यूजीसी NTA नेट जेआरएफ परीक्षा, दिस. 2020/जून 2021 (इतिहास)

Total Questions: 100

41. इब्न बतूता वर्णन करता है कि सुल्तान ने पुरुष गुलामों को मुक्त करने के लिए बुधवार का दिन, महिला गुलामों को मुक्त करने के लिए शुक्रवार का दिन तथा पुरुष गुलामों की शादी महिला गुलामों से कराने के लिए शनिवार का दिन तय किया था। सुल्तान को पहचानिए।

Correct Answer: (c) मुहम्मद बिन तुगलक
Solution:

इब्नबतूता मोरक्को (अफ्रीका) का निवासी था। उसकी प्रसिद्ध रचना/यात्रावृत्तान्त 'किताब-उल-रेहला है, जो अरबी भाषा में लिखा है। उसने 1325 ई. से यात्रा प्रारम्भ की और अन्य देशों से भ्रमण करता हुआ स्थल मार्ग से 12 सितम्बर 1333 को सिन्ध पहुँचा।

मुहम्मद बिन तुगलक (1325 - 1351 ई.) ने इन्हें दिल्ली का काज़ी नियुक्ति किया जो कि 8 वर्षों तक पद पर बने रहे। 1342 ई. में मुहम्मद बिन तुगलक ने इन्हें मंगोल शासक के पास दूत के रूप में चीन भेजने का आदेश भी दिया।

इब्नबतूता ने अपने ग्रन्थ में लिखा है कि “सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक ने पुरूष गुलामों को मुक्त करने के लिए बुधवार का दिन, महिला गुलामों को मुक्त करने के लिए शुक्रवार का दिन तथा पुरूष गुलामों की शादी महिला गुलामों से कराने के लिए शनिवार का दिन तय किया था।"

42. गांधी के सत्याग्रह की अवधारणा के संबंध में निम्न में से कौन से कथन सही हैं ?

(A) गांधी के लिए सत्याग्रह का उद्देश्य पूर्वाग्रह, दुर्भावना, मतांधता, दंभ और स्वार्थपरता की बाधाओं को भेदना था।
(B) गांधी ने सत्याग्रह के प्रभाव को कष्टसाध्य प्रेम के आध्यात्मिक प्रभाव के रूप में समझाया है।
(C) गांधी सत्याग्रह को अपने विरोधी को अपमानित करने का सबसे बड़ा हथियार समझते थे।
(D) गांधी का राजनैतिक यथार्थ बोध उनके नैतिक आदर्शों पर भारी पड़ा और इसके दावे के उलट उनके सत्याग्रह हमेशा शुद्ध रूप से आध्यात्मिके प्रकृति के नहीं रहे।
नीचे दिए गए विकल्पों में सबसे उपयुक्त उत्तर का चयन कीजिए:

Correct Answer: (d) केवल (A), (B) और (D)
Solution:

महात्मा गाँधी (1869 - 1948) भारतीय राजनैतिक मंच 1919 ई. से 1948 ई. तक इस प्रकार छाए रहे कि इस युग को भारतीय इतिहास का गाँधी युग कहा जाता है। गाँधी जी ने अपनी संपूर्ण अहिंसक कार्य पद्धति को सत्याग्रह का नाम दिया। उनके लिए सत्याग्रह का अर्थ सभी प्रकार के अन्याय अत्याचार और शोषण के खिलाफ शुद्ध आत्मबल का प्रयोग करने से था।

