यूजीसी NTA नेट जेआरएफ परीक्षा, जून 2023 (संस्कृत)

Total Questions: 100

71. पद्मपुराणे पञ्च खण्डाः सन्ति, क्रमेण योजयत

सूची Iसूची II
A. प्रथमखण्ड:‍I. स्वर्गखण्ड:‍
B. द्वितीयखण्ड:‍II. सृष्टिखण्ड:‍
C. तृतीयखण्ड:‍III. पातालखण्ड:‍
D. चतुर्थखण्ड:‍IV. भूमिखण्ड:‍
Correct Answer: (c) (A)-(II), (B)-(IV), (C)-(I), (D)-(III)
Solution:

पद्मपुराणे पञ्च खण्डाः सन्ति, ते क्रमेण सन्ति-
प्रथमखण्डः - सृष्टिखण्ड, द्वितीयखण्ड:- भूमिखण्ड, तृतीयखण्ड:- स्वर्गखण्ड, चतुर्थखण्ड-पातालखण्ड और पंचमखण्ड-उत्तरकाण्ड पद्म पुराण में 7 खण्ड 697 अध्याय और 55000 श्लोक है।
अतः विकल्प (c) सही है।

72. अधोलिखितं कथनद्वयम् आश्रित्य समुचितम् उत्तरं चिनुत

अभिकथनम् (I) : कलजं न भक्षयेत् इति नित्यकर्म ।
अभिकथनम् (II) : स्वर्गकामो यजेत् इति नैमित्तिककर्म ।
उपर्युक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुप-

Correct Answer: (b) उभये (I) & (II) कथने असत्ये स्तः।
Solution:

उपर्युक्त कथनद्वयम् आश्रित समुचितम् उत्तरं (B) अभिकथनम् (I) कलजं न भक्षयेत् इति नित्यकर्म। अभिकथनम् (II) स्वर्गकामोयजेत् इति नैमित्तिकर्म। उभये कथने असत्ये स्तः ।

अर्थात् उपर्युक्त दो कथनों पर आश्रित समुचित उत्तर (B) है। अभिकथन (I) कलजं न भक्षयेत् इति नित्यकर्म। अभिकथन (II) स्वर्गकामो यजेत् इति नैमित्तिककर्म। ये दोनों कथन असत्य हैं।

स्वर्गकामो यजेत्- स्वर्ग कामी व्यक्ति को यज्ञ करना चाहिए। यह धर्म के रूप में याग का लक्षण है। कल न भक्षयेत्-कलञ्ज नहीं खाना चाहिए यह पुरुष को (कर्मविशेष) मना करने वाला वाक्य निषेध है। विकल्प (B) सही है।

73. मनुस्मृतौ प्रतिपादितान् एतान् विषयान् यथाक्रमं योजयत-

(A) राजधर्मः (B) आपद्धर्मः (C) संस्कारविधिः (D) प्रायश्चित्तम्
समुचितं विकल्पं चिनुत-

Correct Answer: (c) (A), (D), (B), (C)
Solution:

मनुस्मृतौ प्रतिपादितान् एतान् विषयान् यथाक्रमं अस्ति- संस्कार विधिः, राजधर्मः, आपद्धर्मः प्रायश्चिन्तम्।
अर्थात मनुस्मृति में प्रतिपादित विषयों का क्रम यह है-
1. सृष्टि उत्पत्ति एवं धर्मोत्पत्ति विषय
2. संस्कार एवं ब्रह्मचर्याश्रम विषय
3. समावर्तन, विवाह एवं पञ्चयज्ञ विधान
4. गृहस्थान्तरर्गत आजीविका एवं व्रत विषय
5. स्त्री धर्म विषय
6. वानप्रस्थ संन्यासधर्म विषय
7. राजधर्म विषय
8. व्यवहार निर्णय
9. राजधर्मान्तर्गत व्यवहार निर्णय
10. चातुर्वर्ण्य धर्मान्तर्गत वैश्य शूद्र के धर्म एवं चातुर्वर्ण्य धर्म का उपसंहार
11. प्रायश्चित विषय
12. कर्मफल-विधान एवं निःश्रेयस कार्मों का वर्णन
अतः विकल्प (B) सही है।

74. 'वास्तव्यः इत्यत्र वस् धातोः 'तव्यत्'- प्रत्ययः कस्मिन्नेर्थे भवति ?

