यूजीसी NTA नेट जेआरएफ परीक्षा, दिसम्बर-2022 (संस्कृत)

Total Questions: 100

21. पस्पशाह्निकानुसारं प्रस्कन्दनम्, प्रपतनम् इत्याद्युदाहरणेन सिद्धं भवति-

Correct Answer: (a) करणाधिकरणयोः भिन्नेषु अपि कारकेषु ल्युट् भवतीति
Solution:

पस्पशाह्निकानुसारं प्रस्कन्दनम, पमतनम् इत्याद्युदाहरणेन सिद्धं भवति कारणधिकरणयोः भिन्नेषु अपि कारकेषु ल्युट भवति अर्थात् पस्पशाह्निक के अनुसार प्रस्कन्दनम् और पमतनम् इत्यादि उदाहरणों से सिद्ध होता है कि कारण और अधिकरणों के भिन्न होने पर भी कारकों में ल्युट् प्रत्यय होता है।

22. 'यासुद परस्मैपदेषूदात्तो डि.च्च' - इत्यत्र डि.त्वोक्तेर्जायते

Correct Answer: (a) क्वचिदनुबन्धकार्येऽप्यनल्विधाविति प्रतिषेध्य इति ।
Solution:

यासुट् परस्मैपदेदात्तो डिच्च इत्यत्र डित्वोक्ते यते क्वचिदनुबन्धकार्येऽप्यनल्विधाविति प्रतिषेध्य इति

23. 'त्वं प्रकोष्ठे मनसा पुस्तकं पठसि'- इत्यत्र तिङ्कवाच्यकारकवाचि पदम् अस्ति-

Correct Answer: (a) त्वम्
Solution:

'त्वम् प्रकोष्ठे मनसा पुस्तकं पठसि' इत्यत्र 'त्वम् तिङ् वाच्य कारक वाचि पदम् अत्ति तुम कक्ष में मन से पुस्तक पढ़ते हो । यहाँ 'त्वम् तिङ् वाच्य कारक वाचि पद है। सूत्र-युष्मद्युपपदे समानाधिकरणे स्थानिन्यपि मध्यमः ।

अर्थ तिङ्का वाच्य जो कारक, तद्वाचक युष्मद् उच्चरित होने पर मध्यमपुरुष प्रयुक्त होता है। यथा त्वं वनं गच्छतिः यहाँ त्वम् यह युष्मद शब्द उपपद है अतः गम् धातु से मध्यम पुरुष हुआ है।

समानाधिकरणे- परन्तु वह युष्मद् शब्द लकार का समानाधिकरण होना चाहिए। अर्थात् लकार का जो अधिकरण (वाच्य) हो वही अधिकरण युष्मद् शब्द का भी होना चाहिए।

तात्पर्य यह है कि लट् आदि लकार जिस कर्ता वा कर्म में हुए हों युष्मद् शब्द का भी वाच्य वही कर्ता एवं कर्म होना चाहिए उससे भित्र नहीं यथा त्वं वनं गच्छसि, यहाँ गम् धातु से लट् लकार कर्ता में हुआ है।

24. वर्तमानकालार्थकस्य क्तप्रत्यस्य प्रयोगः अस्ति-

Correct Answer: (c) राज्ञां बुद्धः
Solution:

वर्तमान कालार्थस्य क्तप्रत्ययस्य प्रयोगः अस्ति 'राज्ञां बुद्धः । अर्थात् वर्तमानकाल बोधक 'क्त' प्रत्ययान्त शब्द के योग में षष्ठी विभक्ति हों।

जैसे-
(1) राज्ञां मतः राजसमूह-कर्तृक वर्तमान विभक्ति इच्छा का विषय
(2) राज्ञां बुद्धः- राज समूह-कर्तृक वर्तमान ज्ञान का विषय
(3) राज्ञां पूजितः राजसमूह कर्तक वर्तमान पूजा का आश्रय। मतिबुद्धि पूर्जार्थभ्यश्च इस सूत्र से वर्तमान काल रूप अर्थ समझाने के लिए 'क्त' प्रत्यय विहित हुआ है।

