यूजीसी NTA नेट जेआरएफ परीक्षा, जून 2023 (संस्कृत)

Total Questions: 100

81. काण्वसंहिताया भाष्यकारौ स्तः-

(A) आचार्यसायणः (B) उवटः (C) हलायुधः (D) गोविन्दः
उपर्युक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु समुचितमुत्तरं चिनुत-

Correct Answer: (b) A, C केवलमत्
Solution:

काण्वसंहितायाः भाष्यकारौ आचार्य सायणः हलायुधश्च स्तः। अर्थात् काण्वसंहिता के भाष्यकार आचार्य सायण और हलायुध है।
हलायुध ने काण्वसंहिता पर 'ब्राह्मणसर्वस्व' नामक भाष्य लिखा है। उवट शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिन संहिता पर भाष्य लिखा है।
अतः विकल्प (b) सही है।

82. वेदान्तमते सूक्ष्मशरीरे कति अवयवाः ?

Correct Answer: (c) सप्तदश
Solution:

वेदान्तमते सूक्ष्मशरीरे 'सप्तदश' अवयवाः अर्थात् वेदान्त-वादियों के मत में सूक्ष्मशरीर में सत्रह (17) अवयत है। वेदान्त के अनुसार सूक्ष्मशरीर में पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ और पञ्चकर्मेन्द्रियाँ तथा पञ्चवायु, मन, बुद्धि सम्पूर्ण 17 अवयव हैं।

सूक्ष्मशरीराणि सप्तदशावयवानि लिङ्गशरीराणि। अवयवास्तु ज्ञानेन्द्रिपञ्चकं बुद्धिमनसी कर्मेन्द्रियपञ्च - वायुपञ्चकं चेति।
सूक्ष्मशरीर (17 अवयव)


सूक्ष्मशरीर को लिङ्ग शरीर भी कहते हैं।
"लिङ्गानि च तानि शरीराणि इति लिङ्गशरीराणि"। पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ यह आकाशादि सूक्ष्म भूतों के सात्विक अंशों से क्रमशः अलग-अलग उत्पन्न होते है। बुद्धि- निश्चय करने वाली अन्तःकरण की वृत्ति ही बुद्धि है। मन- विकल्प करने एवं संकल्प करने वाली अन्तःकरण की वृत्ति मन है।

83. प्रभाकरमते कति पदार्थाः?

Correct Answer: (a) अष्टौ
Solution:

प्रभाकरमते अष्टी पदार्थाः ।
प्रभाकर मत में आठ पदार्थ हैं। द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, समवाय, (परतन्त्रता) शक्ति, सादृश्य एवं संख्या। तैत्तिरीय ब्राह्मण, शतपथ ब्राह्मण आदि ग्रन्थ तथा श्रीत सूत्रों की समीक्षा से विदित होता है कि वैदिक वाक्यों में प्रतीयमान विरोध का परिहार करने के लिए ऋषि-महर्षियों ने जो छानबीन की वही विचारधारा मीमांसा के रूप में परिणत हुई। मीमांसा । कर्मकाण्ड विषयक वाक्यों के विरोध का परिहार करती है।

मीमांसा संम्प्रदाय तथा मीमांसा दर्शन का सूत्र के रूप में संकलन भगवान् जैमिनी ने किया है। इसके सम्बन्ध में दो बातें हैं- 1. भगवान् जैमिनि के समय में महर्षियों की जो विचार धारा थी

उसको लेकर किसी को पूर्वपक्ष में किसी को सिद्धान्त के रूप में रखवाकर तथा अपने अभिप्राय को मिलाकर मीमांसा दर्शन बनाया सभी दर्शन शास्त्रों की यही रीति है। 2. ब्रह्मा से लेकर व्यास तक संक्रान्त गुरु परम्परा को जैमिनि ने प्राप्त किया। यह न्यायरत्नाकर में उद्धृत है।

84. यथोचितं मेलनं कुरुत-

सूची Iसूची II
A. परोक्षकृता:‍I. अहं धनानि संजयामि शाश्वत:।
B. प्रत्यक्षकृता:‍II. इन्द्रस्य नु वीर्याणि प्र वोचम्।
C. आध्यात्मिक्य:‍III. इन्द्राय साम गायत।
D. अथापि स्तुतिरेव भवति नाशीर्वाद:‍IV. कण्वा अभि प्रगायत।
Correct Answer: (a) (A)-(III), (B)-(IV), (C)-(I), (D)-(II)
Solution:

