यूजीसी NTA नेट/जेआरएफ परीक्षा, दिस. 2021/जून 2022 (इतिहास) Shift-II

Total Questions: 100

91. निम्नलिखित गद्यांश को सावधानीपूर्वक पढ़िए और उसके बाद पूछे गए प्रश्नों के उत्तर उ दीजिए :

भारतीय एकेश्वरवादी ईश्वर के दिव्यदर्शन को साक्षात्कार कहते हैं अर्थात् ईश्वर को अपने मस्तक की (सामान्य) आँखों से देखना। यह ज्ञात रहे कि ईश्वर का दिव्य दर्शन, चाहे पैगंबरों द्वारा हो,ईश्वर उन्हें शांति दे अथवा पूर्ण दिव्य द्वारा ईश्वर उनकी आत्माओं को पवित्र करें, चाहे इस दुनिया में या अगली दुनिया में, चाहे बाह्य चक्षुओं से या भीतरी चक्षुओं से उस पर संदेह अथवा विवाद नहीं किया जा सकता है और जो ग्रंथ के पुरुष (एहल-ए-किताब) हैं, पूर्ण दिव्य और सभी धर्मों के दृष्टा हैं-

चाहे वे कुरान के मानने वाले हैं,वेदों के बुक ऑफ डेविड के या ओल्ड और न्यू टेस्टामेंट के इमामले में उनकी एक (समान) आस्था है। अब जो ईश्वर को पाने पर विश्वास नहीं करता, वह अपने समुदाय का एक विचारहीन और दृष्टिहीन सदस्य है, कारण यह है कि यदि वह परमपिता सर्वशक्तिमान है तो कैसे उसमें यह शक्ति नहीं है कि वह स्वयं को प्रकट करे।

इस विषय को सुन्नी संप्रदाय के उलेमा द्वारा अधिक स्पष्ट रूप में बताया गया है। परन्तु यदि यह कहा जाता है कि परमपिता (घात-ए-बहत) को पाया जा सकता है यह असंभव है क्योंकि परमपिता परिष्कृत और अनिश्चित है और चूंकि उसे निश्चित नहीं किया जा सकता है वह केवल परिष्कार के आवरण में ही प्रकट है और इसलिए उसे पाया नहीं जा सकता है और ऐसे उसे पाना असंभव है।

और यह सुझाव कि उसे अगली दुनिया में पाया जा सकता है इस दुनिया में नहीं आधारहीन है क्योंकि यदि वह सर्वशक्तिमान है तो उसमें यह शक्ति है कि वह स्वयं को किसी भी तरह से, कहीं भी और किसी भी समय प्रकट करें। (मेरी धारणा है) कि जो उसे यहां (अर्थात् इस दुनिया में) नहीं पा सकता है, वहां (अर्थात् अगली दुनिया में) उसे मुश्किल से ही पाएगा, जैसाकि उसने पवित्र आयत में कहा है 'जो यहां दृष्टिहीन है वह इसके बाद (भी) दृष्टिहीन ही रहेगा'।

मुतजिला और शिया हकीम जो उसे पाने (रुयात) के विरोधी हैं वे इस मामले में एक बड़ी भूल कर रहे हैं क्योंकि अगर उन्होंने मात्र परमपिता को पाने की सामर्थ्य से ही इंकार किया होता, तो फिर भी कुछ औचित्य था, लेकिन रूयात (अर्थात् उसे पाने) के सभी रूपों को नकारना एक बड़ी गलती है।
लेखक के अनुसार, परमपिता को निम्नलिखित में से किस एक रूप को छोड़कर सभी रूपों में पाया जा सकता है। 

Correct Answer: (c) परमपिता के रूप में
Solution:

लेखक के अनुसार यह कहा जाता है कि परमपिता (घात-ए-बहत) को पाया जा सकता है, यह असंभव है, क्योंकि परमपिता परिष्कृत और अनिश्चित है और चूंकि उसे निश्चित नहीं किया जा सकता है, और ऐसे उसे पाना असंभव है।

नोट- लेखक के अनुसार परमपिता को स्वप्न में मानव रूप में, दिव्यदृष्टि आदि विभिन्न रूपों में पाया जा सकता है।

92. दिव्य को पाने को निम्नलिखित में से किसने नकारा है?

Correct Answer: (c) शिया
Solution:

मुतजिला और शिया हकीम जो उसे पाने (ख्याल) के विरोधी है, वे इस मामले में एक बड़ी भूल कर रहे हैं, क्योंकि अगर उन्होंने मात्र परमपिता को पाने की सामर्थ्य से ही इंकार किया होता, तो फिर भी कुछ औचित्य था, लेकिन रूयात (अर्थात उसे पाने) के सभी रूपों को नकारना एक बड़ी गलती है।

93. लेखक निम्नलिखित में से किस विचार के पक्षधर है?

