यूजीसी NTA नेट जेआरएफ परीक्षा, दिसम्बर-2022 (संस्कृत)

Total Questions: 100

51. असिद्धहत्वाभासस्य प्रसङ्गे असिद्धेः प्रकारः अस्ति-

(A) निगमनासिद्धः  (B) स्वरूपासिद्धः (C) व्याप्यत्वासिद्धः (D) साध्यासिद्धः
उपरि उक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

Correct Answer: (b) B, C केवलम्
Solution:

असिद्धहेत्वाभासस्य प्रसङ्गे असिद्धेः 'स्वरूपासिद्धि':, व्याप्यत्वासिद्धः प्रकारः अस्ति अर्थात् असिद्ध हेत्वाभास के प्रसङ्ग में असिद्ध के प्रकार स्वरूपासिद्ध, व्याप्यत्वासिद्ध' है।
असिद्धः- असिद्ध हेतु का कार्य साध्य को सिद्ध करना है किन्तु जब हेतु स्वयं पक्ष मे विद्यमान न हो तो उसे असिद्ध हेत्वाभास कहते है। जैसे- स्वर्णपर्वत अग्निमय है क्योंकि वह धूमवान है। स्वर्णपर्वत पक्ष है जिसका अस्तित्व ही नहीं होता।

52. नामधेयस्य निमित्तम् अस्ति-

(A) नियमविधिवाक्यम् (B) मत्वर्थलक्षणाभयम् (C) पर्युदासोपसंहारौ (D) तत्प्रख्यशास्त्रम्
उपरि उक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

Correct Answer: (b) B, D केवलम्
Solution:

नामधेयस्य निमित्तम् मत्वर्थलक्षणाभयम्, तत्प्रख्यशास्त्रम् अस्ति अर्थात् किसी शब्द को नामधेय अर्थात् याग का नाम मानने में चार निमित्त कारण होते हैं।

1.मत्वर्थलक्षणा भयम् मत्वर्थ लक्षण के भय से यानी मत्वर्थ लक्षणा न माननी पड़ जाय इस भय से, उदा-उद्भिदा यजेत पशुकामः
2. वाक्य भेद भयात्- वाक्य भेद के भय से,
3. तत्प्रख्यशास्त्रात् तत्प्रख्यशास्त्र से, अर्थात् अन्य गुण बोधक वाक्य के विद्यमान होने के कारण उदा. अग्नि होत्रं जुहोति ।
4. तद्व्यपदेश से अर्थात् गुण के द्वारा उपमान होने का उल्लेख होने से,

53. अज्ञानसमष्टिः उच्यते-

(A) सुषुप्तिः (B) कारणशरीरम् (C) जगत्कारणम् (D) ईश्वरः
उपरि उक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

Correct Answer: (a) B, C केवलम्
Solution:

अज्ञानसमष्टिः उच्यते 'कारणशरीरम्, जगत्कारणम्। अर्थात् अज्ञान समष्टि कहलाती है कारणशरीर और जगत्कारण। इदमज्ञानं समाष्टिव्यष्टयभिप्रायेणैकमनेकमिति च व्यवह्रियते तथाहि यथा वृक्षाणां समष्यभिप्रायेण वनमित्येकत्वव्यपदेशो यथा वा जलानां समष्ट्यभिप्रायेण जलाशय इति तथा नानात्वेन प्रतिभासमानानां जीवगता ज्ञानानां समष्ट्यभिप्रायेण तदेकत्वव्यपदेशः अजामेकां इत्यादिश्रुते अर्थात् अज्ञान का समष्टि और व्यष्टि के भेद से दो प्रकार से व्यवहार होता है। जैसे- वृक्षों की समष्टि के अभिप्राय से एक वन इस प्रकार से व्यपदेश होता है।

नोट- इस प्रश्न को आयोग ने निरस्त कर दिया है। क्योंकि अज्ञान ही जगत का कारण है अज्ञान सम्बन्ध से ही ब्रह्म जगत के उपादान निमित्त कारण होता है।

54. व्यक्तम् अस्ति-

(A) नित्यम् (B) अनाश्रितम् (C) हेतुमत् (D) सावयवम्
उपरि उक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

Correct Answer: (b) C, D केवलम्
Solution:

