यूजीसी NTA नेट जेआरएफ परीक्षा, जून 2023 (संस्कृत)

Total Questions: 100

21. ग्वेदप्रातिशाख्यानुसारेण रक्तसंज्ञा कस्य भवति?

Correct Answer: (b) मकारस्य
Solution:

ऋग्वेदप्रातिशाख्यानुसारेण रक्तसंज्ञा 'मकारस्य' भवति । ऋग्वेद प्रातिशाख्य के अनुसार रक्त संज्ञा 'मकार' की होती है। ऋग्वेद प्रातिशाख्यः- यह ऋग्वेद का एकमात्र उपलब्ध प्रातिशाख्य है। इसका सम्बन्ध मुख्यतया ऋग्वेद की शाकल शाखा से है। इसके रचयिता आचार्य शौनक हैं।

इस ग्रन्थ में 18 पटल हैं। प्रथम पटल 'संज्ञा परिभाषा पटल के नाम से प्रसिद्ध 'स्वर, व्यंजन, हस्व, दीर्घ, स्वरभक्ति, रक्त, संयोग, नामि, प्रगृह्य, रेफ आदि अनेक संज्ञाये तथा उनकी परिभाषाएं दी गई है और पदो के स्वरूप का विवेचन किया गया है द्वितीय पटल 'संहिता पटल है

जिसमें पदान्तीय तथा पदादि स्वरवर्णों में होने वाली स्वर सन्धियों का विवेचन है। तृतीय पटल 'स्वर पटल' है जिसमें संहितागत उदात्त, अनुदात्त, स्वरित आदि स्वरों का स्वरूप तथा सन्धिज स्वरों का विचार किया गया है।

शेष पटल में व्यञ्जन सन्धि नातिभाव, विभिन्न अवस्थाओं में हस्व वर्णों के दी भाव, क्रमपाठ, वर्ण से सम्बन्धित विवेचन एवं वर्णों के उच्चारण सम्बन्धी दोषों का विवेचन है। अनुनासिक वर्ण रक्त संज्ञक वर्ण हैं जैसे- ङ, ञ, ण, न और म।

22. कालक्रमेण समुचितं विकल्पं चिनुत-

(A) तत्त्वचिन्तामणिः (B) शब्दशक्तिप्रकाशिका (C) न्यायकुसुमाञ्जलिः (D) दीधितिः
समुचितं विकल्पं चिनुत-

Correct Answer: (b) (C), (A), (D), (B)
Solution:

उपर्युक्त कालक्रमेण समुचितं विकल्पं चिनुत-
न्यायकुसुमाञ्जलिः भारतीय न्यायदर्शन का प्रसिद्ध ग्रन्थ है। जिसके रचयिता उदयनाचार्य है। इसमें आस्तिकता के पक्ष में बहुत सबल तर्क दिये गये हैं। न्यायकुसुमाञ्जलि में पाँच स्तबक (अध्याय) में कुल 73 श्लोक हैं।
→ उदयनाचार्य ने तर्क द्वारा ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध करने का प्रयास किया है। कुसुमांजलि में ईश्वर के अस्तित्व की सिद्धि के लिये निम्नलिखित नौ 'प्रमाण' दिये हैं।

कार्यायोजनधृत्यादेः पदात् प्रत्ययतः श्रुतेः । 
वाक्यात् संख्याविशेषाच्च साध्यो विश्वविदव्ययः ॥

तत्त्वचिन्तामणिः- गंगेश उपाध्याय द्वारा रचित नव्यन्याय का प्रसिद्ध ग्रन्थ है। तत्त्वचिन्तामणि के पश्चात् जितने न्यायग्रन्थ लिखे गए वे सब नव्यन्याय के नाम से प्रख्यात है।

उन्होंने गौतम के मात्र एक सूत्र (प्रत्यक्षानुमानोपमान शब्दाः प्रमाणानि) प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द प्रमाण है। की व्याख्या में इस ग्रन्थ की रचना की है। यह न्याय ग्रन्थ चार खण्डों में विभाजित है- (1) प्रत्यक्षखण्ड (2) अनुमानखण्ड (3) उपमानखण्ड (4) शब्दखण्ड ।