Correct Answer: (b) ईश्वर को इस दुनिया और अगली दुनिया दोनों में पाया जा सकता है।
Solution:

परमपिता को अगली दुनिया में पाया जा सकता है इस दुनिया में नहीं आधारहीन है क्योंकि यदि वह सर्वशक्तिमान है तो उसमें यह शक्ति है कि जो उसे यहाँ (अर्थात इस दुनिया में) नहीं पा सकता है, वहाँ (अर्थात अगली दुनिया में) उसे मुश्किल से ही पाएगा जैसा कि उसने पवित्र आयत में कहा है जो यहा दृष्टिहीन है। वहाँ इसके बाद भी दृष्टिहीन रहेगा अर्थात् लेखक के अनुसार ईश्वर को इस दुनिया और अगली दुनिया दोनों में पाया जा सकता है।

94. ईश्वर की शक्ति निम्नलिखित में से उसकी किस सामर्थ्य से प्रदर्शित होती है?

Correct Answer: (c) प्रकटन
Solution:

यदि ईश्वर सर्वशक्तिमान है तो उसमें यह शक्ति है कि वह स्वयं को किसी भी तरह से कहीं भी और किसी भी समय प्रकट करें।

95. इस गद्यांश में निम्नलिखित में से किस विवाद को उठाया गया है?

Correct Answer: (c) ईश्वर के दिव्य दर्शन के संबंध में इस्लामी अस्वीकृति
Solution:

उपर्युक्त गद्यांश में ईश्वर के दिव्य दर्शन के संबंध में इस्लामी अस्वीकृति का परिचर्चा किया गया है। एकेश्वरवाद के समर्थक ईश्वर के दिव्यदर्शन को साक्षात्कार के रूप में देखते हैं एकेश्वरवादी आस्था के रूप में ईश्वर को दिव्यदर्शन के रूप में चाहे पैगंबर के रूप में हो या ईश्वर के रूप में उनकी आत्माओं को पवित्र करें उस पर कोई विवाद नहीं हो सकता है लेकिन इस्लामी ग्रंथ 'एहल-ए-किताब' की पूर्ण दिव्य और सभी धर्मों में श्रेष्ठ बताया है। इसे सुत्री संप्रदाय के उलेमा ने स्पष्ट बताया है।

96. निम्नलिखित गद्यांश को सावधानीपूर्वक पढ़िए और उसके बाद पूछे गए प्रश्नों के उत्तर उ दीजिए :

"हम पूरब से आए लोग जो इस मंच पर लगातार बैठे हुए हैं, हमें हम पर कृपा करने के अंदाज में बताया गया है कि हमें ईसाई धर्म को स्वीकार कर लेना चाहिए क्योंकि ईसाई देश सर्वाधिक सम्पन्न हैं। हम अपने आस पास देखते हैं और दुनिया में सर्वाधिक सम्पन्न ईसाई देश, इंग्लैण्ड को देखते हैं जो  250000,000 एशिया वासियों की गरदन पर पैर रखकर बैठा है। हम इतिहास में लौट कर देखते हैं कि ईसाई यूरोप की सम्पन्नता स्पेन के साथ शुरू हुई थी। स्पेन की सम्पन्नता मैक्सिको पर आक्रमण के साथ आरंभ हुई थी। ईसाई धर्म ने अपनी संगी- साथियों के गले काट कर सम्पन्नता हासिल की है। हिन्दू इस कीमत पर सम्पन्नता नहीं लेंगे। आज मैं यहां बैठा हूँ और मैने सर्वाधिक असहिष्णुता की बातें सुनी हैं।"
यह वक्तव्य निम्नलिखित में से किस अवसर पर दिया गया था?

Correct Answer: (b) अमरीका की खोज के 400 वर्ष
Solution:

गद्यांश में दिया गया वक्तव्य स्वामी विवेकानन्द के 20 सितम्बर, 1893 में शिकागो की धर्म संसद में दिए गए भाषण शिकागो डेली ट्रिब्यून समाचार पत्र के संस्करण से लिया गया है। उन्होंने अपने भाषण में पूरी दुनिया के सामने भारत को एक मजबूत छवि के साथ पेश किया था।

अमेरिका की खोज क्रिस्टोफर कोलम्बस ने 1492 ई.में की थी। कुछ वर्षों पूर्व यह धारणा थी कि अमेरिका की सभ्यता प्राचीन नहीं है। परन्तु बाद में हुए शोधों से पता चला कि अमेरिका में 2500 ई.पू. से मानव के अवशेष मिलते हैं। यहाँ की छोटी-छोटी विभिन्न संस्कृतियों ने धीरे-धीरे बड़ी सभ्यताओं एवं साम्राज्यों का विकास किया। जिसमें सबसे प्रमुख तीन संस्कृतियाँ थी-
1. मध्य अमेरिका की माया सभ्यता।
2. मध्य अमेरिका की एजटेक सभ्यता।
3. दक्षिण अमेरिका के एण्डीज में इंका सभ्यता ।

97. उल्लिखित वक्तव्य निम्नलिखित में से किसने उद्भुत किया है?