व्यक्तम् हेतुमत्, सावयवम् अस्ति ।
अर्थात, सांख्य शास्त्र के अनुसार व्यक्तः हेतुमत्, सावयवम् है।
हेतुमदनित्यमव्यापि सक्रियमनेकमाश्रितं लिङ्गम्।
सावयवं परतन्त्रं व्यक्तं, विपरीतमव्यक्तम्।। 10 सांख्य कारिका
अर्थात्- व्यक्त सकारण अर्थात् उत्पन्न होने वाला, विनाशी, एकदेशीय (व्याप्य) क्रियावान् अनेक, स्वकारण में आश्रित अतएव परतन्त्र, अवयवयुक्त एवं प्रधान के अनुमान में हेतु होता है, अव्यक्त इसके प्रतिकूल होता है।

55. जैनदर्शन निर्जरायाः भेद अस्ति-

(A) परिष्कृतिः (B) यथाकालः (C) स्थितिसंहारः (D) औपक्रमिकः
उपरि उक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

Correct Answer: (d) B,D केवलम्
Solution:

जैनदर्शन निर्जरायाः यथाकालः औपक्रमिकः भेदः अस्ति। जैन दर्शन में निर्जरा के भेद हैं, यथाकाल, औपक्रमिक । निर्जरा जैन दर्शन के अनुसार एक तत्व है। इसका अर्थ होता है, आत्मा के साथ जुड़े कर्मों का क्षय करना।

यह जन्म मरण के चक्र से मुक्त होने के लिए आवश्यक है। आचार्य उमास्वामी द्वारा विरचित जैन ग्रन्थ "तत्वार्थ सूत्र" का 9 अध्याय इस विषय पर है।

निर्जरा संवर के पश्चात् होती है। जैन ग्रन्थ द्रव्य संग्रह के अनुसार कर्म आत्मा को धूमिल कर देते हैं। निर्जरा से आत्मा फिर निर्मलता को प्राप्त होती है।

56. 'अधि' इति उपसर्गः ब्रूते-

(A) उपरिभावम्  (B) ऐश्वर्यम (C) संसर्गम् (D) सादृश्यापरपर्यायम्
उपरि उक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

Correct Answer: (a) A, B कवलम्
Solution:

उपर्युक्त कथनस्यालाक-
"अघि' इति उपसर्गः उपरिभावम् ऐश्वर्यम् ब्रूते-
अर्थात् अधि इस उपसर्ग का अर्थ ऊपर होना, या सबसे ऊँचा होना कहा गया है। निरुक्त के अनुसार उपसर्ग एवं अर्थ निम्न हैं।

उपसर्ग अर्थ 
इधर
प्र, पराउधर
अभिसामने
प्रतिविपरीत
अति, सुआदरार्थे
निर्, दुर्निरादर
वि, अवनीचे

57. अभ्याससम्बन्धि कार्यम् अस्ति-

(A) 'अत आदे:' इत्यनेन विधीयमानं कार्यम्
(B) 'कुहोश्चः' इत्यनेन विधीयमानं कार्यम्
(C) 'आत्मनेपदेष्वनतः' इत्यनेन विधीयमानं कार्यम्
(D) 'लिटि धातोरनभ्यासस्य' इत्यनेन विधीयमानं कार्यम्
उपरि उक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत- 

Correct Answer: (c) A, B केवलम्
Solution:

उपरि उक्तकथनस्यालोके अभ्यास सम्बन्धि कार्यम् अस्ति अत आदेः इत्यनेन विधीयमानं कार्यम्
कुहोश्चुः इत्यनेन विधीयमानं कार्यम्।
उपरोक्त कहे गये कथन के अनुसार अभ्यास सम्बन्धि कार्य हैं- अत आदेः- अर्थात् अभ्यास के आदि में यदि कहीं अत् अर्थात् हस्व अकार आ जाये तो उसे दीर्घ हो जाता है।

यही इस सूत्र का तात्पर्य है। कुहोश्चुः- अभ्यास के कवर्ग और हकार के स्थान पर च वर्ग आदेश हो। अर्थात् अभ्यास के कवर्ग और हकार के स्थान पर च वर्ग आदेश होता है।

58. वर्जनम्अर्थः गम्यते-

(A) 'अप हरे:' संसारः' इत्यनेन
(B) 'हरिं परि' इत्यनेन
(C) 'परि हरे:' संसारः' इत्यनेन
(D) 'आ सकलाद् ब्रह्म' इत्यनेन
उपरि उक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

Correct Answer: (c) A, C केवलम्
Solution:

