Solution:बड़गाँव और अम्बाखेड़ी स्थल से उत्तर हड़प्पाई और गेरुक मृदभांड चरण के बीच अतिव्यापन का पता चलता है। गेरुक मृदभाण्डों की खोज सर्वप्रथम पुराविद् बी.बी. लाल ने 1949 ई. में बिसौली (बदायूँ) तथा राजपुरपरसू (बिजनौर) के पुरास्थलों की खुदाई के दौरान किया था। अम्बाखेड़ी से प्राप्त कतिपय गैरिक मृदभाण्ड प्रागहड़प्पाकालीन मृदभाण्डों जैसे है, एक भाण्ड पर कूबड़दार वृषभ का अंकन है, जो हड़प्पावासियों का पवित्र पशु था।
अम्बाखेड़ी से मिट्टी के बने कूबड़दार वृषभ, गाड़ी के पहिए तथा मृत्पिण्ड भी मिलते हैं जो हड़प्पा जैसे हैं। यज्ञदत्त शर्मा व कृष्णदेव जैसे पुरातत्व इतिहासकारों की मान्यता है कि गेरुक मृदभाण्ड उन लोगों की कृतियाँ हो सकती हैं जो हड़प्पा सभ्यता के पतनोपरान्त उस क्षेत्र में बसे थे। आलमगीरपुर तथा बड़गाँव से प्राप्त मृदभाण्ड जो परवर्ती हड़प्पा संस्कृति के मृदभांडों से प्रभावित हैं। अधिकांश पुराविद इन मृदभाण्डों का समय ईसापूर्व 1300-1200 निर्धारित किया है।