Correct Answer: (b) आर सी मजूमदार
Solution:

प्रश्नयुक्त गद्यांश का उल्लेख डॉ.आर.सी. मजूमदार ने अपनी पुस्तक 'स्वामी विवेकानन्द ए हिस्टोरिकल रिव्यू' में किया है।

98. यह वक्तव्य सम्मेलन के कार्यविवरण में अभिलिखित नहीं है। यह निम्नलिखित में से किसमें प्रकाशित हुआ था?

Correct Answer: (a) शिकागो डेली ट्रिब्यून
Solution:

प्रश्नयुक्त गद्यांश का वक्तव्य स्वामी विवेकानन्द के अमेरिका के शिकागो विश्व धर्म सम्मेलन (11 सितम्बर 1893 से 27 सितम्बर 1893) में सम्मिलित होने पर 19 सितम्बर, 1893 को उनके द्वारा दिये गये भाषण से सम्बन्धित है। जब उन्होंने अपना भाषण प्रस्तुत किया तब उसे सुनकर श्रोता आश्चर्यचकित हो गये। इस भाषण में हिंदू धर्म का समस्त सार तत्व मुखरित हो उठा था।

मूर्तिपूजा की सार्थकता से लेकर अद्वैत ब्रह्म की अनुभूति की यात्रा तक का सारा दार्शनिक विवेचन उनकी वाणी में प्रस्फुटित हो रहा था। यह भाषण काफी लम्बा था जिसे कार्यविवरण में अभिलेखित नहीं किया गया। लेकिन स्थानीय समाचार पत्र शिकागो डेली ट्रिब्यून ने गद्यांश वर्णित वाक्यों को 20 सितम्बर 1893 को प्रकाशित किया था।

इस धर्म सम्मेलन में विश्व के दस धर्मों जुडाइज्म, इस्लाम, बौद्ध, हिंदू, ताओं, कंफ्यूशियस, शिंतों, जरथुस्त्र, कैथोलिक तथा प्योरिटन आदि के प्रतिनिधियों ने भाग लिया था।

99. यह वक्तव्य किसने दिया था?

Correct Answer: (c) स्वामी विवेकानन्द
Solution:

प्रश्नयुक्त गद्यांश का वक्तव्य स्वामी विवेकानन्द ने शिकागो में आयोजित विश्व धर्म सम्मेलन 1893 में दिया था। इसी सम्मेलन में विवेकानन्द ने कहा था कि "वह दिन दूर नहीं है, जब प्रत्येक धर्म की पताका पर यह स्वर्णाक्षरों में लिखा रहेगा सहयोग न कि विरोध, पर भाव ग्रहण न कि पर भाव विनाश, समन्वय और शांति न कि मतभेद और कलह ।" स्वामी विवेकानन्द के इस भाषण से सारे श्रोतागण सम्मोहित हो गए।

100. उल्लिखित वक्तव्य निम्नलिखित में से किसका भाग था?

Correct Answer: (d) हिन्दूवाद पर आलेख
Solution:

नरेन्द्रनाथ जब अपनी नई वेशभूषा में विवेकानन्द बनकर शिकागो धर्म सम्मेलन में भाग लेने के लिए जा रहे थे तब वे अपने अश्रुपूर्ण नेत्रों से भारत माता को निहारते हुए जा रहे थे। इस धर्म सम्मेलन में दुनिया भर के लोगों को भौतिक जगत की समृद्धि से अवगत कराने के लिए आयोजित किया गया था। इस सम्मेलन में विश्व के अधिकांश धर्मों के प्रतिनिधियों को बुलाया गया था। इस धर्म सम्मेलन में जुड़ाइज्म, इस्लाम, बौद्ध, हिंदू, ताओं, कंफ्यूशियस, शितो, जर स्त्र, कैथोलिक तथा प्योरिटन आदि धर्म के प्रतिनिधियों ने भाग लिया था। हिंदू धर्म के प्रतिनिधि के रूप में विवेकानन्द जी सम्मिलित हुए थे जिन्होंने हिन्दूवाद पर लिखित व मौखिक दोनों तरीकों से अपने विचार को सम्मेलन में प्रस्तुत किया था।