Solution:सितम्बर 1599 ई.में लन्दन में कुछ व्यापारियों ने लार्ड मेयर की अध्यक्षता में एक सभा का आयोजन किया। लंदन में व्यापरियों ने पूर्व के देशों के साथ व्यापार करने के आशय से 1599 में एक कम्पनी का गठन किया जिसका नाम "गर्वनर एण्ड कम्पनी ऑफ मर्चेन्ट्स ऑफ लन्दन ट्रेडिंग इन टू द ईस्ट इण्डीज" रखा गया।इंग्लैण्ड की 'महारानी एलिजाबेथ प्रथम' ने 31 दिसम्बर 1600 ई. में एक आज्ञापत्र द्वारा इसे 15 वर्षों के लिए पूर्वी देशों के साथ व्यापार करने का एकाधिकार प्रदान किया।
अंग्रेज 'फ्री ट्रेडर्स' (स्वतंत्र व्यापरियों) और हिग पार्टी जो सत्ता में आई वह कम्पनी के व्यापारिक एकाधिकार के पक्ष में नहीं थे। स्वतंत्र व्यापारी कंपनी के खिलाफ बगावत करने वाली देशी रियासतों के राजाओं के साथ समन्वय स्थापित करके व्यापार करते थे।
औपनिवेशिक काल में भारतीय समाज में मुख्य अंतर्विरोध अभिजात वर्ग (भारतीय तथा ब्रिटिश दोनों) और निचले स्तर की जनता के बीच था। यही कारण है कि औपनिवेशिक स्रोतों ने 1857 के विद्रोह को सेना की बागवत के रूप में दिखाया। सैय्यद अहमद खान का जन्म 17 अक्टूबर 1817 में दिल्ली की 'सदात यानी सैयद' खानदान में हुआ था। 1857 की क्रांति के समय ईस्ट इंडिया कम्पनी के लिए ही काम करते थे। इन्होंने मुरादाबाद में सन् 1858 में आधुनिक मदरसे की स्थापना की, इनके द्वारा साइटिफिक सोसाइटी की स्थापना की गई, यही कारण है कि सैयद अहमद खान ने 1857 के विद्रोह में ब्रिटिश सत्ता के प्रति मुसलमानों की निष्ठा को दिखाया है।
आर.सी. मजूमदार के अनुसार 1857 के असैनिक विद्रोह को स्वतन्त्रता संग्राम तभी कह सकते हैं, यदि हम लोग इसका अर्थ अंग्रेजों के विरुद्ध एक छोटा-सा संघर्ष मान ले परन्तु उस अवस्था में तो पिण्डारियों के अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष अथवा वहाबियों के सिक्खों के विरुद्ध संघर्ष को भी ऐसा ही स्वीकार करना पड़ेगा। इसी कारण आर.सी. मजूमदार 1857 के विद्रोह को 'आजादी की पहली लड़ाई' मानने से इनकार करते हैं।