यूजीसी NTA नेट जेआरएफ परीक्षा, जून 2023 (संस्कृत)

Total Questions: 100

31. नाट्यशास्त्रानुसारं नाट्यमण्डपः कतिविधिः भवति?

Correct Answer: (d) त्रिविधः
Solution:

नाट्यशास्त्रानुसारं नाट्यमण्डपः त्रिविधिः भवति। अर्थात् नाट्यशास्त्र के अनुसार नाट्य मण्डप तीन प्रकार के हैं। नाटकों के संबंध में शास्त्रीय जानकारी को नाट्यशास्त्र कहते हैं। नाट्यशास्त्र के रचयिता भरतमुनि हैं। संगीत, नाटक, और अभिनय के सम्पूर्ण ग्रन्थ के रूप में भरतमुनि के नाट्यशास्त्र का आज भी बहुत सम्मान है

उनका मानना है कि नाट्यशास्त्र में केवल नाट्य रचना के नियमों का आकलन नहीं होता बल्कि अभिनेता रंगमंच और प्रेक्षक इन तीनों तत्वों की पूर्ति के साधनों का विवेचन होता है। 36 अध्यायों में भरतमुनि ने रंगमंच, अभिनेता, अभिनय, नृत्यगीतवाय, दर्शक, सम्बन्धित सभी तथ्यों का विवेचन किया है।

उपर्युक् कथन के अनुसार भरतमुनि ने तीन प्रकार के नाट्य मण्डप बताये हैं- (1) विकृष्ट (2) चतुरस्त्र (3) त्रयत्र। इनके भी भेद बताए गये हैं। मंच पर रंगपीठ, रंगशीर्ष, नेपथ्य मन्तवारिणी, जवनिका तिरस्करणी आदि की व्यवस्था एक पूरी प्रस्तुति परिकल्पना को, सौन्दर्य बोध को व्यंजित करती है।

32. अधस्तनेषु निरुक्तग्रन्थानुसारेण उपमार्थको निपातौ स्तः-

(A) परि (B) नु (C) इव (D) च
उपर्युक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

Correct Answer: (b) B, C केवलम्
Solution:

उपर्युक्त निरुक्तग्रन्थानुसारेण उपमार्थकौ निपातौ स्तः 'नु, इव' अस्ति। अर्थात् निरुक्त ग्रन्थ के अनुसार उपमार्थक और निपात नु, और इव है। निरुक्त वैदिक साहित्य के शब्द व्युत्पत्ति का विवेचन है।

यह हिन्दू धर्म के छः वेदांगों में से एक है इस ग्रन्थ के समस्त अध्यायों की संख्या 12 है जो तीन कांडों में विभक्त है। (1) नै टुक काण्ड (2) नैगम काण्ड (3) दैवत कांड उपर्युक्त कथन के अनुसार निपातों की संख्या तीन है।
(1) उपमार्थक निपात यथा इव, न, चित्, नुः।
(2) कर्मोपसंग्रहार्थक निपात, यथा-न, वा, ह।
(3) पद पूरणार्थक निपात यथा नूनम्, खु, हि, अथ।

33. अत्र कथनद्वयमस्ति। एकम् अभिकथनम् (A) अपरञ्च तस्य कारणम् (R) इति ।

अभिकथनम् (A): आपरितोषाद् विदुषां न साधु मन्ये प्रयोगविज्ञानम् ।
कारणम् (R): बलवदपि शिक्षितानाम् आत्मन्यप्रत्ययं चेतः उपर्युक्तम् अभिकथनं कारणश्चाश्रित्य समुचितं विकल्पं चिनुत।

Correct Answer: (a) अभिकथनम् (A) कारणम् (R) उभयं सत्यम् । किन्तु कारणम् (R), अभिकथनम् (A) इतस्य समुचिता व्याख्या अस्ति ।
Solution:

उपर्युक्तम् अभिकथनं कारणश्चाश्रित्य समुचितं विकल्पं चिनुत । (a) अभिकथनम् (A) कारणम् (R) उभयं सत्यम् । किन्तु कारणम् (R), अभिकथनम् (A) इतस्य समुचिता व्याख्या अस्ति।

→ आपरितोषाद् विदुषां न साधु मन्ये प्रयोग विज्ञानम्।
बलवदपि शिक्षितानामात्मन्यप्रत्ययं चेतः ।।

→ विद्वानों के सन्तोष तक (अर्थात् जब तक विद्वान सन्तुष्ट न हो जाये तब तक मैं अपने अभिनयकौशल को ठीक (सफल) नहीं मानता (क्योंकि) अत्यधिक शिक्षित लोगों का भी चित्त (मन) अपने ऊपर विश्वासरहित होता है। अर्थात् वे अपने ज्ञान के विषय में पूर्णतः विश्वस्त नहीं हो पाते हैं।

