महावीर स्वामी ने पावा में जैन संघ की स्थापना की थी, जिसमें 11 प्रमुख अनुयायी शामिल थे जो गणधर (गन्धर्व) कहलाए। ये सभी गणधर मगध क्षेत्र के 11 ब्राह्मण थे जिनको पावा में ही दीक्षित किया गया था
इन्द्रभूमि (ये प्रथम गणधर थे), अग्निभूति, वायुभूति, आर्यव्यक्त, सुधर्मन, मण्डिकपुत्र, मौर्यपुत्र, अकम्पित, अचल भ्रात्र, मैत्रेय तथा प्रभास। यही महावीर स्वामी के सर्वप्रथम अनुयायी थे। महाभारत के सभापर्व में शिशुपाल के मुँह से ऐसी बातें कहलवायी गयी है। जिससे कृष्ण क्रोधित हो जाते है और उसकी हत्या कर देते हैं।
विशेष तथ्य
(1) स्याद्वाद बौद्ध धर्म का केन्द्रीय दर्शन नहीं है। गौतम बुद्ध के समान महावीर स्वामी ने भी वेदों की अपौरुषेयता स्वीकार करने से इंकार कर दिया तथा धार्मिक एवं सामाजिक रूढ़ियों और पाखण्डों का विरोध किया। उन्होंने आत्मवादियों तथा नास्तिकों के एकान्तिक मतों को छोड़कर बीच का मार्ग अपनाया जिसे अनेकान्तवाद अथवा स्याद्वाद अथवा सप्तभंगी नय कहा गया है इस सिद्धांत को जैन दर्शन की आधारशिला तथा प्राण कहा जाता है। स्याद्वाद ज्ञान के सापेक्षता का सिद्धांत है।
(2) कौटिल्य राजनीतिशास्त्र का प्रकाश पंडित था और उसने राजशासन के ऊपर अर्थशास्त्र नामक प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना लिखी। यह हिन्दू राजशासन के ऊपर प्राचीनतम उपलब्ध ग्रंथ है।
(3) रामानुजाचार्य (1017 ई.-1137 ई.) पूर्व मध्यकालीन भारत में भक्ति आंदोलन के सर्वप्रथम प्रणेता थे इनका जन्म श्री श्रीपेरूम्बुदुर (काँचीपुरम) में हुआ था। इनके माता-पिता का नाम क्रमशः कान्तीमती व सोमैया (केशव) था। इन्होंने काँचीपुरम में अपना गुरू "यादव प्रकाश" को बनाया और उनसे वेदान्त की शिक्षा ग्रहण की थी। किन्तु छान्दोग्य उपनिषद् की व्याख्या को लेकर इनका गुरू से मतभेद हो गया और इसके बाद इनका सम्पर्क काँचीपुरम के मठाधीश आचार्य काँचीपूर्ण से हुआ। उन्होंने इनका दीक्षा संस्कार कोदण्ड राम मंदिर (वेकंटाचल तिरूपति) में सम्पन्न करवाया। यहाँ से रामानुज को यतिराज की उपाधि प्राप्त हुई। उन्होंने अंतिम रूप से श्रीरंगम मठ के यमुनाचार्य को अपना गुरू बनाया था।