की बाध्यकारिकारक शक्तियों को स्पष्ट करने में समस्या उत्पन्न करता है और इसके फलस्वरूप सभी विधियों की प्राधिकारिता पर प्रश्न चिह्न लग जाता है। कुछ लेखकों ने, अंतरराष्ट्रीय विधि की बाध्यकारी प्रवृत्ति प्राकृतिक विधि से व्युत्पत्तित होती है,
के द्वारा इस दर्शाने का प्रयास किया है। किन्तु हमने देखा है कि प्राकृतिक विधि नैतिकता से अधिक कुछ भी नहीं है और नैतिक नियमों की विद्यमानता सदृश विधिक नियमों की विद्यमानता की कोई गारंटी नहीं है।
इस प्रकार का तर्क अधिक से अधिक यह दर्शाता है कि अंतरराष्ट्रीय विधि के नियम नैतिक रूप से बाध्यकारी हैं, न कि विधिक रूप से बाध्यकारी। तथापि बहुत से विधिक नियम नैतिक रूप से विरक्त है, नैतिकता में कतिपय नियम आदर्शवादिता से परे भी हो सकते हैं।
इसी प्रकार का मामला वसीयत, संविदा और हस्तातरण पत्र इत्यादि राष्ट्रीय विधियों संबंधी औपचारिकताओं के मामले में है, और अंतरराष्ट्रीय विधि में सीमाक्षेत्र का टाइटल और कार्यक्षेत्र की सीमा संबंधी कतिपय नियमों में भी है।
इस प्रकार के नियमों की बाध्यकारिता का शायद ही किसी नैतिक मानदण्ड पर गुणारोपित किया जा सकता है।
निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही नहीं है :
Correct Answer: (d) सकारात्मक विचारधारा के अनुसार संधियों और स्वयं सहायता को विधायन एवं विधिप्रवर्तन के रूप में रखा जा सकता है।
Solution:केल्सन के दृष्टिकोण से, कानून की विशिष्ट विशेषता यह है कि यह एक बल युक्त आदेश है जो विधि की शास्ति से जुड़ा हुआ है। अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में युद्ध और प्रतिशोध के रूप में शास्ति मौजूद है।स्टार्क के अनुसार, अन्तर्राष्ट्रीय कानून के प्रथागत नियमों को संधियों और सम्मेलनों द्वारा प्रतिस्थापित किया जा रहा है। अन्तर्राष्ट्रीय विधि की संधिया बनाने की प्रक्रिया, राज्य विधान के समकक्ष है। इस पर अन्तर्राष्ट्रीय विधि अस्तित्व में है तथा अब यह कहना गलत है कि अन्तर्राष्ट्रीय प्रणाली में कोई विधान नहीं है।