यू.जी.सी./एनटीए नेट जेआरएफ परीक्षा,दिसम्बर 2019 (विधि)

Total Questions: 100

91. संविधान की उद्देशिका संविधान का अभिन्न अंग है। सरकार का लोकतांत्रिक रूप, संघीय ढाचा, राष्ट्र की एकता और अखंडता, सामाजिक न्याय, न्यायिक पुनर्विलोकन संविधान की मूलभूत विशेषताएँ हैं।

अनुच्छेद 356 के सधीन उपप्रमेप के रूप में प्रत्येक राज्य को संविधान के उपबंधों के अनुरूप कार्य करना चाहिए। राज्यपाल या अन्यथा रूप से राष्ट्रपति (मंत्रीपरिषद) की रिपोर्ट प्राप्त होने और इस पर संतुष्ट होने की ऐसी स्थिति पैदा हुई है,

जिसमें राज्य सरकार संविधान के उपबंधों के अनुरूप कार्य नहीं कर रही है, तो उन्हें अनुच्छेद 356 (1) के अधीन उद्घोषणा जारी करने की शक्ति है एवं संविधान के अनुच्छेद 356 (1) के उपखण्ड (ए) से (सी) में विहित शर्तों के अनुसार राष्ट्रपति शासन लागू करते हैं। अनुच्छेद 356 के अधीन शक्तियों का उपयोग असाधारण है

और इसका उपयोग तब करना चाहिए जब अनुच्छेद 356 में विचारित स्थिति लोकतांत्रिक सरकार के बनाए रखने के लिए आवश्यक हो एवं इसका उपयोग राजनीति प्रक्रिया की पंगुता से बचने के लिए किया जाता है।

अच्छे बुरे या उदासीन प्रशासन हेतु एकल या वैयाक्तिक कृत्य जो संविधान का उल्लंघन करते है, आवश्यक नहीं कि वे संविधानिक तंत्र या विशेषताओं की असफलता है तथा ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई हो जिसके राज्य सरकार संविधान के उपबंधों को लागू नहीं कर सकती।

अनुच्छेद 356 के अधीन शक्तिायों का उपयोग किसी भी स्थिति में संघ राज्य में सत्तारूढ़ दल द्वारा राजनीतिक लाभ के लिए नहीं किया जाना चाहिए। इसका प्रयोग अव्यय रूप से सावधानी पूर्वक किया जाना चाहिए। राज्य सरकार संविधान के उपबंधों के अनुसार अत्तरदायी रूप में अपने प्रकार्य का निर्वाह करें।

सामाजिक समायोजन के एक उपकरण के रूप में विधि के शासन को चुना गया है और यह समाज के विविध तबके को जोड़ने जिससे लोगों के बीच बंधुत्व पैदा होगा सामाजिक, धार्मिक, भाषायी या क्षेत्रीय असमानताएं समाप्त होगी,

हेतु अंत विरोधी समाजिक समस्याओं का समाधान होगा। नागरिक जन्म से या अधिवास से होता है और न कि किसी धर्म, जाति, पंथ, क्षेत्र या भाषा के सदस्य के रूप में। पंथ निरपेक्षता के तत्त्व सकारात्मक और नकारात्मक दोनों हैं।

निम्नलिखित में से किस आधार पर संविधान के अनुच्छेद 25 (1) के अधीन धार्मिक स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है? 

Correct Answer: (c) लोक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के आधार पर
Solution:भारतीय संविधान का अनु. 25 अंतःकरण की और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतन्त्रता से सम्बन्धित है। धारा 25(1) के अधीन धार्मिक स्वतन्त्रता पर लोक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के आधार पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है।

92. भारत के संविधान में 'विधि का शासन' की मान्यता दी गई है?

Correct Answer: (a) अनुच्छेद 14 में
Solution:भारत के संविधान में प्रोफेसर डायसी के सिद्धान्त 'विधि के शासन' को अनु. 14 में मान्यता दिया गया है। जिसके अनुसार राज्य, भारत के राज्य क्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा।

93. अनुच्छेद 356 (1) (बी) उपबंध करता है:

Correct Answer: (d) राष्ट्रपति अनुच्छेद 356 (1) के अधीन उद्घोषणा कर सकते हैं कि राज्य के विधायिका की शक्ति का प्रयोग संसद द्वारा या इसके अधीन प्राधिकारी द्वारा किया जाएगा
Solution:भारतीय संविधान का अनु. 356 राज्यों में सांविधानिक तंत्र के विफल हो जाने की दशा में प्रावधान करता है।

धारा 356 (1) (b) यह घोषणा करता है कि राष्ट्रपति अनुच्छेद 356(1) के अधीन उद्घोषणा कर सकते है कि राज्य के विधायिका की शक्ति का प्रयोग संसद द्वारा या इसके अधीन प्राधिकारी द्वारा किया जाएगा।

94. उपयुक्त के संबंध में निम्नलिखित के उत्तर दीजिए:

उच्चतम न्यायालय ने निम्नलिखित में से किस मामले में कहा कि उद्देशिका संविधान का अंग नहीं है।

Correct Answer: (d) र बेरुबरी मामला
Solution:इन रि बेरुबरी के मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह धारित किया कि उद्देशिका संविधान का अंग नहीं है। परन्तु केशवानन्द भारती बनाम केरल राज्य के मामले में यह धारित किया गया कि प्रस्तावना संविधान का अभिन्न अंग है।

95. संविधान का निम्नलिखित में से कौन सा उपबंध संघ पर अध्यारोपित है यह सुनिश्चित करना कि राज्य सरकार संविधान के उपबंधों का पालन कर रही है?

