यूजीसी NTA नेट जेआरएफ परीक्षा, जून 2023 (संस्कृत)

Total Questions: 100

11. कौटिलीयेऽर्थशास्त्रे कति अधिकरणानि ?

Correct Answer: (d) पञ्चदश
Solution:

कोटिलीयेऽर्थशास्त्रे 'पञ्चदश' अधिकरणानि सन्ति । अर्थात् कौटिल्य विरचित अर्थशास्त्र में पन्द्रह अधिकरण हैं और 150 अध्याय हैं।

क्रमअधिकरणनाम
(1)प्रथम अधिकरणविनयाधिकारिक
(2)द्वितीय अधिकरणअध्यक्ष प्रचार
(3)तृतीय अधिकरणधर्मस्थीय
(4)चतुर्थ अधिकरणकण्टक शोधन
(5)पञ्चम् अधिकरणयोगवृत्त
(6)षष्ठम् अधिकरणमण्डलयोनि
(7)सप्तम् अधिकरणषाड्गुण्य
(8)अष्टम् अधिकरणव्यसनाधिकारिक
(9)नवम् अधिकरणअभियास्यत्कर्म
(10)दशम् अधिकरणसाङ्ग्रामिक
(11)एकादश अधिकरणवृत्तसंघ
(12)द्वादश अधिकरणआबलीयस
(13)त्रयोदश अधिकरणदुर्गलम्भोपाय
(14)चतुर्दश अधिकरणऔपनिषदिक
(15)पंचदश अधिकरणतन्त्रयुक्ति

12. न हि रसादृते कश्चिदर्थः प्रवर्तते इति कस्मिन् ग्रन्थे मूलतः प्राप्यते?

Correct Answer: (b) नाट्यशास्त्रे
Solution:

न हि रसादृते कश्चिदर्थः प्रवर्तते इति 'नाट्यशास्त्रे' ग्रन्थे मूलतः प्राप्यते। अर्थात् रस के बिना किसी अर्थ की प्रतीति नहीं होती है यह भरतमुनि का मत है और नाट्यशास्त्र में उल्लिखित है।

13. प्रश्नानुसारं समुचित मेलने अस्ति।

सूची-Iसूची-II
A. नागानन्दम्I.आख्यायिका
B. विक्रमोर्वशीयम्II.प्रकरणम्
C. हर्षचरितम्III.नाटकम्
D. मृच्छकटिकम्IV.त्रोटकम्
Correct Answer: (b) (A)-(III), (B)-(IV), (C)-(I), (D)-(II)
Solution:

प्रश्नानुसारं समुचित मेलनं अस्ति।

सूची-Iसूची-II
(A) नागानन्दम्(III.)नाटकम्
(B) विक्रमोर्वशीयम्(IV.)त्रोटकम्
(C) हर्षचरितम्(I.)आख्यायिका
(D) मृच्छकटिकम्(II.)प्रकरणम्

(A) नागानन्द नाटक हर्षवर्धन प्रणीत है। इसे प्रतीक नाटक कहा
जाता है।
(B) विक्रमोर्वशीयम् कालिदास की रचना है यह पाँच अंकों का
त्रोटक है।
(C) हर्षचरितम् यह बाणभट्टविरचित आख्यायिका है जो आठ
उच्छ्वासों में विभक्त है।
(D) मृच्छकटिकम्- यह महाकवि शूद्रक वर्णित रूपक का भेद
प्रकरण है यह दश अंडों में विभक्त है। प्राचीन तात्कालिक
समाज के यथार्थ को वर्णित करने वाला प्रथम रूपक है।

14. अधोलिखितान् काव्यशास्त्रकारान् कमेण योजयत-

(A) जगन्नाथः (B) वामनः (C) मम्मट: (D) भामहः
समुचितं विकल्पं चिनुत-

Correct Answer: (c) (D), (B), (C), (A)
Solution:

