यूजीसी NTA नेट जेआरएफ परीक्षा, जून 2023 (संस्कृत)

Total Questions: 100

91. (प्रश्न सं. 91 से 100 तक) आधोलिखितं परिच्छेदं पठित्वा अधस्तप्रश्नस्य उत्तरं देयम्-

यौवनारम्भे च प्रायः शास्त्रजलप्रक्षालननिर्मलापि कालुष्यमुपयाति बुद्धिः। अनुज्झितधवलतापि सरागैव भवति यूनां दृष्टिः। अपहरति च वात्येव शुष्कपत्रं समुद्भूतरजोभ्रान्तिरतिदूरम् आत्मेच्छया यौवनसमये पुरुषं प्रकृतिः।

इन्द्रियहरिणहारिणी च सततमतिदुरन्तेयमुपभोगमृगतृष्णिका नवयौवनकषायितात्मनश्च सलिलानीव तान्येव विषयस्वरूपाण्यास्वाद्यमानानि मधुरतराण्यापतन्ति मनसः।

नाशयति च दिमोह इवोन्मार्गप्रवर्तकः पुरुषमत्यासङ्गो विषयेषु । भवादृशा एव भवन्ति भाजनानि उपदेशानाम् । अपगतमले हि मनसि स्फटिकमणाविव रजनिकरगभस्तयो विशन्ति सुखेन उपदेशगुणाः ।

'अपगतमले हि मनसि स्फटिकमणाविव' इत्यत्र कोऽलङ्कारो वर्तते ?

Correct Answer: (c) उपमा
Solution:

अपगतमले हि मनसि स्फटिकमणाविव इत्यत्र उपमा अलंकारः वर्तते ।
अर्थात् उपदेश के गुण निर्मल अन्तःकरण में उसी तरह अनायास प्रवेश करते हैं जैसे स्फटिक मणि में सूर्य की किरणें। इस पंक्ति में उपमा अलङ्कार है उपमा अलंकार का लक्षण साम्यं वाच्यमवैधय वाक्यैक्य उपमा द्वयौः ।

अर्थात्- जहाँ एक ही वाक्य में उपमान और उपमेय रूप दो पदार्थों का वैधर्म्य रहित इवादि वाचक शब्दों द्वारा सादृश्य वर्णित हों वहाँ उपमा अलंकार होता है।

रूपकम् अलंकार लक्षण - "रूपकं रूपितारोपाद्विषमे निरपहावे।" अर्थात् उपमेय के शब्दोपात्त रहेन पर जहाँ उपमेय में उपमान का आरोप होता है वहाँ रुपक अलंकार होता है।

दृष्टान्त अलंकार का लक्षण- "दृष्टान्तस्तु सधर्मस्य वस्तुनः प्रतिबिम्बनम्।
अर्थात् साधारण गुण और क्रिया से युक्त वाक्यार्थों का जहाँ बिम्बप्रतिबिम्ब भाव से स्थापना होता है, वहाँ दृष्टान्त अलंकार होता है। यह साध-वैधर्म्य के भेद से दो प्रकार का होता है।
यमक अलंकार का लक्षण आवृत्तवर्णस्तकं स्तवकन्दाङ्कुरं कवेः । यमकं प्रथमा धुर्यमाधुर्यवचसो विदुः ।।
अर्थात् प्राचीन मधुरभाषी विद्वानों ने कवि के प्रशंसारूप बीज के अङकुरवाले वर्णसमूहों की आवृत्ति को यमक अलंकार माना है।

92. यौवनारम्भे यूनां दृष्टिः प्रायः कीदृशी भवति ?

Correct Answer: (a) रागयुक्ता
Solution:

यौवनारम्भे यूनां दृष्टिः प्रायः रागयुक्ता भवति।
यौवन के आरम्भ में प्रायः युवकों की दृष्टि सफेदी को न छोड़ने के कारण रागयुक्त हो जाती है।
अर्थात् यौवन के आरम्भ में प्रायः बुद्धिशास्त्र रूपी जल द्वारा धुलने से निर्मल पर भी मलिनता को प्राप्त हो जाती है।

युवावस्था में रजोगुण के कारण उत्पन्न भ्रमवाला स्वभाव, पुरुष को अपनी इच्छा से उसी प्रकार बहुत दूर खींच ले जाता है, जिस प्रकार धूलि के चक्कर से युक्त बवंडर सूखे पत्ते को दूर तक लेकर चला जाता है। ठीक उसी प्रकार युवावस्था का सामर्थ्य होता है।

जो युवकों को उनके लक्ष्य से दूर तक लेकर चला जाता है। इन्द्रियरूपी हरिणों को हरने वाली, वह विषयभोगरूपी मृगतृष्णा परिणाम में सदा दुःख देने वाली है। नवयौवन से कसैले अन्तः करण वाले व्यक्ति के मन को वे ही भोगे जाने वाले विषय जल के समान अधिक मधुर प्रतीत होता है।

कुमार्ग की ओर ले जाने वाला दिशाभ्रम की भाँति विषयों में अत्यधिक लगाव पुरुष को नष्ट कर देता है। क्योंकि निर्मल स्फटिक मणि में चन्द्रकिरणों की भाँति निर्मल मन में उपदेशों के गुण आसानी से प्रवेश पा लेते हैं।

93. 'मधुरमराण्यापतन्ति' इत्यत्र 'आपतन्ति' इति क्रियापदस्य कर्तृपदं किमस्ति?