दीधितिः - रघुनाथ शिरोमणि ने तत्त्वचिन्तामणि के गूढ़ रहस्यों को विस्तार से समझाने के लिये दीधिति नाम की टीका लिखी। कालान्तर में दीधिति व्याख्या पर भी गदाधर भट्ट ने एक प्रसिद्ध विस्तृत टीका गदाधरी की रचना की।

शब्दशक्तिप्रकाशिका- शब्दशक्तिप्रकाशिका के लेखक जगदीशतक लङ्कार है।

23. मनुस्मृतेः टीकाकारौ स्तः-

(A) विज्ञानेश्वरः (B) कुल्लूकभट्टः (C)मेधातिथिः (D)विश्वरूपः
उपर्युक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

Correct Answer: (b) B, C केवलम्
Solution:

मनुस्मृतेः टीकाकारौ 'कुल्लूकभट्टः, मेधातिथिः' स्तः । अर्थात् मनुस्मृति के टीकाकार कुल्लूक भट्ट, मेधातिथि हैं। मनुस्मृति हिन्दू धर्म का एक प्राचीन धर्मशास्त्र (स्मृति) है।

मनुस्मृति में कुल 12 अध्याय है, जिनमें धर्मशास्त्र के अत्यावश्यक कुछ विषय संक्षेप में लिखते हैं जिनके न जानने से वर्तमान काल में बड़ी भारी हानि है ये विषय प्रायः धर्मसंहिता नामक निबन्ध ग्रन्थ से लिये गये हैं। भगवान् मनु ने यह धर्म का लक्षण कहा है-

विद्वद्भिः सेवितः सद्धिर्नित्यमद्वेषरागिभिः ।
हृदयेनाभ्यनुज्ञातो यो धर्मस्तं निबोधत ।।
और धर्मशब्द से यहाँ छः प्रकार का धर्म लिया गया है- (1) वर्णधर्म (2) आश्रमधर्म (3) वर्णाश्रमधर्म (4) गुणाधर्म = शास्त्रोक अभिषेक आदि गुणों से युक्त राजा का प्रजापालन (5) निमित्तधर्म प्रायश्चित (6) साधारण धर्म = धृति आदि दश।

24. वाल्मीकिरामायण टीकाकारी स्तः-

(A)नीलकण्ठः (B) रामवर्मा (C) विमलबोधः (D) गोविन्दराजः
उपर्युक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

Correct Answer: (b) B, D केवलम्
Solution:

वाल्मीकिरामायण टीकाकारौ 'रामवर्मा, गोविन्दराजः' स्तः । अर्थात् वाल्मीकि कृत रामायण के टीकाकार रामवर्मा, गोविन्दराज है। रामायण महर्षि वाल्मीकि की कृति है। इसमें सात काण्ड हैं-

क्रमकाव्य का नाम (काण्ड)सर्ग संख्या
(1)बालकाण्ड77 सर्ग
(2)अयोध्याकाण्ड119 सर्ग
(3)अरण्यकाण्ड75 सर्ग
(4)किष्किन्धाकाण्ड67 सर्ग
(5)सुन्दरकाण्ड68 सर्ग
(6)युद्धकाण्ड128 सर्ग
(7)उत्तरकाण्ड111 सर्ग

25. एषु पाठकस्य अन्यतो गुणो वर्तते-

Correct Answer: (a) अक्षरव्यक्तिः
Solution:

एषु पाठकस्य 'अक्षरव्यक्तिः' अन्यतो गुणो वर्तते । अर्थात् पाठक के पाठ में माधुर्य (मधुरता), अक्षरों की सुस्पष्टता पदों का विच्छेदपूर्वक उच्चारण, उचित स्वर, धैर्य (स्थिरता) तथा लय या प्रवाह आवश्य है। पाठक के पुस्तक पढ़ने की कला की ओर इसमें संकेत किया गया है। आज छात्रों में प्रायः इसका अभाव-सा है।