उपरिलिखितेषु काव्यशास्त्रकाराणां उचित क्रमः अस्ति ।
(D) भामह (B) वामन (C) मम्मट (A) जगन्नाथः
(D) भामह- अलंकार सम्प्रदाय का सबसे पहला ग्रन्थ काव्यालंकार है जिसके रचयिता काव्यशास्त्री भामह है। इन्होंने 38 अलंकारों का प्रतिपादन किया है।
(B) वामन- आचार्य वामन रीतिसम्प्रदाय के प्रवर्तक माने जाते हैं। 'रीतिरात्मा काव्यस्य' इनका सिद्धान्त है।
(C) मम्मट-आचार्य मम्मट ध्वनिवादी आचार्य हैं। ये 'काव्य प्रकाश' ग्रन्थ के प्रणेता है। ये ध्वनि प्रस्थानवादी परमाचार्य हैं।
(A) जगन्नाथः ये 16वीं शती के आचार्य हैं। इनकी रचना रसगंगाधर है इसमें चार आनन हैं। इनका सिद्धान्त है। रमणीयार्थप्रतिपादकः शब्दः काव्यम् ।

15. 'उत्पातेन ज्ञापिते च' इति वार्तिकस्योदाहरणमस्ति

Correct Answer: (c) वाताय कपिला विद्युत्
Solution:

'उत्पातेन ज्ञापिते च' इति वार्तिकस्योदाहरणमस्ति 'वाताय कपिला विद्युत् अस्ति । अर्थात् इस वार्तिक का उदाहरण 'वाताय कपिला विद्युत है। 'मुक्तये हरि भजति' उदाहरण "ताद चतुर्थी वाच्या" वार्तिक का उदाहरण है। 'ब्राह्मणाय हितम्' यहाँ 'हितयोगे च' सूत्र से चतुर्थी विभक्ति है।

16. याज्ञवल्क्यस्मृती व्यवहाराध्यायस्य प्रकरणेषु द्वे प्रकरणे स्तः-

(A) साहसप्रकरणम् (B) दानप्रकरणम् (C) स्त्रातकधर्मप्रकारणाम् (D) ऋणादानप्रकरणम्
उपर्युक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

Correct Answer: (a) A, D केवलम्
Solution:

उपर्युक्तकथनस्यालोके याज्ञवल्क्यस्मृतों व्यवहाराध्यायस्य प्रकरणेषु द्वे प्रकरणी (A) साहसप्रकरणम् (D) ऋणादानप्रकरणम् स्तः। अर्थात् उपर्युक्त कथन के आलोक में याज्ञवल्क्य स्मृति में व्यवहार अध्याय के दो प्रकरण हैं। (A) साहसप्रकरणम् (D) ऋणादानप्रकरणम् याज्ञवल्क्य स्मृति धर्मशास्त्र से सम्बन्धित है।
नोट: NTA ने इस प्रश्न के उत्तर में विकल्प (c) माना है।

17. यथोचितं मेलनं कुरुत-

सूची-I (सूक्त)सूची-II (वेद/ग्रंथ)
A. विवाहसूक्तम्I. ऋग्वेदे
B. नासदीयसूक्तम्II. शुक्लयजुर्वेदे
C. शिवसङ्कल्पसूक्तम्III. शतपथब्राह्मणे
D. वाङ्मनस आख्यानम्IV. अथर्ववेदे
Correct Answer: (b) (A)-(IV), (B)-(I), (C)-(II), (D)-(III)
Solution:

मेलनं कुरुत
विवाहसूक्तम् - अथर्ववेद
नासदीयसूक्तम् - ऋग्वेदे
शिवसङ्कल्पसूक्तम् - शुक्लयजुर्वेदे
वाङ्मनस आख्यानम् - शतपथब्राह्मणे
नासदीयसूक्त ऋग्वेद में प्राप्त होता है जिसमें कुल मंत्र सात तथा ऋषि परमेष्ठी प्रजापति देवता सृष्टि स्थिति प्रलय कर्ता परमात्मा है। यह ऋग्वेद में 10वें मण्डल का 129 वाँ सूक्त है।

