यूजीसी NTA नेट जेआरएफ परीक्षा, जून 2023 (संस्कृत)

Total Questions: 100

61. चित्तवृत्तिषु न परिगण्येते-

(A) विपर्ययः (B) तपः (C) प्रमाणम् (D) स्वाध्यायः
उपर्युक्त कथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

Correct Answer: (c) B, D केवल
Solution:

चित्तवृत्तिषु न परिगण्येते - तपः, स्वाध्यायः।
चित्त्वृत्तियों की संख्या पाँच है- प्रमाणविपर्ययविकल्प निद्रास्मृतयः।
प्रमाण, विपर्यय विकल्प, निद्रा, स्मृति
विपर्यय- 'विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम्' ज्ञेय वस्तु से भिन्न अर्थ में प्रतिष्ठित मिथ्या ज्ञान विपर्यय कहा जाता है। प्रमाण- 'प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि'

62. सामवेदेन सम्बद्धे स्तः-

(A) गोपथब्राह्मणम् (B) देवताध्यायब्राह्मणम् (C) बौधायनधर्मसूत्रम् (D) लाट्यायनश्रोतसूत्रम्
उपर्युक्त कथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

Correct Answer: (b) B, D केवल
Solution:

सामवेदेन सम्बद्धे देवताध्यायब्राह्मणम् लाट्यायन श्रौत्रसूत्रम् स्तः । अर्थात् सामवेद से सम्बद्ध देवताध्याय ब्राह्मण और लाट्यायन श्रौत्रसूत्र हैं। गोपथ ब्राह्मण अथर्व वेद का एक मात्र ब्राह्मण है। बौधायनधर्मसूत्र यजुर्वेद से सम्बद्ध धर्म सूत्र है।

सामवेद से सम्बद्ध ब्राह्मण ग्रन्थ तांड्य ब्राह्मण, षड्विंश ब्राह्मण, सामविधान ब्राह्मण, आर्षेय ब्राह्मण देवताध्याय ब्राह्मण छान्दोग्य ब्राह्मण, संहितोपनिषद, वंश ब्राह्मण आदि। सामवेद से सम्बद्ध श्रौतसूत्रआर्षेय या मशक, द्राह्यायण खादिर आदि। उपर्युक्त कथनानुसार आधोलिखित विकल्पों में समुचित उत्तर B और D हैं।
अतः विकल्प (B) सही है।

63. भाषाविज्ञानदृष्ट्या अर्धस्वरो भवति

Correct Answer: (b) य
Solution:

भाषा विज्ञान की दृष्टि से अर्धस्वर 'य' होता है। अन्तस्थ व्यञ्जन य्, व्, र्, ल् में से प्रथम दो य् और व् अर्धस्वर हैं र् को लुण्ठित या प्रकम्पित तथा ल् को पार्श्विक कहते हैं। अ, इ स्वर है तथा अ: विसर्ग है। अतः विकल्प (b) सही है।

64. अधोनिर्दिष्टेषु 'प्रकृत्यादिभ्य उपसंख्यानम् 'इति वार्तिकस्य उदाहरणे स्तः -

(a) समेनैति  (b) कन्दुकेन क्रीडति (c) द्विचक्रिकया (d) सुखेन याति
उपर्युक्त कथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचिमुत्तरं चिनुत-

 

Correct Answer: (c) A, D केवलम्
Solution:

'प्रकृत्यादिभ्य उपसंख्यानम्' इति वार्तिकस्य उदाहरणे समेनैति सुखेन याति च स्तः । अर्थात् 'प्रकृत्यादिभ्य उपसंख्यानम्' इस वार्तिक के उदाहरण में समेनैति और सुखेन याति हैं। प्रकृत्यादिभ्यउपसंख्यानम् प्रकृति (स्वभाव) आदि क्रिया विशेषण शब्दों में तृतीया विभक्ति होती है।

जैसे- मोहनः सुखेन याति प्रकृत्या गवां पयः मधुरम् आदि। कन्दुकेन क्रीडति, द्विचक्रिकया विद्यालयं गच्छति आदि में साधकतमम् करणम् और कर्तृकरणयोस्तृतीया सूत्र से तृतीया विभक्ति होती है। उपयुक्त कथनानुसार अधोलिखित विकल्पों में समुचित उत्तर Aऔर D दोनों हैं। अतः विकल्प (c) सही है।

65. तर्कभाषायाः टीका 'तर्कभाषाप्रकाशिका' केन विरचिता?