→ माधुर्यमक्षरव्यक्तिः पदच्छेदस्तु सुस्वरः ।
धैर्य लयसमर्थं च षडेते पाठका गुणाः ।
→ उत्तम पाठ के छः गुण होते हैं- (1) माधुर्य (2) स्पष्ट अक्षरोच्चारण (3) पदच्छेद (4) सुस्वर (5) धैर्य तथा लय (6) सम्पन्नता।
→ शीघ्री, गीती, शिरः कम्पी से अधम पाठक के अवगुण है।

26. दशरूपकानुसारेण रूपकाणां भेदकौ स्तः-

(A) वस्तु (B) अलङ्कारः (C) छन्दः (D) नेता
उपर्युक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

Correct Answer: (b) A, D केवलम्
Solution:

दशरूपकानुसारेण रूपकाणां भेदको वस्तु, नेता स्तः । अर्थात् दशरूपक के अनुसार रूपक के भेद वस्तु, नेता है। धनञ्जय कृत दशरूपक के अनुसार रूपक के तीन भेद बताए गये (1) रस (2) नेता (3) वस्तु

संस्कृत नाटकों में वस्तु, नेता, एवं रस इन तत्वों को प्रमुख स्थान दिया गया है। इन्हीं तत्वों के आधार पर रूपकों का विभाजन किया गया है- "वस्तु नेता रसस्तेषां भेदकः" रूपक के दस भेद हैं जिनमें नाटक प्रथम भेद है। जहाँ तक कथावस्तु का सम्बन्ध है, अधिकांश नाटकों की कथावस्तु ऐतिहासिक एवं पौराणिक है।

उक्त तीनों तत्वों में भी रस को सर्वाधिक प्रधानता दी गई है। संस्कृत नाटककारों द्वारा कथावस्तु की यथार्थता की ओर उतना ध्यान नहीं दिया गया है जितना प्रेक्षकों अथवा पाठकों के हृदय में किसी रस विशेष का संचार करने की ओर कवि की सफलता का मानदण्ड रसाभिव्यक्ति का माना गया है।

27. ब्राह्मणं नाम कर्मणस्तन्मन्त्राणां च व्याख्यानग्रन्थः इति कस्य मतमस्ति?

Correct Answer: (a) भट्टभास्करस्य
Solution:

ब्राह्मणं नाम कर्मणस्तन्मन्त्राणां च व्याख्यानग्रन्थः इति 'भट्टभास्करस्य' मतमस्ति। अर्थात् उपर्युक्त कथन ब्राह्मण कर्म और उसके मन्त्रों की व्याख्या भट्टभास्कर के मतानुसार है। भट्ट भास्कर आचार्य सायण के पूर्ववर्ती वेद भाष्यकार थे। इन्होंने कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय संहिता, तैत्तिरीय ब्राह्मण एवं तैत्तिरीय आरण्यक पर भाष्य लिखा है।

इन्होंने अपने भाष्य को 'ज्ञानयज्ञ' नाम दिया है। भट्ट भास्कर उज्जैन के निवासी थे। ये कौशिक गोत्रीय तेलुगू ब्राह्मण थे। इनके शिवोपासक होने का अनुमान किया गया है।

सायण के पूर्ववर्ती भाष्यकार आत्यानन्द ने भी अपने भाष्य में भट्ट भास्कर का उल्लेख किया है। तेरहवीं शताब्दी के विद्वान वेदाचार्य ने अपने 'सुदर्शन मीमांसा' नामक ग्रन्थ में भट्ट भाष्कर का उल्लेख किया है।

28. जैनदर्शने गुणस्थानानां संख्या-

Correct Answer: (c) चतुर्दश
Solution:

जैनदर्शने गुणस्थानानां संख्या चतुर्दश। अर्थात् जैन दर्शन में गुण स्थानों की संख्या चौदह है। जैन दर्शन सबसे प्राचीन भारतीय दर्शन है। इसमें अहिंसा को सर्वोच्च स्थान दिया गया है।