Correct Answer: (b) Aअनुच्छेद 355
Solution:भारतीय संविधान का अनुच्छेद 355 के अनुसार संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह बाहरी आक्रमण और आन्तरिक अशान्ति से प्रत्येक राज्य की संरक्षा करे और प्रत्येक राज्य की सरकार का इस संविधान के उपबंधों के अनुसार चलाया जानी सुनिश्चित करे।

96. मोटे तौर पर विधि के सिद्धांत मे अभिलाक्षणिक विशेषताएं निहित होती है, जो कि विधि और समान विधि प्रणाली और विधि के मूल तत्त्व का विश्लेषण जो इसे विधि बनाता है और जो इसे नियमों के अन्य

रूपों और मानकों से अलग करता है, के लिए आवश्यक हैं तथा जिसे अन्य सामाजिक प्रक्रम के दृष्टि वैद्यानिक प्रणाली के रूप में परिभाषित नहीं किया जा सकता है।

वास्तुतः यह संभव नहीं है कि 'विधि क्या है' का रूढ़ उत्तर दिया जाए और बहुत से प्रश्नों के उत्तर दिए जाए जो इसके मूल प्रकृति के बारे में है। विधि सिद्धांत की प्रकृति को अध्ययन में विधि के विशिष्ट गुण जो अन्य सिद्धांतों के प्रकाश में प्राप्त होते हैं

और विषय पर प्रमुख प्रकटन के संगत गुण और दोष की जाँच निहित होते हैं। इसी क्रम में 'विधि सिद्धांत ' एक छोर पर दर्शन से जुड़ा है, तो दूसरे छोर पर राजनीतिक विचार धारा से जुड़ा है, जो कि इसका द्वितीयक अंग है ... .....

कभी कभी ज्ञान का सिद्धांत और राजनीतिक विचार धारा एक संगत प्रणाली में निहित होती है और निश्चित रूप में यह सच है तक कुछ विधि दाशर्निक पहले दार्शनिक रहे हैं

और संयोगवश विधिवेत्ता बने और अन्य राजनीतिक सर्वप्रथम विधिवेत्ता रहे क्योंकि उन्होंने विधिक रूप में अपने राजनीतिक विचारों को व्यक्त करने के लिए इसकी आवश्यकता महसूस की। संक्षेप में 19वीं शताब्दी से पहले विधि सिद्धांत दर्शन, धर्म, आचार या राजनीति का मुख्य रूप से प्रतिफल है।

विधि दर्शन का अस्तित्व मुख्यतः पेशेवर वकीलों के विधि कार्य का सामाजिक न्याय की समस्या के साथ टकराव से हुआ है। आधुनिक विधिवेत्ता विधि सिद्धांत, जो विद्वान दार्शनिक से किसी मामले में कम नहीं है तथा यह उस परम विश्वास पर आधारित है जो विधि के बाहर से आता है।

किसने न्याय शास्त्र को 'सकारात्मक कानून और औपचारिक विज्ञान'के तौर पर परिभाषित किया है?

Correct Answer: (c) सैलमण्ड
Solution:प्रसिद्ध विधि शास्त्री सामण्ड ने न्याय शास्त्र को सकारात्मक कानून ओर औपचारिक विज्ञान के तौर पर परिभाषित किया है। सामण्ड विश्लेषणात्मक विचारधारा से सम्बन्धित थे।

97. उपर्यक्त के संबंध में निम्नलिखित के उत्तर दीजिए: विधि विज्ञान या दार्शनिक विज्ञान के रूप में निम्नलिखित में से कौन सी पद्धति अस्तित्व में आयी ?

Correct Answer: (b) सामाजिक विधिक पद्धति
Solution:विधि विज्ञान या दार्शनिक विज्ञान के रूप में सामाजिकविधिक पद्धति अस्तित्व में आयी।

98. कानून को समाजिक विज्ञानों, तत्त्व मीमांसा, आचार और नैतिक कारकों से अवश्य मुक्त रहना चाहिए। इस सिद्धांत का प्रतिपादन किसने किया था?

Correct Answer: (c) केल्सेन
Solution:विश्लेषणात्मक विचारधारा के प्रसिद्ध विधिशास्त्री केल्सेन ने यह सिद्धान्त प्रतिपादित किया कि कानून को सामाजिक विज्ञानो, तत्वमीमांसा, आचार और नैतिक कारको से अवश्य मुक्त रहना चाहिए।

99. निम्नलिखित में से किस विधिवेत्ता का कथन है कि "विधि सिद्धांत एक ओर दर्शनशास्त्र से और दूसरी ओर राजनीतिक सिद्धांत से जुड़ा है?

Correct Answer: (b) फ्राइडमैन
Solution:फ्राइडमैन का कथन है कि "विधि सिद्धांत एक ओर दर्शनशास्त्र से और दूसरी ओर राजनीतिक सिद्धांत से जुड़ा है"।

100. विधि परिवर्तन के मार्ग पर निरंतर अग्रसर होता है। यह किसका मूल पाठ है?

Correct Answer: (a) यर्थाथवादी न्यायशास्त्र
Solution:यथार्थवादी न्यायशास्त्र का मूल पाठ यह है कि विधि परिवर्तन के मार्ग पर निरंतर अग्रसर होता है। इस शाखा के प्रसिद्ध विधिशास्त्री ओ. डब्ल्यू. होम्स तथा जेरोम फ्रेंक हैं।