किसी व्यक्ति की निजता उसकी प्रतिष्ठा का आवश्यक पक्ष है। प्रतिष्ठा में तात्विक और सहायक दोनों प्रकार के मूल्य होते हैं। तात्विक मूल्य के रूप में मानव की प्रतिष्ठा एक हकदारी या अपने आप में संवैधानिक रूप से संरक्षित हित है।
अपने सहायक पक्ष के रूप में प्रतिष्ठा और स्वतंत्रता परस्पर अभिन्न रूप से जुड़े हुए हैं, और दोनों एक दूसरे को प्राप्त करने के लिए सुकरकर्ता उपकरण है। व्यक्ति की उसके निजता क्षेत्र को संरक्षित करने की योग्यता उसे जीवन और स्वतंत्रता के सभी मूल्यों को मूर्त रूप देने के योग्य बनाती है।
स्वतंत्रता का अर्थ व्यापक होता है। जिसमें निजता गौणसेट है। सभी स्वतंत्रताओं का प्रयोग निजता में नहीं किया जा सकता। तथापि निजता की गुंजाइश होने पर ही दूसरी स्वतंत्रताओं को पूरा किया जा सकता है।
निजता, व्यक्ति को शरीर और मस्तिष्क की स्वायत्तता बनाए रखने के योग्य बनाती है। जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों में निर्णय लेने की योग्यता व्यक्ति की स्वायत्तता होती है।
निजता को स्वतंत्र मौलिक अधिकार के रूप में व्यक्त नहीं किया गया परंतु इससे इसे प्राप्त संवैधानिक संरक्षण में कमी नहीं आती जब निजता की वास्तविक प्रकृति और स्पष्ट रूप से संरक्षित मौलिक अधिकारों के साथ इसके संबंध को समझ लिया जाता है। निजता संरक्षित स्वतंत्रताओं के स्पेक्ट्रम में निहित होती है।
संदर्भित पैराग्राफ निम्नलिखित मुकदमें में उच्चतम न्यायालय के निर्णय से लिया गया है:
Correct Answer: (d) न्यायमूर्ति के.एस. पुट्टास्वामी (सेवानिवृत्त) और अन्य बनाम भारत संघ और अन्य
Solution:उपरोक्त कथन उच्चतम न्यायालय द्वारा, न्यायमूर्ति के.एस. पुट्टास्वामी (सेवानिवृत्त) और अन्य बनाम भारत संघ और अन्य (2017 SC) के वाद में किया गया। इस मामले में 9 न्यायाधीशों की पीठ ने निजता के अधिकार को अनुच्छेद 21 के अन्तर्गत मूल अधिकार माना है।मोहिनी जैन बनाम कर्नाटक राज्य (1992 SC) के मामले में उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि शिक्षा पाने का अधिकार अनुच्छेद 21 के अन्तर्गत प्रत्येक नागरिक का मूल अधिकार है।
मेनका गाँधी बनाम भारत संघ (1978 SC) के मामले में उच्चतम न्यायालय ने दैहिक स्वतंत्रता के क्षेत्र को अत्यन्त विस्तृत कर दिया तथा अब अनुच्छेद 21 कार्यपालिका और विधायिका दोनों के विरूद्ध संरक्षण प्रदान करता है।
एण्डी०एम० जबलपुर बनाम एस. शुक्ला (1976 SC) के वाद में उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया था कि अनुच्छेद 359 (1) में राष्ट्रीय आपात के समय प्रत्येक मूलाधिकार निलम्बित रहेंगे।