अंतरराष्ट्रीय विधि को विधि के रूप में स्वीकार किया जाना इसकी बाध्यकारिक शक्तियों को स्पष्ट करने में समस्या उत्पन्न करता है और इसके फलस्वरूप सभी विधियों की प्राधिकारिता पर प्रश्न चिह्न लग जाता है।
कुछ लेखकों ने, अंतरराष्ट्रीय विधि की बाध्यकारी प्रवृत्ति प्राकृतिक विधि से व्युत्पत्तित होती है, के द्वारा इस दर्शाने का प्रयास |किया है। किन्तु हमने देखा है कि प्राकृतिक विधि नैतिकता से अधिक कुछ भी नहीं है
और नैतिक नियमों की विद्यमानता सदृश विधिक नियमों की विद्यमानता की कोई गारंटी नहीं है। इस प्रकार का तर्क अधिक से अधिक यह दर्शाता है कि अंतरराष्ट्रीय विधि के नियम नैतिक रूप से बाध्यकारी हैं,
न कि विधिक रूप से बाध्यकारी। तथापि बहुत से विधिक नियम नैतिक रूप से विरक्त है, नैतिकता में कतिपय नियम आदर्शवादिता से परे भी हो सकते हैं।
इसी प्रकार का मामला वसीयत, संविदा और हस्तातरण पत्र इत्यादि राष्ट्रीय विधियों संबंधी औपचारिकताओं के मामले में है, और अंतरराष्ट्रीय विधि में सीमाक्षेत्र का टाइटल और कार्यक्षेत्र की सीमा संबंधी कतिपय नियमों में भी है।
इस प्रकार के नियमों की बाध्यकारिता का शायद ही किसी नैतिक मानदण्ड पर गुणारोपित किया जा सकता है।
ऑस्टिन के अनुसार, सकारात्मक विधि की निम्नलिखित विशेषताएँ है:
Correct Answer: (b) आदेश, संप्रभु, शस्ति
Solution:जॉन ऑस्टिन को विश्लेषणवादी शाखा (Analytical School) का प्रवर्तक माना गया है। ऑस्टिन ने विधि के प्रति विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण अपनाकर विधि की व्यवहारिक रूप दिलाया है।सुस्पष्ट या निश्चययात्मक विधि (Positive Law) की परिभाषा देते हुए ऑस्टिन कहते हैं कि यह विधि ऐसे आदेशों का समूह है जो एक सम्प्रभुताधारी द्वारा किसी स्वतंत्र राजनयिक समाज में प्रजा के व्यवहारों को निर्धारित करने के लिए तैयार किये गये हैं।
अतः ऑस्टिन का निश्चित मत था कि विधि का आधार सम्प्रभुताधारी व्यक्ति या व्यक्तियों की शक्ति में निहित है। इसी सिद्धान्त को उन्होंने 'विधि का आदेशात्मक सिद्धान्त' (Imperative theory of Law) कहा है।
इस सिद्धान्त के मुख्य तत्त्व है :-
1. सम्प्रभु शक्ति (Soverign Power)
2. समादेश (Command)
3. शास्ति (Sanction)