निर्भिकता उनके सत्याग्रह के आवश्यक अंग था, उनके अनुसार, “सत्याग्रह और असहयोग गरजने वाले और डींग मारने वालों के अस्त्र नहीं है यह तो आपकी ईमानदारी की कसौटी है।" सत्याग्रह एक प्रतिकार पद्धति ही नहीं है, एक विशिष्ट जीवन पद्धति भी है जिसके मूल में अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, अस्तेय, निर्भयता, ब्रह्मचर्य, सर्वधर्म समभाव आदि एकादश वृत्त है, किन्तु आलोचनात्मक रूप से गाँधी के राजनैतिक यथार्थ बोध उनके नैतिक आदर्शों पर भारी पड़ा और इसके दावे के उलट उनके सत्याग्रह हमेशा शुद्ध रूप से आध्यात्मिक प्रकृति के नहीं रहे।

उनका संवैधानिक प्राधिकरण में अवज्ञा का कोई अच्छा परिणाम नहीं मिला, जो कि समाज विरोधी तत्वों के द्वारा सत्याग्रह के नाम पर सरकार का विरोध करते हैं। आर्थर मोर ने इसे "मानसिक पीड़ा" कहकर इसकी आलोचना की। आलोचकों द्वारा सत्याग्रह के रूप में उपवास को आंतकवाद और राजनीतिक दबाव की संज्ञा दी गयी है। गाँधी जी ने स्वयं कहा था 'कि "सत्याग्रह बड़ा भयानक शस्त्र है इसका प्रयोग बड़ी-सावधानी पूर्वक करनी चाहिए।

" इन आलोचनाओं के बावजूद यह कहा जा सकता है कि इस सिद्धान्त की सफलता प्रयोगकर्ता पर निर्भर करती है। आज व्यक्तिगत स्वार्थों को तिलांजलि देकर इस सिद्धान्त को सफल बनाया जा सकता है। अतः सत्याग्रह का सिद्धान्त गाँधी जी का एक महत्वपूर्ण व्र शाश्वत देन है।

43. बलबन के राजत्व सिद्धांत के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-से कथन सही हैं?

(A) राजत्व पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधित्व है। राजा ईश्वर की प्रतिच्छाया है।
(B) बाहरी मान-मर्यादा और प्रतिष्ठा को राजत्व के लिए अनिवार्य नहीं समझा जाता था।
(C) बलबन ने उच्च कुल और निम्न कुल में पैदाईश के फर्क को बार-बार रेखांकित किया है।
(D) बलबन का विचार था कि ईरानी रिवाज़ों तथा जीवन शैली के अनुकरण की आवश्यकता नहीं थी।
नीचे दिए गए विकल्पों में सबसे उपयुक्त उत्तर का चयन कीजिए:

Correct Answer: (d) केवल (A) और (C)
Solution:

गियासुद्दीन बलबन (1265 - 1287 ई.) दिल्ली सल्तनत में गुलाम वंश (मामलूक वंश) का शासक था। इसका राजत्व सिद्धान्त शक्ति, प्रतिष्ठा और न्याय पर आधारित था जो कि निरकुंश राजत्व की नींव रखी।

राजत्व की प्रतिष्ठा को उच्च सम्मान दिलाने के लिए राजा को धरती पर ईश्वर का प्रतिनिधि 'नियाबते खुदाई' माना तथा मान मर्यादा की दृष्टि से वह केवल पैगम्बर के बाद है। राजा 'जिल्ले अल्लाह' अर्थात ईश्वर का प्रतिबिंब है, उसका हृदय दैवी प्रेरणा व क्रॉन्ति का भंडार है।

ईश्वर उसे राजसी दायित्व की पूर्ति के लिए प्रेरित व निर्देशित करता है। बलबन ने स्वयं को फिरदौसी के शाहनामा में वर्णित तुर्की पौराणिक वीर अफ़रासियाब का वंशज बताया।

कुलहीन व्यक्तियों से न वह व्यक्तिगत संपर्क रखता था न ही उन्हें कोई पद देता था, उसने कहा “जब मैं किसी तुच्छ परिवार का व्यक्ति देखता हूँ तो मेरे शरीर की नाड़ी क्रोध से उत्तेजित हो जाती है।" उसने सिजदा तथा पायबोस जो फारसी परम्परा थी, उसे प्रचलित करवाया।

44. चोरी के लिए वर्णानुसार भिन्न-भिन्न दण्ड-विधान था?