34. यथोचितं मेलनं कुरुत

सूची-Iसूची-II
A. प्रमाणसमुच्चयःI. धर्मकीर्तिः
B. प्रमाणवार्त्तिकम्II. दिङ्नागः
C. माध्यमिककारिकाIII. शान्तरक्षितः
D. तत्त्वसङ्ग्रहIV. नागार्जुनः
Correct Answer: (b) (A)-(II), (B)-(I), (C)-(IV), (D)-(III)
Solution:

यथोचितं मेलनं कुरुत-

सूची-Iसूची-II
A. साङ्ख्यम्I.दिङ्नागः
B. न्यायःII.धर्मकीर्तिः
C. अद्वैतवेदान्तःIII.नागार्जुनः
D. विशिष्टाद्वैतवेदान्तःIV.शान्तरक्षितः

35. यथोचितं मेलनं कुरुत-

सूची-Iसूची-II
A. दिक्I. त्वक्
B. वायुःII. चक्षुः
C. सूर्यःIII. रसना
D. वरुणःIV. श्रोत्रम्
Correct Answer: (c) (A)-(IV), (B)-(I), (C)-(II), (D)-(III)
Solution:

यथोचितं मेलनं कुरुत

सूची-Iसूची-II
A. दिक्IV. श्रोत्रम्
B. वायुःI. त्वक्
C. सूर्यःII. चक्षुः
D. वरुणःIII. रसना

36. 'पुराणमित्येव न साधु सर्व न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम्' इति अधोलिखितेषु कस्य कवेःउक्ति ?

Correct Answer: (b) कालिदासस्य
Solution:

'पुराणमित्येव न साधु सर्व न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम् इयं सूक्ति कालिदासस्य कवेः उक्ति। अर्थात् उपयुक्त सूक्ति कवि कालिदास के द्वारा यह उक्ति कही गई है। यह सूक्ति वाक्य कालिदास कृत मालविकाग्निमित्रम् में निहित है। मालविकाग्निमित्रम् पाँच अंकों का नाटक है

जिसमें मालवदेश की राजकुमारी मालविका तथा विदिशा के राजा अग्निमित्र का प्रेम और उनके विवाह का वर्णन है वस्तुतः यह नाटक राजमहलों में चलने वाले प्रणय षड्यन्त्रों का उन्मूलक है तथा इसमें नाट्यक्रिया का समग्र सूत्र विदूषक के हाथों में समर्पित है।

यह श्रृंगार रस प्रधान नाटक है और कालिदास की प्रथम नाट्य कृति माना जाता है। कालिदास ने प्रारम्भ में ही सूत्रधार से कहलवाया है-

पुराणमित्येव न साधु सर्व न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम् 
सन्तः परीक्ष्यान्यतरद्भजन्ते मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः ॥
अर्थात् पुरानी होने से ही न तो सभी वस्तुए अच्छी होती है और नयी होने से बुरी तथा हेय। विवेकशील व्यक्ति अपनी बुद्धि से परीक्षा करके श्रेष्ठकर वस्तु को अंगीकार कर लेते हैं। और मुर्ख लोग दूसरों द्वारा बताने पर ग्राह्य अथवा अग्राह्य का निर्णय करते हैं।

37. मनुमते दुर्ग कतिविधिम्?

Correct Answer: (c) षड्विधम्
Solution:

मनुमते दुर्गं षड्विधम् अर्थात् मनु के मतानुसार दुर्ग छः प्रकार के बताए गये हैं। जो निम्नवत् हैं-
(1) धनु दुर्ग - जिसके चारों ओर निर्जल प्रदेश हो ।
(2) मही दुर्ग - जिसके चारों ओर टेढ़ी-मेढ़ी जमीन हो ।
(3) जलदुर्ग - जिसके चारों ओर जल हो ।
(4) वृक्षदुर्ग - जिसके चारों ओर वृक्ष हो।
(5) नरदुर्ग - जिसके चारों ओर सेना हो ।
(6) गिरिदुर्ग - जिसके चारों ओर पहाड़ हो।

धन्वदुर्गं महीदुर्गम् अब्दुर्गं वार्क्षम् एव वा ।
नृदुर्गं गिरिदुर्गं वा समाश्रित्य वसेत् पुरम् ॥

सर्वेण तु प्रयत्नेन गिरिदुर्गं समाश्रयेत्।
एषां हि बाहुगुण्येन गिरिदुर्गं विशिष्टते (7-70-1 मनुस्मृति)