Correct Answer: (d) कर्तरि
Solution:

'वास्तव्यः' इत्यत्र वस्-धातौ: 'तव्यत्-प्रत्ययः कर्तरि अर्थ भवति । अर्थात् 'वास्तव्यः' यहाँ वस्धातु का तव्यत् प्रत्यय कर्ता अर्थ में होता है।

तव्यत्, तव्य, अनीयर, केलिमर्, यत्, क्यप् और ण्यत् ये सात कृत्य प्रत्यय कर्मवाच्य और भाववाच्य में ही प्रयुक्त होते हैं, कर्तृवाच्य में नहीं। 'तव्यत्तव्यानीयरः' सूत्र से चाहिए अर्थ में तव्यत् तव्य और अनीयर प्रत्यय होता है। वस् धातु से चाहिए अर्थ में तव्यत् प्रत्यय कर्म अर्थ में होता है।

अतः कर्म अर्थ में वास्तव्यः, गन्तव्यः, पठितव्यः आदि तथा भाव अर्थ में नित्य नपुंसकलिङ्में शब्द प्रयुक्त होते हैं-वास्तव्यम्, पठितव्यम् आदि।
Note : यहाँ पर विकल्प (b) सही है परन्तु आयोग ने (d) सही माना है।

75. काव्य लक्षणविचारे स्ववचनविरोधादेवापास्तम्' इति धिया विश्वनाथेन कस्य मतं निराकृतम्?

Correct Answer: (a) आनन्दवर्धनस्य
Solution:

काव्य लक्षणविचारे 'स्ववचनविरोधादेवापास्तम्' इति धिया विश्वनाथेन आनन्दवर्धनस्य मतं निराकृतम्। अर्थात् काव्य लक्षण विचार में 'स्ववचनविरोधादेवापास्तम्' इस बुद्धि विश्वनाथ के द्वारा आनन्दवर्धन के मत का निराकरण किया है। 'अर्थः सहृदयश्लाध्यः काव्यात्मा यो व्यवस्थितः
सहृदयश्लाध्यः काव्यात्मा यो व्यवस्थितः।
वाच्यप्रतीयमानाख्यौ तस्य भेदावुभौ स्मृतौ ।।' इति
अत्र वाच्यात्मत्वं 'काव्यस्यात्मा ध्वनिः' - इति स्ववचननिरोधादेवा- पास्तम्। तत्किं पुनः काव्यमित्युच्यते। अर्थात् सहृदयों से प्रशंसनीय जो अर्थ काव्य की आत्मा के रूप में व्यवस्थित है, उसके वाच्य और प्रतीयमान दो भेद होते हैं।" यहाँ पर वाच्य अर्थ को जो आत्मा मान लिया है

वह उसने पूर्वकथित "काव्य की आत्मा ध्वनि है" इस वचन से विरुद्ध होने से खण्डित हो गया है। अतः 'वाक्यं रसात्मकं काव्यम् सूत्र से रस को ही काव्य की आत्मा माना है।

76. यथाक्रमं भावविकारान् योजयत-

(A) वर्द्धते (B) विपरिणमते (C) अस्ति (D) जायते
समुचितं विकल्पं चिनुत-

Correct Answer: (a) (D), (C), (B), (A)
Solution:

षड्‌भावविकाराः यथाक्रममस्ति-
जायते-अस्ति, विपरिमणमते-वर्द्धते-
अपक्षीयते-विनश्यति ।
षड्भावविकारा भवन्तीति वायणिर्जायतेऽस्ति विपरिणमते वर्द्धनेऽपक्षीयते विनश्यति इति । अर्थात् वार्ष्यायणि के अनुसार छः भावविकार हाते हैं-

1. जायते - पूर्वभावस्यादिमाचष्टे, नापरभावमाचष्टे, न प्रतिषेधति ।
2. अस्ति उत्पन्नस्य सत्त्वस्यावधारणम्।
3. विपरिणमते अप्रच्यवमानस्य तत्त्वद्विकारम् ।
4. वर्द्धते स्वाङ्गाभ्युच्चयं सांयोगिकानां वार्थानां, वर्द्धत विजयेनेति वा वर्द्धत शरीरेणेति वा ।
5. अपक्षीयते - वर्द्धते व्याख्यातः प्रतिलोमम् ।
6. विनश्यति - अपरभावस्यादिमाचष्टे न पूर्वभावमाचष्टे न प्रतिषेधति
अतः विकल्प (A) सही है।

77. अधस्तनेषु भाषाविज्ञानदृष्ट्या संघर्षी ध्वनिः कः?

