Solution:'कुत्रचिद् विकल्पप्रसक्तौ अपि अनन्यगत्या प्रतिषेधाश्रयणम् इत्यस्य उदाहरणम् नातिरात्रे षोडशिनं गृह्णाति । वर्णाश्रमानुसार वैदिक अग्नि होत्रादि कृत्यों में अग्नि, इन्द्र, वरूण, रूद्र, विष्णु आदि सभी देवताओं का यजन करना पड़ता है
अतः कोई भी वैदिकत्वाभिमानी कैसे कह सकते है कि हम अनन्य वैष्णव या शैव है, अन्य देव का अर्चन ही करेंगे।
तस्मात् अनन्यता का अर्थ यह कदापि नहीं हो सकता कि देवता, ब्राह्मण, गुरु, माता-पिता आदि गुरुजनों की पूजा छोड़ देनी चाहिए किन्तु अनन्यता का अर्थ यही है कि देव पितृ गुरुब्राह्मणादि सभी का आराधन पूजन करो इत्यादि ।
षोडशी ग्रहण-"अतिरात्रे षोडशिनं गृहणाति इस शास्त्र से ही प्राप्त है। अतः” नातिरात्रे षोडशिनं गृहणति ।" इस साक्षात निषेध से भी अत्यन्तबाध नहीं होता, किन्तु विकल्प ग्रहणाऽग्रहण का ही माना गया है।