निम्नलिखित में से किसे सर्वाधिक दण्ड दिया जाता था?

Correct Answer: (a) ब्राह्मण
Solution:

मनु स्मृति सबसे प्राचीन स्मृति ग्रन्थ है। मनु ने सप्तांग का सिद्धान्त दिया है,जिसमें स्वामी, मन्त्री, पुर, राष्ट्र, कोष, दण्ड और मित्र है। मनु के अनुसार दण्ड ही राजा है तथा दण्ड 4 प्रकार के होते हैं - 1 धिग्दण्ड 2. वाग्दण्ड 3. धनदण्ड 4. वधदण्ड । मनुस्मृति में 12 अध्याय है आठवें अध्याय में अभियोग की छानबीन, दण्ड देने के नियम, सब प्रकार के अपराधों तथा दण्ड़ों का वर्णन है। प्राचीन भारतीय न्याय और दण्ड व्यवस्था का आधार मनु की न्याय व्यवस्था है। -

अष्टाप तु शुद्रेस्थ स्तेये भवति किल्विषम् ।
षौडशैस्तु वैश्यस्य द्वात्रिंशत्क्षत्रियस्य च ।। (मनु., 8-236)
भावार्थ - यदि चोरी शूद्र, वैश्य या क्षत्रिय करता है तो उन्हें पाप का क्रमशः आठ, सोलह और बत्तीस गुना भागीदार बनना पड़ता है।

ब्राह्मणस्य चतुःषष्टिपूर्ण वापि शतं भवेत ।
द्विगुणा च चतुःषष्टिस्तद्दोषगुण विद्धि सः ।। (मनु.8-237)
भावार्थ - इसी प्रकार चूंकि ब्राह्मण को चोरी के गुण दोष का सर्वाधिक ज्ञान होता है, अतः वह चोरी करता है तो पाप का चौसठ गुना भागीदार बनना पड़ता है। इसीलिए शूद्र को कम तथा ब्राह्मण को सबसे ज्यादा दण्ड मिलता था।

45. लाजाहोम अंश था -

Correct Answer: (b) विवाह अनुष्ठान का
Solution:पाणिग्रहण के पश्चात वधू और वर पूर्व की ओर मुँह करके खड़े हो जाते हैं, फिर वधू अपने भाई से खीलें (भुना हुआ धान) लेकर अग्नि कुण्ड में डालते हुए स्वयं को पति के कुल से जोड़ने के लिए देवताओं से प्रार्थना करती है। इस समय वह देवताओं से अपने पति के आयुष्मान होने तथा पारस्परिक अनुराग बढ़ने की भी कामना करती है। विवाह अनुष्ठान के दौरान किये गये इस क्रिया को 'लाजाहोम संस्कार' कहते हैं।

वाजपेय यज्ञ - राजा अपनी शक्ति के प्रदर्शन के लिए इस यज्ञ का आयोजन करता था। जिसमें रथदौड़ का आयोजन होता था।

पंच महायज्ञ - गृहस्थाश्रम में रहते हुए मनुष्य को पाँच महायज्ञों का भी अनुष्ठान करना पड़ता था। यह यज्ञ लौकिक तथा पारलौकिक सुखशान्ति के लिए आवश्यक था। जो निम्न है ब्रह्म यज्ञ, पित्र यज्ञ, देव यज्ञ, भूत यज्ञ, मनुष्य यज्ञ ।

संन्यास के कर्तव्य - वानप्रस्थ आश्रम के बाद मनुष्य संन्यास आश्रम में पहुँचता है। संन्यासी का मूल लक्ष्य परम पद अर्थात मोक्ष प्राप्त करना है तथा पूर्णतया निर्लिप्त होकर अपना मन परमात्मा के चिन्तन में लगाता हैं। समस्त रागद्वेष, मोहमाया से विरत होकर एकाकी भ्रमण करता है।

