पक्षता अस्ति।

55. 'सोऽयमात्मा चतुष्पात्' इति कस्याम् उपनिषदि वर्तते?

Correct Answer: (b) माण्डूक्योपनिषदि
Solution:

'सोऽयमात्मा चतुष्पात्' इति माण्डुक्योपनिषदि वर्तते । 'सोऽयमात्मा चतुष्पात्' यह आत्मा ही ब्रह्म है जिसके 4 पाद हैं। यह वर्णन माण्डूक्योपनिषद् में मिलता है। माण्डूक्योपनिषद् अथर्ववेद से सम्बद्ध लघुकाय उपनिषद् है। जिसमें केवल 12 गद्यात्मक मंत्र या वाक्य हैं।

इसमें ओंकार की महत्ता का वर्णन है। तीनों काल और त्रिकालातीत सब कुछ ओम ही है। इस प्रकार जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति तथा तुरीय (शिव अद्वैत) को इस उपनिषद् में समझाया गया है।

इस उपनिषद् पर गौड़पाद ने चार खण्डों में विभक्त 'माण्डूक्यकारिका नामक ग्रन्थ लिखा जिसमें 215 पद्य हैं। वह अद्वैत वेदान्त का प्रतिष्ठापक ग्रन्थ है। उसके प्रथम खण्ड में माण्डूक्योपनिषद् की व्याख्या है।

56. मैक्समूलरमहोदयेन ऋग्वेदस्य का संहिता सम्पादिता ?

Correct Answer: (a) शाकलसंहिता
Solution:

मैक्समूलरमहोदयेन ऋग्वेदस्य शाकलसंहिता सम्पादिता। मैक्समूलरमहोदय द्वारा ऋग्वेद की शाकल संहिता का सम्पादन किया गया है। महाभाष्य में इस वेद की 21 शाखाओं का उल्लेख है किन्तु चरणव्यूह के अनुसार पाँच शाखाएँ मुख्य हैं- शाकल, वाष्कल, आश्वलायन, शांखायन, माण्डूकायन सम्प्रति शाकल शाखा की ही संहिता उपलब्धि है। आश्वलायन शाखा के श्रौतसूत्र और गृह्य सूत्र ही मिलते हैं।

शांखायन शाखा के ब्राह्मण और आरण्यक प्राप्य हैं। अन्य शाखाएँ नामशेष हैं। सम्पूर्ण वैदिक वाङ्मय का प्राचीनतम ग्रन्थ होने के कारण शाकल संहिता को विश्वसाहित्य का प्रथम ग्रन्थ होने का गौरव प्राप्त है। चारों वेदों की संहिताओं की तुलना में यह सबसे बड़ी संहिता है। एक विशालकाय वैदिक ग्रन्थ के रूप में यह अद्भुत और अनंत ज्ञान का स्त्रोत है।

57. ऋग्वेदस्य उपनिषदौ स्तः

(A) तैत्तिरीयोपनिषद् (B) ऐतरेयोपनिषद् (C) बृहदारण्यकोपनिषद् (D) कौषीतकी उपनिषद्
समुचितं विकल्पं चिनुत- 

Correct Answer: (a) (B) एवम् (D)
Solution:

ऋग्वेदस्य उपनिषदौ स्तः-
(i) ऐतरेयोपनिषद् (ii) कौषीतकी उपनिषद
उपनिषदों का सम्बन्ध वेदों से है। प्राचीन प्रामाणिक तथा प्रमुख उपनिषदों की संख्या 14 है। ऐतरेयोपनिषद ऋग्वेद से सम्बद्ध ऐतरेयारण्यक के द्वितीय आरण्यक (खण्ड) के अन्तर्गत चतुर्थ से षष्ठ अध्याय पर्यन्त अंश के रूप में है। इसलिए इस उपनिषद् में तीन अध्याय हैं।

ऋषि महिदास ऐतरेय के नाम पर इसका यह नाम दिया गया है। प्रथम अध्याय तीन खण्डों में और शेष दोनों एक-एक खण्ड के हैं, इस प्रकार कुल 5 खण्ड हैं। इसमें विश्व की उत्पत्ति का विवेचन है। तृतीय अध्याय में आत्मा के स्वरूप का विवेचन है और अन्त में 'प्रज्ञान' को ब्रह्म कहा गया है। प्रज्ञानं ब्रह्म ।