Correct Answer: (b) श
Solution:

उपर्युक्तेषु भाषाविज्ञानदृष्ट्या संघर्षी ध्वनिः श अस्ति। अर्थात् उपर्युक्त में भाषाविज्ञान की दृष्टि से संघर्षी ध्वनि 'श' है। श, ष, स, ह ये ध्वनियाँ संघर्षी ध्वनि हैं। ट वर्ग स्पर्श सघर्षी ध्वनि है। प्रकम्पित और लुण्ठित तथा ल पार्विक ध्वनियाँ हैं। अतः विकल्प (b) सही है।

78. यथोचितं मेलनं कुरुत-

सूची Iसूची II
A. जिघत्सतिI. यङ्लुगन्तवक्रियापदम्
B. नरीनृत्यतेII. नामधातुक्रियापदम्
C. राजानतिIII. सन्नन्तक्रियापदम्
D. बोभवीतिIV. यङन्तक्रियापदम्
Correct Answer: (c) (A)-(III), (B)-(IV), (C)-(II), (D)-(I)
Solution:

यथोचितं मेलनं अस्ति-
जिघत्सति - सन्नन्तक्रियापदम्
नरीनृत्यते - यङन्तक्रियापदम्
राजानति - नामधातुक्रियापदम्
बोभवीतिति - यङ्गन्तक्रियापदम्
किसी कार्य को करने की इच्छा का अर्थ बताने वाली धातु के आगे सन् प्रत्यय लगाया जाता है। प्रत्यय लगने पर धातु का द्वित्व हो जाता है- पठ + सन् = पठ् + पठ् + सन् पिपठिषति जिघांसति शुश्रूषते आदि क्रिया को बार-बार करने अथवा अतिशय अर्थ बनाने के लिए धातु के आगे यङ् प्रत्यय लगता है। प्रत्यय लगने पर धातु को द्वित्व होता है-
नेनीयते, तातप्यते, पापच्यते, दरीदृश्यते आदि।
किसी सुबन्त (संज्ञा आदि) के अनन्तर जब कोई प्रत्यय जोड़कर धातु बना लेते हैं तब उसे नामधातु कहते है।। जैसे- पुत्र से पुत्रीयति, कृष्णति,लोहितायते, मुण्डयति आदि। अतः विकल्प (c) सही है।

79. ऋग्वेदस्य भाष्यकारः कः?

Correct Answer: (a) स्कन्दस्वामी
Solution:

ऋग्वेदस्य भाष्यकारः स्कन्दस्वामी अस्ति। अर्थात् ऋग्वेद के भाष्यकार स्कन्दस्वामी हैं। ऋग्वेद, के भाष्यकर्ताओं स्कन्दस्वामी, आनन्दतीर्थ, वेङ्कटमाधव, सायण आदि प्रमुख है।। इसमें ऋग्वेद का सबसे प्राचीन भाष्य स्कन्दस्वामी का ही उपलब्ध होता है।

माधव, सामवेद संहिता पर विवरण भाष्य है। भरतस्वामी- सम्पूर्ण सामवेद पर भाष्यलिखे हैं।
गुण मिश्र सामवेद के छान्दोग्य मन्त्रभाष्य पर भाष्य है।
अतः विकल्प (a) सही है।

80. मनुमतानुसारं वर्णितषु राज्ञः षणेषु अन्यतमो विद्यते-

Correct Answer: (c) विग्रह:
Solution:

मनुमतानुसारं वर्णितेषु राज्ञः षणेषु अन्यतमो विग्रह विद्यत्ते। अर्थात् मनु के मतानुसार वर्णित राजा के षाड्गुण्य में दूसरा 'विग्रह' है। मनुस्मृति में वर्णित षाड्गुण्य क्रमशः इस प्रकार हैं-

(1) सन्धि (2)विग्रह (3) यान (4)आसन (5) द्वैधीभाव (6) संश्रय अतः विकल्प (c) सही है।