46. नीचे दो कथन दिए गए हैं: एक अभिकथन के रूप में लिखित है तो दूसरा उसके कारण के रूप में:

अभिकथन (A) : जून 1857 के अपने एक्ट XIV में कलकत्ता में गवर्नर जनरल की सर्वोच्च परिषद ने विशेष आयोग को 1857 के विद्रोहियों को पकड़ने और दंडित करने का असाधारण अधिकार दिया।
कारण (R) : कॉलेज ऑफ द इंडियन रिवोल्ट (1858) में उस समय के सब जज रहे सर सैयद अहमद खान का प्राथमिक उद्देश्य मुसलमानों की निष्ठा दिखाना था, जिन्हें विद्रोह के बाद के वर्षों में संदेह और नापसंदगी से देखा जाता था।

उपरोक्त कथन के आलोक, नीचे दिए गए विकल्पों में से सबसे उपयुक्त उत्तर का चयन कीजिए :

Correct Answer: (b) (A) और (R) दोनों सत्य हैं, लेकिन (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है
Solution:

आजादी की पहली लड़ाई सन् 1857 की क्रान्ति में लार्ड कैनिंग ने विद्रोह को कुचलने के लिए कई नियम व सैनिक कानून बनाये जिसमें जून 1857 में एक्ट XIV के द्वारा कलकत्ता में गर्वनर जनरल की सर्वोच्च परिषद ने विशेष आयोग 1857 के विद्रोहियों को पकड़ने और दंडित करने का असाधारण अधिकार दिया तथा इसमें सैनिक अधिकारियों को न्यायिक शक्ति प्राप्त हो गई। न केवल पूरे उत्तर भारत में मार्शल ला लागू किया गया,

बल्कि फौजी अफसरों तथा आम अंग्रेजों को भी विद्रोही पर मुकदमा चलाने तथा दंड देने का अधिकार दे दिया गया। कॉलेज ऑफ द इंडियन रिवोल्ट (1858) - (भारतीय विद्रोह के कारण) सर सैय्यद अहमद खाँ (1817 - 1898) ने 1857 के विद्रोह के समय कम्पनी में न्यायिक सेवा में थे, तथा कम्पनी के प्रति पूर्ण राजभक्त बने रहे। 1857 के विद्रोह में सरकार की यह धारणा बनी कि इस षड्यन्त्र में मुसलमान ही उत्तरदायी है।

सर सैय्यद अहमद ने मुसलमानों के दृष्टिकोण को आधुनिक बनाने के लिए अंग्रेजों का सहयोग और उनकी सेवा करने के लिए कहा। इन्होंने पीर मुरीदी प्रथा, दास प्रथा को समाप्त करने का प्रयास किया। तथा अपने विचारों को 'तहजीब-उल-अखलाक' (सभ्यता और नैतिकता) द्वारा प्रचालित किया।

'कुरान पर टीका' के माध्यम से परम्परागत टीकाकारों की आलोचना की। 1875 में अलीगढ़ में मुस्लिम एंग्लोओरिएन्टल स्कूल आरम्भ किया जो बाद में 1920 में अलीगढ़ वि.वि. बना।

अतः अभिकथन (A) तथा कारण (R) दोनों सही है लेकिन (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।

47. वल्लभी में आयोजित जैन सभा की अध्यक्षता किसने की थी ?