Correct Answer: (e) (*)
Solution:

तर्कभाषायाः टीका 'तर्कभाषाप्रकाशिका' चिन्त्रम्भट्ट विरचिता अर्थात् तर्कभाषा की टीका तर्कभाषाप्रकाशिका चिन्नम्भट्ट के द्वारा रचित है। तर्कभाषाप्रकाशिका टीका के अन्य रचनाकार है। गौरीकान्त, बालभट्ट, वागीशभट्ट । जबकि तर्कभाषा की टीका 'तर्कभाषाप्रकाश' गोवर्धन मिश्र की टीका है।
नोट: NTA ने इस प्रश्न को मूल्यांकन से बाहर कर दिया है।

66. निम्नलिखितेषु कुन्तकानुसारं वक्रतायाः भेदौ न भवतः-

(A) प्रकरणवक्रता (B) रसवक्रता (C) वाक्यवक्रता (D) अर्थविन्यासवक्रता
उपर्युक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

Correct Answer: (b) B, D केवलम्
Solution:

उपयुक्तेषु कुन्तकानुसारं वक्रतायाः भेदौ रसवक्रता अर्थविन्यासवक्रता न भवतः अर्थात् उपर्युक्त कुन्तकानुसार वक्रता के भेद रस वक्रता और अर्थविन्यासवक्रता नहीं होते हैं।

आचार्य कुन्तक वक्रोक्ति सम्प्रदाय के आचार्य है इन्होंने वक्रोक्ति को ही काव्य की आत्मा माना हैं लक्षण शब्दार्थी सहितौ वक्र कवि व्यापार शालिनी। बन्धे व्यवस्थितौ काव्यं तत् विदाह्मादकारिणी ।।

कुन्तक के अनुसार वक्रता-
कविव्यापार वक्रत्वप्रकाशः संभवन्ति षट्।
प्रत्येक बहवो भेदास्तेषां विच्छित्तिशोभिनः ।। 8 ।।
1. वर्ण विन्यास वक्रता 2. पदपूर्वार्धवक्रता 3. पदपरार्ध वक्रता 4. वाक्य वक्रता 5. प्रकरण वक्रता 6. प्रबन्ध वक्रता

67. 'गगनारविन्द सुरभिः अरविन्दत्वात् अत्र कः हेत्वाभासः ?

Correct Answer: (c) आश्रयासिद्धः
Solution:

गगनारविन्दं सुरभिः अरविन्दत्वात्' अत्र आश्रयासिद्धः हेत्वाभास अर्थात् आकाशकमल सुगन्धित है कमल के समान होने से 'यहाँ आश्रयासिद्ध हेत्वाभास है। यस्य हेतोः आश्रयो नावगम्यते स आश्रयासिद्धः यथा गगनारविन्दं सुरभि अरविन्दत्वात्। आकाशकमल सुगन्धित होता है

क्योंकि वह कमल है, सरोवर में उत्पन्न कमल की तरह। यहाँ साध्य सुरभित्व का आश्रय गगनारविन्द की सत्ता ही नहीं है। स्वरूपासिद्ध जिसके पक्ष में हेतु का अभाव होता है। जैसे शब्दा गुणः चाक्षुषत्वात् रूपवत्।' यहाँ 'चाक्षुषत्व' शब्द में नहीं है। क्योंकि शब्द श्रवण से ग्राह्य है।

सत्प्रतिपक्ष- 'यस्य सात्य अभावसाधकं हेत्वन्तरं विद्यते 'स' सत्प्रतिपक्षः यथा- 'शब्दो नित्यः श्रावणत्वाच्छब्दवत' शब्दोऽनित्यः कार्यत्वाद घटवत्। बाधित यस्य साध्याभवः प्रमाणन्तरेण निश्चितः सः बाधितः।
यथा- बहिरनुष्णो द्रव्यत्वात् इति ।
अतः विकल्प (c) सही है।