उचितं मेलनं कुरुत-
परोक्षकृताः -  इन्द्राय साम गायत ।
प्रत्यक्षकृताः - कण्वा अभि प्रगायत।
आध्यात्मिक्यः - इन्द्राय साम गायत।
अथापि स्तुतिरेव भवति नाशीर्वादः इन्द्रस्य नु वीर्यणि प्रवोचम् मंत्रो के तीन प्रकार होते हैं- 1. अधिभौतिक 2. आधिदैविक 3. आध्यात्मिक अर्थात् तास्त्रिविधा ऋचः- परोक्षकृताः, प्रत्यक्षकृता, आध्यात्मिक्यश्च ।

85. अधस्तनेषु समीचीनं कथनमस्ति-

(a) याज्ञवल्क्यस्मृतौ द्वादशाध्यायायाः सन्ति ।
(b) कौटिल्यमते नवविधाः गूढ़पुरुषाः भवन्ति ।
(c) मनुस्मृतौ अष्टादशविवादपदानि वर्णितानि ।
(d) 'विष्णुसहस्रनामस्तोत्रम्' महाभारतस्य वर्णितमस्ति ।
उपर्युक्तकथनस्यालोके अधोलिखितेषु विकल्पेषु समुचितमुत्तरं चिनुत।

Correct Answer: (b) B, C केवलमत्
Solution:

समीचीनं कथनमस्ति
कौटिल्यमते नवविधाः गूढपुरुषाः भवन्ति ।
मनुस्मृतौ अष्टादशविवादपदानि वर्णितानि ।
कौटिल्यमत में नौ प्रकार के गूढपुरुष हैं।
कापटिकोदास्थितगृहपतिवैदेहकतापसव्यञ्जनान् सत्रितीक्ष्ण रसदभिक्षुकीश्च ।
कापटिक, उदास्थित, गृहपतिक, वैदेहक, तापस, सत्री, तीक्षण, रसद,
और भिक्षुकी आदि अनेक प्रकार के गुप्तचर होते हैं।

86. यथोचितं मेलनं कुरुत-

सूची Iसूची II
A. विज्ञानेश्वर:‍I. वीरमित्रोदय:‍
B. मित्रमिश्र:‍II. अपरार्क:‍
C. अपरादित्य:‍III. मिताक्षरा
D. शूलपाणि:‍IV. दीपकलिका
Correct Answer: (a) (A)-(III), (B)-(I), (C)-(II), (D)-(IV)
Solution:

मेलनं कुरुत

लेखकग्रंथ / टीका
विज्ञानेश्वर:‍मिताक्षरा
मित्रमिश्र:‍वीरमित्रोदय:‍
अपरादित्य:‍अपरार्क:‍
शूलपाणिदीपकलिका

विज्ञानेश्वर की टीका मिताक्षरा है, जो याज्ञवल्क्य स्मृति पर है। जिसकी रचना 11 वीं शताब्दी में हुई। यह ग्रन्थ 'जन्मना' उत्तराधिकार के सिद्धान्त के लिए प्रसिद्ध है।

87. समुद्रगुप्तस्य प्रयागस्तम्भलेखात् ज्ञायते यत् सः आर्यावर्तस्य निम्नाङ्कितसंख्याकान् शासकान् पराजितवान्-

Correct Answer: (c) नव
Solution:

समुद्रगुप्तस्य प्रयागस्तम्भलेखात् ज्ञायते यत् सः आर्यावर्तस्य नव संख्याकान् शासकान् पराजितवान्। समुद्रगुप्त के प्रयागस्तम्भ लेख से ज्ञात होता है कि वह आर्यवर्त को नव शासकों को पराजित किया था।

प्रयागराज के अभिलेखों से पता चलता है कि समुद्रगुप्त ने अपनी विजय यात्रा का प्रारम्भ उत्तर भारत के आर्यावर्त के 9 शासकों को परास्त करने के साथ किया जिसमें नागसेन, अच्युत, गणपति आदि थे।