Correct Answer: (a) नागार्जु
Solution:

जैनधर्म के प्रथम तीर्थकर ऋषभदेव या आदिनाथ थे। जिनका उल्लेख ऋग्वेद में भी मिलता है। जैन शब्द संस्कृत के 'जिन' शब्द से बना है, जिसका अर्थ 'विजेता (जितेन्द्रिय) हैं। जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकर हुए, 24वें तीर्थकर महावीर स्वामी थे।

पार्श्वनाथ ने चार व्रतों का विधान किया था अंहिसा, सत्य अस्तेय अपरिग्रह परन्तु महावीर स्वामी ने पाँचवा व्रत - 'ब्रह्मचर्य' जोड़ा। 'जैन धर्म की शिक्षाओं को साहित्य में संकलित करने के लिए जैन सभाओं का आयोजन होता था। मुख्यतः दो जैन सभा का आयोजन हुआ था। प्रथम जैन सभा चतुर्थ शताब्दी ई.पू.,पाटलिपुत्र में जिसकी अध्यक्षता स्थूलभद्र ने किया था।

द्वितीय जैन सभा 513 या 526 ई., वल्लभी में इसकी अध्यक्षता - देवर्धिगण या क्षमाश्रमण ने किया था। इसकी अतिरिक्त चौथी- पाँचवी शताब्दियों में मथुरा एवं वल्लभी में जैन संभाएँ बुलायी गयी, जिसमें मथुरा की संगीति के अध्यक्ष खाण्डिल्य (स्कन्दिल) थे, जबकि वल्लभी सभा की अध्यक्षता 'नागार्जुन' ने किया था।

बाहुबलि प्रथम तीर्थकर ऋषभदेव के पुत्र थे। इन्होंने कार्योत्सर्ग मुद्रा में ध्यान किया था तथा उन्हें कैवल्य की प्राप्ति हुई। श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) में गोम्मतेश्वर बाहुबलि की मूर्ति है।

कुन्दकुन्द - ये दिगंबर जैन सम्प्रदाय के प्रसिद्ध आचार्य थे। श्रवणबेलगोला के शिलालेख संख्या-40 के अनुसार इनका दीक्षा कालीन नाम 'पद्यनंदी' था। महावीर स्वामी और गौतम गणधर के पश्चात् 'मंगलाचरण' में मंगल कुन्दकुन्दाय का उल्लेख उनकी श्रमण परम्परा में ख्याति को दर्शाती है।

48. दिल्ली की गद्दी पर रजिया के राज्यारोहण की निम्नलिखत में से कौन सी विशेषताएं थीं?

(A) दिल्ली के लोगों ने दिल्ली सल्तनत के इतिहास में पहली बार अपनी स्वयं की पहल पर उत्तराधिकार के मुद्दे का निर्णय किया। उसके बाद से दिल्ली की जनता का समर्थन रजिया की ताकत का मुख्य स्रोत बना।
(B) उसने लोगों से कहा कि यदि वह उसकी उम्मीदों को पूरा नहीं करती है तो उसे गद्दी से उतार दें, इस प्रकार उसने राज्यारोहण को एक संविदा का रूप दिया।
(C) यह एक महिला को शासक के रूप में स्वीकार करने में तुर्की मानसिकता की मज़बूती को दर्शाता है। नीचे दिए गए विकल्पों में सही उत्तर का चयन कीजिए

Correct Answer: (d) केवल (A), (B) और (C)
Solution:

रज़िया सुल्तान (1236 - 1240 ई.) के विषय में पहली बार दिल्ली की जनता ने उत्तराधिकार के प्रश्न पर स्वंय निर्णय लिया था। उत्तराधिकार के प्रश्न पर इल्तुतमिश ने कहा कि मेरे पुत्र भोग विलास में ग्रस्त है और कोई भी शासन करने योग्य नहीं है।

रज़िया ने पर्दा त्याग दिया पुरूषों के समान कूबा (कोट), कुलाह (टोपी) पहनकर जनता के सामने आने लगी। मिनहाज कहते हैं "3 वर्ष, 6 मास, 6दिन तक शासन किया। सुल्तान रज़िया एक महान शासिका थी। वह बुद्धिमान, न्यायप्रिय, उदारचित्त, प्रजा की शुभ चिंतक, समदृष्ट प्रजापालक व अपनी सेनाओं की नेता थी उसमें सभी बादशाही गुण विद्यमान थे सिवाय नारीत्व के इसी कारण मर्दों की दृष्टि में सब गुण बेकार था" रज़िया के राज्य रोहण में दिल्ली की सेना जनता अधिकारियों का सहयोग था।