शिवसंकल्पसूक्त शुक्लयजुर्वेद की माध्यन्दिनवाजसनेयि संहिता से है जिसमें कुल 6 मंत्र हैं तथा ऋषि याज्ञवल्क्य, देवता मनस् छन्द त्रिष्टुप् हैं। अथर्ववेद का सूक्त विवाहसूक्त है। शतपथब्राह्मण में वाङ्मनस आख्यान प्राप्त होता है।

18. ब्राह्मी लिपिः लिख्यते-

Correct Answer: (b) वामतो दक्षिणम्
Solution:

ब्राह्मी लिपिः वामतो दक्षिणम् लिख्यते । अर्थात् ब्राह्मी लिपि भारत की प्राचीनतम लिपियों में से एक है। इसके प्रयोग के प्राचीन उदाहरण अशोक के अभिलेखों के रूप में उपलब्ध हैं। यह बाएँ से दाएँ लिखी जाती है। ब्राह्मी लिपि के उद्भव के स्वदेशी सिद्धान्त को भी दो भागों में विभक्त किया जाता है

(1) दक्षिणमूल (2) आर्यमूल। अभी तक यह माना जाता था कि ब्राह्मी लिपि का विकास चौथी से तीसरी सदी ईसा पूर्व में मौर्यों ने किया था। पर भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के ताजा उत्खनन से पता चलता है कि तमिलनाडु और श्रीलंका में यह छठी सदी ईसा पूर्व से हि विद्यमान थी।

19. न्यायमतानुसारं प्रमेयेषु परिगणितौ स्तः-

(A) आत्मा (B) संशयः (C) तर्कः (D) बुद्धिः
उपर्युक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

Correct Answer: (a) A, D केवलम्
Solution:

न्यायमतानुसारं प्रमेयेषु परिगणितौ आत्मा, बुद्धिः स्तः । न्यायमत के अनुसार प्रमेयों में परिगणित आत्मा, बुद्धि है। प्रमा का विषय प्रमेय होता है। जिसके 'ज्ञान' से निःश्रेयस (मोक्ष) की प्राप्ति में सहायता प्राप्त होता है। प्रमेय की संख्या 12 हैं- (1) आत्मा (2) शरीर (3) इन्द्रिय (4) अर्थ (5) बुद्धि (6) मन (7) प्रवृत्ति (8) दोष (9) प्रेत्यभाव (10) फल (11) दुःख (12) अपवर्ग।

आत्मा- 'तत्रात्मत्वसामान्यवानात्मा' आत्मत्व जाति (सामान्य) जिसमें रहती है वह आत्मा है। आत्मा देह, इन्द्रिय से भिन्न है, प्रत्येक शरीर में पृथक-पृथक है, विभु और नित्य है। उस आत्मा का मानस प्रत्यक्ष होता है। 'स च मानसप्रत्यक्षः'।

बुद्धि- अर्थप्रकाशो बुद्धिः अर्थ का ज्ञान बुद्धि है। बुद्धि के दो भेदअनुभव तथा स्मरण ।

20. अधस्तनेषु निरुक्तग्रन्थानुसारेण शाकटायनस्य द्वे मते स्तः-

(A) नामाख्यातयोस्तु कर्मोपसंयोगद्योतका भवन्ति ।
(B) इन्द्रियनित्यं वचनम्।
(C) न निर्बद्धा उपसर्गा अर्थान्निराहुः ।
(D) उच्चावचा पदार्था भवन्ति।
उपर्युक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत

Correct Answer: (b) A, C केवलम्
Solution:

निरुक्तग्रन्थानुसारेण शाकटायनस्य द्वे मते स्तः- नामाख्यातयोस्तु कर्मोपसंयोगद्योतका भवन्ति । न निर्बद्धा उपसर्गा अर्थान्निराहुः । अर्थात् निरुक्तग्रन्थ के अनुसार शाकटायन के दो मत है। नाम और आख्यात ।