68. अर्थविस्तारोदाहरणेषु एतो शब्दौ परिगणितौ भवतः -

(A) गवेषणा (B) वेदना (C) प्रवीणः (D) भार्या
उपर्युक्त कथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचिमुत्तरं चिनुत-

Correct Answer: (c) A, C केवलम्
Solution:

अर्थ विस्तारोदाहरणेषु गवेषणा प्रवीणश्च एतो दो शब्दों परिगणितौ भवतः । अर्थात् अर्थविस्तार के उदाहरणों में गवेषणा और प्रवीण ये दो शब्द परिगणित होते हैं। अर्थविस्तार की दिशाएँ-
1. अर्थविस्तार 2. अर्थसंकोच
3. अर्थादेश - I. अर्थोत्कर्ष II. अर्थापकर्ष।
1. अर्थ विस्तार किसी शब्द का मूल अर्थ होता था परन्तु व्यापकता के कारण शब्द के अर्थ में विस्तार होकर अनेकार्थी होने लगा। जैसे- प्रवीण-प्रकृष्टौ वीणायाम्।
जो वीणावादन में प्रवीण होता है परन्तु अर्थ विस्तार होकर किसी भी काम में कुशल हो उसके लिए प्रवीण शब्द प्रयोग किया जाने लगा। गवेषणा गाय को ढूँढ़ने के लिए प्रयुक्त होता था परन्तु अर्थविस्तार होकर किसी भी वस्तु को खोजने के लिए गवेषणा शब्द प्रयुक्त होने लगा।
वेदना-सुख या दुःख के लिए प्रयुक्त होता था परन्तु अर्थसंकोच होकर केवल दुःख के लिए ही प्रयुक्त किया जाता है। भार्या भी अर्थसंकोच का उदाहरण है।
कथनानुसार उपर्युक्त विकल्पों में से समुचित उत्तर Aऔर B है।
अतः विकल्प (c) सही है।

69. अनन्तभट्टविरचितभाष्यस्य नाम किमस्ति?

Correct Answer: (d) पदार्थप्रकाशकः
Solution:

अनन्त भट्ट विरचितभाष्यस्य नाम पदार्थप्रकाशकः अस्ति। अर्थात् अनन्त भट्ट विरचित भाष्य का नाम पदार्थप्रकाशक मातृवेद स्वरप्रकाश तथा पदार्थबोध ये विकल्प असत्य हैं। अतः विकल्प (d) सत्य है।

70. 'विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः' इति रससूत्रे प्रयुक्तस्य 'निष्पत्ति'- शब्दस्य उत्पत्तिरित्यर्थः अधोलिखितेषु केन स्वीकृतः ?

Correct Answer: (c) भट्टलोल्लटेन
Solution:

'विभावानुभावव्यभिचारिसंयोद्रसनिष्पत्तिः' इति रससूत्रे प्रयुक्तस्य 'निष्पत्तिः' - शब्दस्य उत्पत्तिरित्यर्थः उपर्युक्तेषु भट्टलोल्लटेन स्वीकृतः । अर्थात् भरतमुनिरससूत्र में प्रयुक्त 'निष्पत्ति' शब्द का अर्थ उत्पत्ति है यह उपयुक्त में भट्टलोलट ने स्वीकृत किया है।

विभाव, अनुभाव और व्यभिचारि भाव के संयोग से रसनिष्पत्ति होती है। इस निष्पत्ति शब्द के चार व्याख्याकारों ने अपना मत प्रस्तुत किया है-

1. भट्ट लोल्लट- उत्पत्तिवाद ये मीमांसक हैं इन्होंनें निष्पत्ति के स्थान पर उत्पत्ति प्रयोग है।
2. श्री शंकुक- अनुमितिवाद में न्यायवादी है। इन्होंने निष्पत्ति के स्थान पर अनुमिति ।
3. भट्टनायक- मुक्तिवाद सांख्य आचार्य ये निष्पत्ति के स्थान पर भुक्ति ।
4. अभिनवगुप्त- अभिव्यक्तिवाद - ये शैव आचार्य हैं इन्होंने निष्पत्ति के स्थान पर अभिव्यक्ति का प्रयोग किया है।
अतः विकल्प (c) सही है।