इस क्त प्रत्ययान्त शब्द के योग में कर्तृकारक में षष्ठी विभक्ति हो। न लोकव्यय निष्ठा खलर्थतनाम इस सूत्र में कर्तृकारक में षष्ठी विभक्ति हो। न लोकव्ययनिष्ठा खल तृनाम् इस सूत्र से आगे चलकर निष्ठा अर्थात् क्त तथा क्ववत् प्रत्ययों से बने शब्दों के योग में कर्तृकारक में षष्ठी का निषेध किया है।

अब "क्तस्य च वर्तमाने" सूत्र उक्त निषेध का अपवाद या बाधक है। अर्थात् न लोकेः इत्यदि सूत्र से क्त प्रत्ययान्त शब्द के योग में कर्तकारक में षष्ठी का जो निषेध किया गया है।

वह निषेध वर्तमानकालार्थक क्त प्रत्ययान्त शब्द के योग में नहीं लगेगा। तात्पर्य यह है कि वर्तमानर्थक "क्त" प्रत्ययान्त्र शब्द के योग में कर्तृकारक में षष्ठी विभाक्ति होती है।

25. अधिकरणवाचिनः क्तप्रत्ययस्य उदाहरणम् -

Correct Answer: (d) इदमेषाम् आसितम्
Solution:

अधिकरणवाचिनः क्तप्रत्ययस्य उदाहरणम् इदमेषाम् आसितम्
क्तस्य योगे षष्ठी स्यात्-अर्थात् 'क्त' प्रत्यय से बने हुए अधिकरण वाचक शब्द के योग में यथा सम्भव कर्ता तथा कर्मकारक में षष्ठी विभक्ति हो

जैसे-
1.इदम् एषाम् आसितम् यह इनका आसन है।
2. इदम् एषां शयितम् यह इनकी शय्या है।
3. इदम् एषां गतम्-यह इनका गमनमार्ग है।
4. इदम् एषां भुक्तम्- यह इनका भोजन पात्र है

26. अधिकरणषष्ट्याः प्रयोगः वर्ततेः

Correct Answer: (a) द्विः अह्नः भुक्ते
Solution:

अधिकरणषष्टयाः प्रयोगः वर्तते- द्विः अह्नः भुङ्क्ते । कृत्वसुच् (कृत्वः) तथा इस अर्थवाले अन्य प्रत्ययों के योग में कालवाचक अधिकरण में सम्बन्धमात्र की विवक्षा में षष्ठी होती है।

उदाहरण पञ्चकृत्वोंऽहो भोजनम् (दिन में पाँच बार भोजन) कृत्वसुचु प्रत्यय के कारण अधिकरण अहन् में षष्ठी। द्विरह्नों भोजनम् (दिन में दो बार भोजन) द्वि शब्द से कृत्वसुच् के अर्थ में सुच् (सूः) प्रत्यय है। अतः अहन् में षष्ठी।

27. 'विभावैरनुभावैश्च सात्त्विकैर्व्यभिचारिभिः'

अनीयमानः स्वाद्यत्वं स्थायीभावों रसः स्मृतः  
इति कस्य आचार्यस्य कथनम्?  

Correct Answer: (c) धनञ्जयस्य
Solution:

'विभावैरनुभावैश्च सात्विकैर्व्यभिचारिभिः।'
अनीयमानः स्वाद्यात्वं स्थायीभावो रसः स्मृतः ।
इति धनञ्जयस्य कथनम्।
अर्थात्- विभावों, अनुभावों, व्यभिचारियों तथा सात्विक भावों के द्वारा आस्वादन की योग्यता को प्राप्त कराया गया (अर्थात् आस्वादन के योग्य बनाया गया) स्थायी भाव ही रस कहा गया है।