जैन धर्म की मान्यता अनुसार 24 तीर्थकर समय-समय पर संसार चक्र में फसें जीवों के कल्याण के लिए उपदेश देने इस धरती पर आते हैं। लगभग छठी शताब्दी ई.पू. में अन्तिम तीर्थंकर भगवान् महावीर के द्वारा जैन दर्शन का पुनराव्रण हुआ।

मुख्यगुणस्थानअर्थ
दृष्टि या श्रद्धा1. मिथ्यात्वगलत श्रद्धान (सकल अज्ञान)
2. सासादन सम्यक्-दृष्टिसम्यक्त्व का विनाश
3. मिश्र दृष्टिमिश्रित-सही और गलत धारणा
4. अविरत सम्यक्-दृष्टिसंयत रहित सम्यक्त्व
चारित्रिक विकास (सम्यक् चरित्र का प्रारम्भ)5. देश-विरतसम्यक् दर्शन के साथ पाँच पापों का त्याग
6. प्रमत्त संयतप्रमाद सहित महाव्रतों का पालन
7. अप्रमत्त संयतप्रमाद रहित आचरण
8. अपूर्व करणनई सोच गतिविधि
9. अनिवृतिकरणस्थूल मोहनीय कर्म का क्षय, उन्नत सोच-गतिविधि
10. सूक्ष्म-साम्परायलोभ कषाय का अत्यंत सूक्ष्म उदय
11. उपशान्तमोहमोहनीय कर्म का उपशम
12. क्षीणमोहसमस्त मोह का क्षय
13. संयोग केवलीसर्वज्ञता कंपन के साथ
14. अयोग केवलीकेवल ज्ञान बिना किसी भी गतिविधि के

29. कालक्रमानुसारं निम्नलिखिग्रन्थानां क्रमं चिनुत -

(A) महाभाष्यम् (B) परिभाषेन्दुशेखरः (C) प्रौढमनोरमा (D) काशिका
समुचितं विकल्पं चिनुत-

Correct Answer: (c) (A), (D), (C), (B)
Solution:

उपर्युक्त कालक्रमानुसारं समुचितं विकल्प चिनुत।
महाभाष्यम्प- तंजलि ने पाणिनी के अष्टाध्यायी के कुछ चुने हुए सूत्रों पर भाष्य लिखी जिसे व्याकरणमहाभाष्य का नाम दिया (महाभाष्य) व्याकरण महाभाष्य में कात्यायन वार्तिक भी सम्मिलित हैं जो पाणिनी के अष्टाध्यायी पर कात्यायन के भाष्य है।

काशिकावृत्ति- संस्कृत व्याकरण के अध्ययन की दो शाखाएँ हैं- नव्य व्याकरण तथा प्राचीन व्याकरण। काशिकावृत्ति प्राचीन के सूत्रों की वृत्ति (संस्कृत अर्थ) लिखी गयी है। इसके सम्मिलित लेखक जयादित्य और वामन हैं। सिद्धान्तकौमुदी से पहले काशिकावृत्ति बहुत लोकप्रिय थी।

प्रौढमनोरमा- भट्टोजिदीक्षित 17वीं शताब्दी में उत्पन्न संस्कृत वैयाकरण थे जिन्होंने सिद्धान्तकौमुदी की रचना की इनके परिवार में महान विद्वानों ने जन्म लिया भट्टोजि दीक्षित ने प्रक्रिया कौमुदी के आधार पर सिद्धान्तकौमुदी की रचना की। इस ग्रन्थ पर उन्होंने स्वयं प्रौढमनोरमा टीका लिखी उनके पौत्र हरि दीक्षित ने प्रौढमनोरमा पर शब्द रत्न नाम की टीका लिखी।

परिभाषेन्दुशेखर- नागेश भट्ट के द्वारा रचित टीका का नाम परिभाषेन्दुशेखर है। नागेश संस्कृत के नव्य वैयाकरणों में सर्वश्रेष्ठ हैं। इनकी रचनाएं आज भी भारत के कोने-कोन में पढ़ाई जाती है। ये महाराष्ट्र के रहने वाले थे ये भट्टोजि दीक्षित के पौत्र हरिदीक्षित के शिष्य थे। इनके पिता का नाम शिवभट्ट और माता का नाम सती देवी था। नागेश दार्शनिक वैयाकरण है। मौलिक रचनाओं के साथसाथ इनकी प्रौढ टीका रचनाएँ भी पाई जाती है।