कौषतिकि उपनिषद में 4 अध्याय हैं जो क्रमशः 7, 15, 9 तथा 20 खण्डों में विभक्त है। सम्पूर्ण उपनिषद् गद्यात्मक है। प्रथम अध्याय में देवयान और पितृयान (मृत्यु के बाद के मार्ग) का वर्णन है। द्वितीय अध्याय में आत्मा के प्रतीक 'प्राण' का विवेचन है

जिससे तृतीय अध्याय में प्रतर्दन इन्द्र से ब्रह्मविद्या सीखते हैं, यहाँ भी प्राण सिद्धान्त का निरूपण है। चतुर्थ अध्याय में अजातशत्रु और बालाकि के आख्यान के प्रसङ्ग में परब्रह्म का विवेचन है।

58. तर्कस्य स्वरूपम् अस्ति-

Correct Answer: (d) व्याप्यारोपेण व्यापकारोपः
Solution:

तर्कस्य स्वरूपं व्याप्यारोपेण व्यापकारोपः अस्ति । अर्थात् व्याप्य के आरोप से व्यापक के आरोप को 'तर्क' कहते हैं।

जैसे- अग्नि नहीं होगी तो धूआं भी नहीं होगा। यहाँ अग्नि आभाव व्याप्य और धूमाभाव व्यापक है। अतः व्याप्य के आरोप से व्यापक का आरोप होने के कारण यह तर्क है (अनिष्टप्रसङ्गो तर्कः तर्कभाषा)

59. यथोचित मेलनं कुरुत-

सूची-Iसूची-II
(A) चित्तभूमि:(I) अस्तेयम्
(B) यम:(II) राग:
(C) नियम:(III) एकाग्रम्
(D) क्लेश:(IV) तप:

समुचितं विकल्पं चिनुत-

विकल्पABCD
(a)IIIIIIIV
(b)IIIIIVII
(c)IIIIIIIV
(d)IVIIIIII
Correct Answer: (b)
Solution:

यथोचितं मेलनं अस्ति-

सूची-Iसूची-II
(A) चित्तभूमि:एकाग्रम्
(B) यम:अस्तेयम्
(C) नियम:तप:
(D) क्लेश:राग:

यम - अहिंसा सत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमः । अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य ये 5 यम हैं।
नियम - शौच सन्तोषतपः स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः । अर्थात् शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय एवं ईश्वर की आराधना ये 5 नियम हैं।

60. ऋग्वेदादिक्रमेण ब्राह्मणनामानि लिखत-

(A) कौषीतकीब्राह्मणम्  (B) सामविधानब्राह्मणम् (C) तैत्तिरीयब्राह्मणम् (D) गोपथब्राह्मणम्
समुचितं विकल्पं चिनुत- 

Correct Answer: (b) (A), (C), (B), (D)
Solution:

ऋग्वेदादिक्रमेण ब्राह्मणनामानि -
(A) कौषीतकीब्राह्मणम् (B) सामविधानब्राह्मणम्
(C) तैत्तिरीयब्राह्मणम् (D) गोपथब्राह्मणम्
शांखायन ब्राह्मण को कोषीतकि ब्राह्मण भी कहते हैं। इसमें 30 अध्याय हैं। इसमें अग्न्याधान, अग्निहोत्र, दर्शपौर्णमास और चातुर्मास्य इष्टियों का वर्णन है। इसमें भी सोमयाग प्रधान विषय है।

तैत्तिरीय ब्राह्मण- यह कृष्णयजुर्वेदीय शाखा का एकमात्र ब्राह्मण है। इसमें 3 काण्ड हैं। इसमें काण्ड 1 में अग्न्याधान, वाजपेय, सोम, राजसूय आदि काण्ड 2 में सौत्रामणि, बृहस्पतिसव और वैश्यसव आदि काण्ड 3 में नक्षत्रेष्टि का मुख्य रूप से वर्णन है।

सामविधान- सामविधान ब्राह्मण में 3 प्रकरण हैं। जिनमें कृच्छु अतिकृच्छ आदि व्रतों, पुत्र, ऐश्वर्य एवं आयुष्य की प्राप्ति के लिए विविध अनुष्ठानों का वर्णन है।

गोपथ ब्राह्मणः- यह अथर्ववेद का एकमात्र ब्राह्मण है। इसके दो भाग है-
(i) पूर्व भाग या पूर्व गोपथ
(ii) उत्तरभाग उत्तर गोपथ ।
प्रथम में 5 प्रपाठक या अध्याय हैं, द्वितीय में 6 प्रपाठक। इसके रचयिता गोपथ ऋषि माने जाते हैं।