28. 'शरीरभाजां भवदीयदर्शनं व्यनक्ति कालत्रितयेऽपि योग्यताम्' इति सूक्तिरस्ति-

Correct Answer: (c) शिशुपालवधमहाकाव्ये
Solution:

'शरीरभाजां भवदीयदर्शनं व्यनक्ति कालत्रितयेऽपि योग्यताम्' इति शिशुपालवधमहाकाव्ये सूक्तिरस्ति अर्थात् आपका दर्शन त्रिकाल में शरीर धारियों की योग्यताओं को प्रकट करता है

यह शिशुपालवध महाकाव्य की सूक्ति है। शिशुपालवध महाकाव्य वृहत्रयी के अन्तर्गत आता है। इसके मङ्गलाचरण में शिव की स्तुति की गयी है। जो वशंस्थ छन्द में है। इसमें कुल 20 सर्ग तथा 1650 श्लोक है।
हृयघं संम्प्रति हेतुरेष्यतः शुभस्य पूर्वाचरितै कृतं शुभैः। शरीर भाजां भवदीयदर्शनं व्यनक्ति कालात्रितयऽपि योग्यताम् ।। आपका दर्शन तीनों लोकों में शरीरधारियों की योग्यताओं को प्रकट करता है" वर्तमान काल में पाप नष्ट करता है, भविष्यकाल में आने वाले श

29. 'लोकोत्तराणां चेतांसि को नु विज्ञातुमर्हति' इति काव्यपंक्तिः कस्मिन् नाटके अस्ति?

Correct Answer: (c) उत्तररामचरिते
Solution:

'लोकोत्तराणां चेतांसि को न विज्ञातुमर्हति' इति काव्य पंक्तिः उत्तरामचरितनाटके अस्ति अर्थात् महान् व्यक्ति का स्वभाव देवराज इन्द्र के वज्र से भी अधिक कठोर और पुष्प से भी अधिक कोमल होता है जो इस प्रकार के गुण वाले व्यक्ति होते है वे लोक से ऊपर उठ जाते है।

“वज्रादपि कठोराणि मृदूनि कुसुमादपि ।
लोकोत्तराणां चेतांसि को ही विज्ञातुमर्हति ।
1. लौकिकानां हि साधूनामर्थं वागनुवर्तते ।
2. मोहे-मोहे रामभद्रस्य जीवं स्वैरं स्वैरं प्रेरितैस्तर्पयेति ।
3. पुटपाक प्रतिकाशो रामस्य करुणों रसः
4. अयि कठोर ! यशः किल ते प्रियम्
5. ईदृशानां विपाकोऽपि जायते परमाद्भुतः

30. 'यास्यत्यद्य शकुन्तलेति हृदयं संस्पृष्टमुत्कण्ठया' इत्यस्मिन् पद्ये किं छन्दः

Correct Answer: (a) शिखरिणी
Solution:

'यास्यत्यद्य शकुन्तलेति हृदयं संस्पृष्टमुत्कण्ठया' इत्यस्मिन् पद्ये 'शार्दूलविक्रीडितम्' छन्दः ।
जिसके प्रत्येक चरण में 19 वर्ण होते हैं वह शार्दूलविक्रीडितम् छन्द कहलाता है।

लक्षण - सूर्याश्वैर्मसजस्तताः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्। वृत्तरत्नाक सूर्याश्वर्यदि मः सजौ सततगाः शार्दूलविक्रीडितम् -छन्दोमञ्जरी
उदाहरण-

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यास्यत्यद्य      शकुन्तलति    हृदयं         संस्पृष्टमुकण्ठया

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कण्ठः   स्तम्भितबाष्पवृत्तिकलुषश्चिन्ताजडम्  दर्शनम्

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वैक्लव्यं   मम तावदीदृशमिदं   स्नेहादरण्यौकसः

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पीड्यन्ते गृहिणः कथन्नु   तनयाविश्लेषदुः  खैर्नवैः