Correct Answer: (b) विषयस्वरूपाणि
Solution:

मधुरतराण्यापतन्ति इत्यत्र “आपतन्ति " इति क्रियापदस्य कर्तृपदं विषयस्वरूपाणि अस्ति।
यहाँ आपतन्ति इस क्रिया पद का कर्ता "विषयस्वरूपाणि" है।
कादम्बरी के शुकनाशोपदेश से यह विषय गृहीत है।
विषयस्वरूपाणि आस्वाद्यमानानि मधुरतराणि आपतन्ति मनसः-
आस्वद्यमान विषयों के स्वरूप मन को मधुरतर प्रतीत होते हैं।
यहाँ कर्ता "विषय स्वरूपाणि" है।

94. 'दिमोह इवोन्मार्गप्रवर्तकः इत्यत्र उन्मार्गप्रवर्तकः कः ?

Correct Answer: (d) अत्यधिकानुरागः
Solution:

दि‌मोह इवोन्मार्गप्रवर्तकः इत्यत्र उन्मार्गप्रवर्तकः अत्यधिकानुरागः।
अर्थात् दिग्भ्रम की तरह कुपथ पर चलाने वाली विषयों की अत्यन्त आसक्ति मनुष्य को निनष्ट कर देती है। नव यौवन द्वारा परिवर्तित (अर्थात् राग द्वेषादि से युक्त किये हुए) मन को जल की भाँति वे हि भोग्य वस्तुएँ आस्वादित होने पर मधुर प्रतीत होता है उसी तरह भोग्य वस्तुएँ मधुर न होने पर भी अनुरक्त मन को मधुर लगती है।

95. प्रकृतिः कमतिदूरम् अपहरति ?

Correct Answer: (c) पुरुषम्
Solution:

प्रकृतिः पुरुषमतिदूरम् अपहरति।
अर्थात् प्रकृति पुरुष को उसी प्रकार अपनी इच्छा से अत्यन्त दूर अर्थात् (विवेक से परे वात्या पक्ष में सुदूर स्थान में) खींच ले जाती है। जैसे वात्या बवंडर सूखे पत्ते को।
उपरोक्त पंक्ति 'कादम्बरी' के प्रकरण शुकनासोपदेश से ली गयी है। कादम्बरी के रचयिता बाणभट्ट हैं।

96. अनुमितौ व्याप्तिज्ञानं भवति -

Correct Answer: (c) करणम्
Solution:

अनुमितौ व्याप्ति ज्ञानं करणेन भवति । अर्थात् अनुभिति में व्याप्ति ज्ञान करण से होता है। न्याय दर्शन में चार प्रमाण माने गये हैं।
1. प्रत्यक्ष 2. अनुमान 3. उपमान 4. शब्द
करण तीन प्रकार के होते हैं।
1. इन्द्रिय 2. इन्द्रियार्थ 3. ज्ञान।
ये फल के भेद से यह करण तीन प्रकार का होता है।

97. अनुमितौ कः व्यापारः ?

Correct Answer: (c) परामर्शः
Solution:

अनुमितौ परामर्शः व्यापारः अर्थात् अनुमिति में परामर्श व्यापार है। न्याय दर्शन का दूसरा प्रमाण अनुमान प्रमाण है। 'लिङ्ग परामर्शोऽनुमानम्” लिङ्ग परामर्श को अनुमान कहते है।

"तस्यतृतीय ज्ञानं परामर्शः” उस लिङ्ग का तृतीय ज्ञान परामर्श कहा जाता है यथा, प्रथम तो पाकशाला आदि में बार-बार धूम को देखता हुआ अग्नि को देखता है। इस बार-दर्शन में धूम और अग्नि के स्वाभाविक सम्बन्ध का निश्चय करता है। यही परामर्श है।

98. व्याप्तिस्मरणस्य स्वरूपं भवति-

Correct Answer: (d) धूमो वह्निव्याप्यः
Solution:

व्याप्तिस्मरणस्य स्वरूपं धूमोवह्रियाप्यः भवति । अर्थात् व्याप्ति स्मरण का स्वरूप है आग धंये से व्याप्त है। व्याप्ति का तात्पर्य होता है "एक के होने पर दूसरे का होना” “यत्र यत्र धूमः तत्र वह्निः"

जहाँ जहाँ धूआँ है वहाँ वहाँ आग है। धूयें के होने पर आग का होना निश्चित है। यही साहचर्य नियम व्याप्ति कहा जाता है। व्याप्ति के बल से जिनका स्वरूप प्रकट होता है उसे लिङ्ग कहते हैं।

99. परामर्शस्य स्वरूपमस्ति-

Correct Answer: (c) वह्निव्याप्यधूमवानयम्' इति ज्ञानम्
Solution:

परामर्शस्य स्वरूपम्
"वह्निव्याप्यधूमवानयम्" इति ज्ञानम् अस्ति। अर्थात् परामर्श का स्वरूप है। धूम से युक्त यह पर्वत अग्नियान है। यह परामर्श का स्वरूप है। व्याप्ति बल से कराया जाने वाला ज्ञानकरण तृतीय परामर्श कहा जाता है।

100. पर्वतो वह्निमानिति ज्ञानं कथ्यते-

Correct Answer: (a) अनुमितिः
Solution:

पर्वतो वह्निमान् इति ज्ञानं अनुमितिः कथ्यते। पर्वत वह्नि से युक्त है यह ज्ञान अनुमिति कहलाता है। 'जहाँ धूम होता है, वहाँ अग्नि होती है 'अनुमान के द्वारा जो इस प्रकार की अनुमिति अभीष्ट है

कि यहाँ पर्वत में अग्नि है। यह तृतीय लिङ्ग ज्ञान ही लिङ्ग परामर्श कहलाता है। इससे 'यहाँ पर्वत में अग्नि है" इस प्रकार की अनुमिति होती है। अतः यह अनुमिति का कारण है और अनुमिति का करण ही अनुमान कहलाता है।