मनुस्मृति और महाभारत दोनों ग्रन्थों में यह बताया गया है कि कोष, सेना, अस्त्र, शिल्पी, ब्राह्मण, वाहन, तृण, जलाशय, अन्न इत्यादि का दुर्ग के भीतर रहना आवश्यक कहा गया है, अग्निपुराण, कल्किपुराण आदि में भी दुर्गों के उपर्युक्त छः भेद बतलाए गए हैं।

38. आचार्यकौटिल्यमते दूतस्य द्वौ प्रकारी स्तः-

(A)शासनहरः (B) बुद्धिमान् (C) परिमितार्थः (D) आहार्यबुद्धिः
उपर्युक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

Correct Answer: (b) A, C केवलम्
Solution:

उपर्युक्तकथनस्यालोके आचार्यकौटिल्यमते 'शासनहरः' परिमितार्थः दूतस्य द्वौ प्रकारी स्तः । अर्थात् उपर्युक्त कथन आचार्य कौटिल्य के मतानुसार "शासनहर एवं परिमितार्थ दूत के अनुसार दूतों की कुल संख्या तीन बताइ गयी है-
(1) निसृष्टार्थ (2) परिमितार्थ (3) शासनहर
कौटिल्य का मत है कि दूत वैध रूप से गुप्तचर है। अतः वह कार्यसिद्धि के लिये अर्थात् अपने स्वामी के लिये किसी रूप को ग्रहण कर सकता है कौटिल्य के अनुसार दूतों के निम्न कार्य है चूंकि दूत राजा के मूल, आँख, कान और नाक के समान होते है

अतः राजा के सन्देश दूसरे राजाओं तक ले जाना तथा उनके सन्देशों का उत्तर लाकर अपने राजा तक पहुंचाना, समय पड़ने पर पराक्रम दिखाना, शत्रु पक्ष के अच्छे लोगों सेनापति, मन्त्री अमात्य आदि को तोड़कर अपने पक्ष में करने का प्रयास करना, शत्रु के मित्रों को उससे विमुख करना और शत्रु देश में रहकर गुप्तचरों के कार्यों का निरीक्षण, पथ प्रदर्शन एवं निर्देशन करना।

दूतों के प्रमुख कर्तव्यों के अन्तर्गत राजा को अपने राज्य का सन्देश देना, सन्धियों का पालन कराने की व्यवस्था करना, मित्र संग्रह तथा शत्रु और शत्रु मित्रों की मण्डली में भेद उत्पन्न करना, गुप्तरूप से दूसरे राजा की नीतियों का ज्ञान करना आदि है।

39. अधस्तनेषु रामायणाश्रिते महाकाव्ये स्तः-

(A) सेतुबन्धः (B) किरातार्जुनीयम् (C) भट्टिकाव्यम् (D) नैषधीयचरितम्
उपर्युक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

Correct Answer: (c) A, C केवलम्
Solution:

उपर्युक्तकथनस्यालोके रामायणाश्रिते 'सेतुबन्धः भट्टिकाव्यम्' महाकाव्ये स्तः। अर्थात् उपर्युक्त कथन के अनुसार रामायणाश्रित 'सेतुबन्ध, भट्टिकाव्यम्' ये दो महाकाव्य बताए गये हैं। सेतुबन्धः- प्राकृत भाषा का एक महाकाव्य है। इसे 'रावणवहो' (रावणवधः) भी कहते हैं।

इस महाकाव्य के रचयिता के रूप में प्रवरसेन का नाम लिया जाता है। प्रवरसेन, वाकाटक राजवंश के वास्तविक संस्थापक थे। सेतुबन्ध की कथा वाल्मीकीय रामायण से ग्रहण की गई है। व्यापक कथा-विस्तार की दृष्टि से आदि रामायण तथा सेतुबन्ध की कथा में मौलिक अन्तर नहीं है।

भट्टिकाव्यः- महाकवि भट्टि द्वारा रचित महाकाव्य है। इसमें भगवान रामचन्द्र की कथा जन्म से लेकर लंकेश्वर रावण के संहार तक वर्णित है। यह महाकाव्य संस्कृत साहित्य के दो महान परम्पराओं रामायण एवं पाणिनीय व्याकरण का मिश्रण होने के नाते कला और विज्ञान का समिश्रण जैसा है।

40. 'अद्वैतसिद्धिः' ग्रन्थः केन विरचितः ?

Correct Answer: (b) मधुसूदनसरस्वतिना
Solution:

'अद्वैतसिद्धिः' 'मधुसूदनसरस्वतिना' ग्रन्थः विरचितः। अर्थात् अद्वैतसिद्धि मधुसूदन सरस्वती के द्वारा विरचित है। अद्वैत सिद्धि ग्रन्थ अद्वैत दर्शन का महत्वपूर्ण ग्रन्थ है। सदानन्द परिब्राजक के द्वारा रचित वेदान्तसार अद्वैत वेदान्त का प्रकरण ग्रन्थ है।