Solution:ऋग्वेदप्रातिशाख्यानुसारेण अधस्तनेषु सन्ध्यक्षरम् 'ओ' अस्ति। अर्थात् ऋग्वेद ऋक्प्रातिशाख्यानुसार सन्ध्यक्षर। प्रातिशाख्य शब्द का अर्थ है- प्रत्येक शाखा से सम्बद्ध व्याकरण आदि का बोध कराने वाले ग्रन्थ। चारो वेदों की अनेक शाखाएँ हैं। अतः ऋक्प्रातिशाख्य ग्रन्थों की संख्या भी वेदानुसार अनेक है, प्रातिशाख्य ग्रन्थों का शिक्षा, व्याकरण और छन्द तीनों से साक्षात् सम्बन्ध है।
ऋक्प्रातिशाख्य का महत्व- वेद विश्व साहित्य के प्राचीनतम उपलब्ध ग्रन्थ है। मानव संस्कृत के प्राचीनतम रूप तथा विकास को समझने के लिए वेदों का परिशीलन अपरिहार्य है। संसार में भारत को जो प्राथमिकता प्रतिष्ठा प्राप्त हुई वह वेदों के माध्यम से ही है।
मानव के ज्ञान के लिए और भाषा-विज्ञान की पुष्टि के लिए वेदों का अध्ययन आवश्यक माना जाता है। षड् वेदाङ्गों के मौलिक अनुशीलन मनन एवं पर्यालोचन के बिना वेदों का अध्ययन पूर्ण नहीं माना जा सकता है।
ब्राह्मण काल में आर्यजन गुरुकुल से संहितात्मक वैदिक मन्त्रों का अध्ययन करके उनका स्मरण रखते थे। बाद में जन लोक भाषा का विकास हुआ तो संहितात्मक वैदिक मन्त्रों का अध्ययन करके उनको स्मरण रखते थे।
बाद में जन लोक भाषा का विकास हुआ तो संहितात्मक वैदिक मन्त्रों की भाषा से आर्यजन अपरिचित होने लगे। ऐसी जगह वर्ण स्वर, मात्रा, सन्धि, छन्द आदि के विशिष्ट नियमों के अभाव में वैदिक मन्त्रों का शुद्ध उच्चारण दुरुह सा हो गया।
→ प्रातिशाख्यों में निम्न पाँच ग्रन्थ अधिक महत्वपूर्ण हैं-
(1) ऋग्वेद प्रातिशाख्य (2) तैत्तिरीय प्रातिशाख्य (3) वाजसनेयिप्रातिशाख्य (4) अथर्ववेद प्रातिशाख्य (5) ऋक्तन्त्र
→ ऋग्वेदप्रातिशाख्य के अनुसार वर्ण निम्नवत हैं।
• समानाक्षर आठ होते हैं- अ,आ, ऋ, ऋ, इ, ई, उ,ऊ।
• संध्यक्षर चार होते हैं- ए, ओ, ऐ, औ
• स्वर 12 है इनके क्रम शौनक के अनुसार अ, आ, ऋ, ऋृ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ओ, ऐ, औ
• शौनक लृ, लृ को स्वर नहीं मानते हैं।
• चार अन्तस्थ हैं- य, र, ल, व
• ऊष्म आठ हैं- ह, श, ष, स, अः, × क, × प, अं
• अघोष सात हैं। श, ष, स, अः क, × प अ आदि ।