उसने जुमा (शुक्रवार) की नमाज में 'लाल वस्त्र (न्याय माँगने का प्रतीक था) धारण करके जनता से सहयोग माँगा था, तथा उसने कहा कि यदि मैं उनके (जनता) के उम्मीदों को नहीं पूरा करती हूँ तो मुझे निःसंकोच दिल्ली की गद्दी से उतार दे। इस प्रकार उसने राज्य रोहण को एक संविदा (अस्थायी) के रूप में दिया।

49. वह सुल्तान जिसे उसकी उदारता के लिए लाख बख्श के नाम से भी जाना जाता था, उसका नाम बताइए :

Correct Answer: (a) कुतुबुद्दीन ऐबक
Solution:

कुतुबुद्दीन ऐबक (1206 - 1210) भारत में तुर्की साम्राज्य का संस्थापक था। वह एक गुलाम था, जिसे मुहम्मद गोरी ने खरीदा था, वह अपनी योग्यता, कुशलता, नेतृत्व से वह, 1192 ई. तराइन के द्वितीय युद्ध के उपरान्त मुहम्मद गोरी द्वारा भारतीय साम्राज्य का शासक नियुक्त हुआ।

हसन निजामी तथा फक्र-एमुदब्बिर जैसे विद्वान उसके दरबार में आश्रय पाते थे। दिल्ली में 'कुब्वत-उल-इस्लाम' तथा अजमेर में 'ढाई दिन का झोपड़ा' नामक मस्जिद बनवायी। मुसलमान लेखकों ने उसकी उदारता के कारण-

'लाखबख्श' कहा गया तथा सुरीले स्वर में कुरान पढ़ने के कारण 'कुरान खाँ' कहा गया। तबकाते नासिरी का लेखक मिन्हाज उससिराज ने ऐबक को 'हातिम द्वितीय' कहा। दिल्ली में कुतुबमीनार का निर्माण शुरू करवाया, लेकिन इसे पूरा इल्तुतमिश ने करवाया।

50. 1232 के ग्वालियर अभियान की स्मृति में एक स्मारकीय सिक्का जारी किया गया। इस पर इल्तुतमिश के अतिरिक्त किसका नाम उत्कीर्ण था ?

Correct Answer: (d) रज़िया सुल्तान
Solution:

इल्तुतमिश (1211 - 1236 ई.) यह इल्बारी जनजाति का तुर्क था। यह ऐबक का दास था। तुर्क अमीरों व सैनिक अधिकारियों ने इसे दिल्ली सल्तनत पर बैठाया। 1229 में बगदाद के खलीफा 'अल-मुस्तसीर बिल्लाह' से 'खिल अत' वैधानिक स्वीकृति व प्रमाण पत्र प्राप्त किया।

1231 ई.में ग्वालियर का घेरा डाला गया और एक वर्ष के कठिन संघर्ष के बाद विजय कर लिया तथा इस अभियान की विजय की स्मृति में सिक्का जारी किया जिसमें इल्तुतमिश और उसकी योग्य पुत्री 'रजिया' सुल्तान का नाम उत्कीर्ण करवाया। जो कि 'उम्मतुल निसवा' के नाम से सिक्कों पर अंकित करवाया।

इल्तुतमिश पहला शासक जिसने शुद्ध अरबी सिक्के जारी किये, चाँदी का टंका 175 ग्रेन का था, उस पर अरबी भाषा में लेख उत्कीर्ण था। आर.पी. त्रिपाठी इल्तुतमिश को दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक मानते है।