उपरि उक्तकथनस्यालोके-
वर्जनम् अर्थः, अप हरेः संसारः इत्यनेन, परि हरेः संसारः इत्यनेन गम्यते ।
अर्थात् वर्जन अथवा निषेध अर्थ में अप तथा परि कर्मप्रवचनीय होते हैं। इसका सूत्र “अपपरी वर्जने" है।
जहाँ अप और परि वर्जन अर्थ में द्योतित होते हैं वहाँ अपादाने पञ्चमी' सूत्र से पञ्चमी विभक्ति होता है।

59. येषाम् आग्रेडितानां शब्दानां योगे द्वितीयाविभक्तिः विहिता अस्ति तेषु न वर्तते-

(A) अध्यधि (B) किञ्चित किञ्चित् (C) पुनःपुनः (D) अधोऽधः
उपरि उक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

Correct Answer: (c) B, C केवलम्
Solution:

उपरि उक्तकथनस्यालोके
येषाम् आग्रेडितानां शब्दानां योगे द्वितीयाविभक्ति विहिता न अस्ति तेषु इत्यन्त्र किञ्चित किञ्चित्, पुनः पुनः वर्तते। अर्थात् जिन आम्रेडित शब्दों के योग में द्वितीया विभक्ति नही होती वे हैं किञ्चित किञ्चित, पुनः पुनः ।
उभसर्वतसोः कार्याधिगुपयादिषु त्रिषु ।
द्वितीयाऽऽम्रेडितान्तेषु ततोऽन्यत्रापि दृश्यते ।।
उभयतः, सर्वतः धिक्, उपर्युपरि, अध्यधि, अधोऽधः पदों के योग होने पर द्वितीया विभक्ति होगी।
जैसे- अध्यधि लोकं हरिः हरि लोक के ऊपर (पास) हैं।
अधोऽधःलोकं हरिः पाताल लोक के ठीक नीचे हरि हैं।

60. सत्यं कथनम् अस्ति-

(A) 'अपि शब्दः सम्भावनेऽर्थे कर्मप्रवचनीयसज्ञः अस्ति'
(B) 'सुषिक्त किं तवात्र' इत्यत्र पूजार्थः गम्यमानः अस्ति
(C) 'अति देवान् कृष्णः' इत्यत्र अतिक्रमणं पूजा च गम्यमाने भवतः
(D) 'उप हरिं सुराः' इत्यनेन सामीप्यमर्थः गम्यते ।
उपरि उक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

Correct Answer: (d) A, C केवलम्
Solution:

उपरोक्त कथनानुसारं "A, C" कथनम् केवलम् सत्य कथनम् अस्ति अर्थात् कथनानुसार A तथा C कथन सत्य हैं। A. अपिशब्दः सम्भावनेऽर्थे कर्म प्रवचनीय सज्ञः अस्ति। अपि शब्द की सम्भावना अर्थ में कर्म प्रवचनीय संज्ञा होती है।

"अपिः पदार्थ संभावनाऽन्ववसर्ग गर्हासमुच्चयेषु सूत्र से "अपि की पदार्थ, संभावना, अन्वसर्ग (इच्छानुसार कार्य करने की अनुमति देना), गर्दा (निन्दा) तथा समुच्चय (संग्रह) अर्थों में अपि की कर्मप्रवचनीय संज्ञा होती है। यथा अपि स्तुयाद् विष्णुम्' यह कथन सत्य है।

C. "अति देवान् कृष्णः” इत्यत्र अतिक्रमणं पूजा च गम्यमाने भवतः । अतिदेवान् कृष्णः” यहाँ अतिक्रमण तथा पूजा अर्थ गम्यमान है। "अतिरतिक्रमणे च''

B. सुषिक्तं किं तवात्र" इत्यत्र पूजार्थः गम्य मानः अस्ति अर्थात् यहां पूजार्थ गम्यमान है। यह कथन असत्य है। 'सुपूजायाम्' सूत्र से यहाँ सुषिक्तम्” में 'सु' निन्दा अर्थ में विद्यमान है,

D. "उप हरि सुराः" इत्यनेन सामीप्य अर्थ गम्यते । उपहरिं सुराः यहां सामीप्य अर्थ गम्यमान नहीं होता है। अतः यह कथन असत्य है। "उपोऽधिके च" सूत्र से उप की "अधिक तथा हीन" अर्थ में कर्म प्रवचनीय संज्ञा होती है। यहाँ उप हीन अर्थ में विद्यमान है।