इन विजयों के द्वारा समुद्र गुप्त ने मध्य प्रदेश या गंगा यमुना दोआब पर अपनी सत्ता स्थापित की उसने इन 9 शासकों का पूर्ण उन्मूलन किया क्योंकि केन्द्रिय प्रदेश के स्पर्धी राज्यों को बिना पूर्णतः परास्त और उन्मूलन किया उसके लिए आगे बढ़ना संभव नहीं था।

समुद्रगुप्त ने अलग-अलग स्थानों पर एरण प्रशस्ति, ताम्र शासन लेख आदि भी खुदवाये थे इस प्रशस्ति के अनुसार समुद्रगुप्त ने अपने साम्राज्य का अच्छा विस्तार किया था।

88. काव्यप्रयोजनानि काव्यप्रकाशानुसारं यथाक्रमं योजयत -

(A) अर्थकृते (B) यशसे (C) व्यवहारविदे (D) शिवेतरक्षतये
समुचितं विकल्पं चिनुत-

Correct Answer: (b) (B), (A), (C), (D)
Solution:

काव्यप्रयोजनानि काव्यप्रकाशानुसारं यथाक्रम
यश से
अर्थकृते
व्यवहारविदे
शिवेतरक्षतये
काव्यप्रकाशानुसार काव्य के प्रयोजन का क्रम है।
काव्यं यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये ।
सद्यः परनिर्वृत्तये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे ।।
मम्मट ने काव्य के छः प्रयोजन बतायें है- यशप्राप्ति, धनप्राप्ति, व्यवहारज्ञान हेतु अमंगल निवारण हेतु, रसानुभूति हेतु तथा उपदेश हेतु।

89. व्याकरणाध्ययनस्य प्रयोजनं यथाक्रमं योजयत-

(A) लघुः (B) आगमः (C) ऊहः (D) रक्षा
समुचितं विकल्पं चिनुत-

Correct Answer: (a) (D), (C), (B), (A)
Solution:

व्याकरणाध्ययनस्य प्रयोजनं यथाक्रमं अर्थात् व्याकरण अध्ययन प्रयोजन का क्रम
अध्ययन प्रयोजन का क्रम - 1. रक्षा 2. ऊह 3.आगम 4. लघु 5. असंन्देह
रक्षोहागमलध्वसंदेहाः प्रयोजनम्।
वेदाङ्ग (वेद के अंश) छः हैं। जिसमें से व्याकरण एक है। संस्कृत भाषा को शुद्ध रूप से जानने के लिए व्याकरण शास्त्र का अध्ययन किया जाता है। अपनी इस विशेषता के कारण ही यह वेद का सर्वप्रमुख अंग माना जाता है। इसके मूलतः पाँच प्रयोजन हैं। रक्षा, ऊह, आगम, लघु और असंहेद।

90. त्वयि दृष्ट एव तस्या निर्वाति मनो भवज्जवलितम्। आलोके हि हिमांशोर्विकसति कुसुमं कुमुद्वत्याः।।

इत्यत्र कोऽङ्कारः ?

Correct Answer: (c) दृष्टान्तः
Solution:

त्वयि दृष्ट एव तस्या निर्वाति मनो भवज्ज्वलितम्। आलोके हि हिमांशोर्विकसति कुसुमं कुमुद्रत्याः ।।
इत्यत्र 'दृष्टान्तः अलंकारः।
दृष्टांतः पुनरेतेषां सर्वेषां प्रतिबिम्बनम् अर्थात् उपमान, उपमेय उनके विशेषण और साधारण धर्म का भिन्न होते हुए भी औपम्य के प्रतिपादनार्थ उपमान वाक्य तथा उपमेय वाक्य में पृथगुपादानरूप बिम्ब प्रतिबिम्ब भाव होने पर दृष्टांत अलंकार होता है।
स्पष्टीकरण - उपरोक्त उदाहरण में नायक चन्द्रमा, नायिका कुमुदिनी, और मन कुसुम का मनोभाव
सन्तप्तत्व तथा सूर्यसंतप्तत्व का निर्वाण और विकास का बिम्ब प्रतिबिम्ब भाव होने के कारण दृष्टान्त अलंकार हुआ है।