जैसे- लघुशब्देन्दुशेखर, बृहच्छब्देन्दुशेखर, लघुमञ्जूषा आदि।

30. ऋग्वेदप्रातिशाख्यानुसारेण अधस्तनेषु सन्ध्यक्षरमस्ति-

Correct Answer: (c) ओ
Solution:

ऋग्वेदप्रातिशाख्यानुसारेण अधस्तनेषु सन्ध्यक्षरम् 'ओ' अस्ति। अर्थात् ऋग्वेद ऋक्प्रातिशाख्यानुसार सन्ध्यक्षर। प्रातिशाख्य शब्द का अर्थ है- प्रत्येक शाखा से सम्बद्ध व्याकरण आदि का बोध कराने वाले ग्रन्थ। चारो वेदों की अनेक शाखाएँ हैं। अतः ऋक्प्रातिशाख्य ग्रन्थों की संख्या भी वेदानुसार अनेक है, प्रातिशाख्य ग्रन्थों का शिक्षा, व्याकरण और छन्द तीनों से साक्षात् सम्बन्ध है।

ऋक्प्रातिशाख्य का महत्व- वेद विश्व साहित्य के प्राचीनतम उपलब्ध ग्रन्थ है। मानव संस्कृत के प्राचीनतम रूप तथा विकास को समझने के लिए वेदों का परिशीलन अपरिहार्य है। संसार में भारत को जो प्राथमिकता प्रतिष्ठा प्राप्त हुई वह वेदों के माध्यम से ही है।

मानव के ज्ञान के लिए और भाषा-विज्ञान की पुष्टि के लिए वेदों का अध्ययन आवश्यक माना जाता है। षड् वेदाङ्गों के मौलिक अनुशीलन मनन एवं पर्यालोचन के बिना वेदों का अध्ययन पूर्ण नहीं माना जा सकता है।

ब्राह्मण काल में आर्यजन गुरुकुल से संहितात्मक वैदिक मन्त्रों का अध्ययन करके उनका स्मरण रखते थे। बाद में जन लोक भाषा का विकास हुआ तो संहितात्मक वैदिक मन्त्रों का अध्ययन करके उनको स्मरण रखते थे।

बाद में जन लोक भाषा का विकास हुआ तो संहितात्मक वैदिक मन्त्रों की भाषा से आर्यजन अपरिचित होने लगे। ऐसी जगह वर्ण स्वर, मात्रा, सन्धि, छन्द आदि के विशिष्ट नियमों के अभाव में वैदिक मन्त्रों का शुद्ध उच्चारण दुरुह सा हो गया।

→ प्रातिशाख्यों में निम्न पाँच ग्रन्थ अधिक महत्वपूर्ण हैं-
(1) ऋग्वेद प्रातिशाख्य (2) तैत्तिरीय प्रातिशाख्य (3) वाजसनेयिप्रातिशाख्य (4) अथर्ववेद प्रातिशाख्य (5) ऋक्तन्त्र
→ ऋग्वेदप्रातिशाख्य के अनुसार वर्ण निम्नवत हैं।
• समानाक्षर आठ होते हैं- अ,आ, ऋ, ऋ, इ, ई, उ,ऊ।
• संध्यक्षर चार होते हैं- ए, ओ, ऐ, औ
• स्वर 12 है इनके क्रम शौनक के अनुसार अ, आ, ऋ, ऋृ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ओ, ऐ, औ
• शौनक लृ, लृ को स्वर नहीं मानते हैं।
• चार अन्तस्थ हैं- य, र, ल, व
• ऊष्म आठ हैं- ह, श, ष, स, अः, × क, × प, अं
• अघोष सात हैं। श, ष, स, अः क, × प अ आदि ।